भगवान महावीर और चरवाहे की कहानी | Hindi Story

आज हम आपको सुनाने वाले हैं भगवान महावीर और एक चरवाहे की कहानी (Bhagwan Mahavir aur Charvaha Hindi Story), इस कहानी को सुनने के बाद आप सोच समझकर काम करना सिख जाएंगे और बिना सोचे समझे दुसरो को दोष देना भूल जाएंगे। तो चलिए इस कहानी को शुरू करते हैं।

 

भगवान महावीर और चरवाहे की कहानी

 

Bhagwan Mahavir aur Charvaha Hindi Story

एक समय की बात है, भगवान महावीर एक विशाल बृक्ष के निचे बैठे तपस्या में लीन थे। उनके चारो ओर प्रकृति की एक दिव्यि छटा देखि जा सकती थी। तभी अचानक एक चरवाहा अपनी पांच छह गाय लेकर वहां पहुंचा। गाय को हरी भरी घास खाने को मिली और सभी गाय घास खाने में मगन थी।

चरवाहे को नजदीक के गाँव में कुछ काम था। उसने सोचा क्यों ना मैं गाँव में अपना काम लिपटाऊँ। तभी उसने देखा तो पाया महावीर ध्यान में बैठे हुए हैं। उस चरवाहे ने भगवान महावीर को पहचान लिया। और हाथ जोड़कर कहा, “प्रभु, मेरे गायों पर नजर रखना। मैं गाँव से जल्दी लौटकर आता हूँ।

चरवाहे को ऐसा लगा भगवान महावीर ने उनकी बातों को सुन लिया है। जबकि ऐसा नहीं था। वह अपनी तपस्या में लीन थे। चरवाहा वहां से गाँव की ओर प्रस्थान कर जाता है। कुछ समय बाद जब वह लौटकर भगवान महावीर के पास आता है तो वहां उसकी गाय नहीं होती है। गाय हरी भरी घास को खाते खाते कुछ दूर निकल गई थी।

चरवाहे ने भगवान महावीर से पूछा, मेरी गाय किहार है? कृपया कर मुझे बताइए?”

इस पर कोई उत्तर ना मिलने से वह बहुत ही व्यथीत हुआ। आसपास उसने अपने गाय को ढूंढा लेकिन नहीं मिली। थक हार कर वह भगवान महावीर के पास लौट आया। और उनसे अनुनाय विनय करने लगा। किंतु भगवान महावीर अपने कठिन साधना में लीन थे। उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया।

चरवाहे को लगा कि उनके साथ मजाक हो रहा है। उन्होंने स्वयं मेरे गाय को छुपा दिया होगा और अब यहाँ ध्यान लगाए बैठे हैं। चरवाहे ने कमर में बंधी हुई गाय की रस्सी को खोला और महावीर पर वॉर करने के लिए आगे बढ़ा। तभी महावीर के कुछ शिष्यों ने चरवाहे का हाथ रोक लिया और कहा, “अरे मुर्ख, तू किस पर प्रहार कर रहा है। तू जानता नहीं यह बर्तमान है। जिसने राजपाठ, मौ माया, धन सम्पदा का त्याग किया है। इन्होने तेरी गाय को नहीं छिपाया है।

चरवाहा स्तब्ध रह जाता है। कुछ देर बाद गाय चारा खा कर भगवान महावीर के पास लौट आते हैं। चरवाहे को अपनी गलती का एहसास होता है। और वह चरवाहा भगवान महावीर से क्षमा मांगता है और वहां से अपनी गाय को लेकर चला जाता है। भगवान महावीर तब भी अपनी तपस्या में लीन रहते हैं।

इस कहानी से हमें जो शिक्षा मिलती है वह ये है हमें कोई भी काम जल्दबाजी में नहीं करना चाहिए। जब तक उस चीज का हमें पता ना चले तब तक हमें किसी पर दोष नहीं लगाना चाहिए। किसी के ऊपर क्रोध में आकर किसी के ऊपर प्रहार या लड़ाई झगड़ा नहीं करना चाहिए। और अपने क्रोध को हमेशा काबू में रखना चाहिए।

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