प्रेम का डाका एक दर्दभरी प्रेम कहानी: Sad Love Story in Hindi | Hindi Kahani

प्रेम का डाका एक हिंदी प्रेम कहानी Sad Love Story in Hindi 

 

प्रेम का डाका एक प्रेम कहानी (Sad Love Story in Hindi) 

रतनगढ़ गाँव में महाजन का व्यापार करने वाले सुखीराम दिन ढलते ही अपने घर में दाखिल हुआ। उसके पास एक थैले में नगद रुपया भी था, जो वो अपने दुकान से घर पर लाया था। घर में पहुंचकर उसकी बेटी मंजरी ने पानी का एक गिलास अभी  सुखीराम को थमाया ही था कि तभी सात आठ लोग हाथों में बंदूके थामे हुए धड़ाधड़ उसके घर में दाखिल हो गए।

उनमें से एक जो लंबा चौड़ा छह फुट का था, चेहरे को काले रंग के कपडे से ढका हुआ, सर पर पगड़ी, उसने बंदूक सीधा सुखीराम की छाती पर तान दी। वो रुपयों से भरा थैला उठाने ही वाला था कि उसकी बंदूक और सुखीराम के बीच मंजरी आ गई।

मंजरी ने बंदूक को पकड़कर अपनी और किया और धमकाते हुए बोली, “हिम्मत है तो चला मुझपर गोली।”

यह नकाबपोश डाकू कोई और नहीं बल्कि डकैत धर्मा था। आज तक किसी ने धर्मा को इस तरह से नहीं ललकारा था। धर्मा एक तक मंजरी को देखता रह गया। तभी उसे न जाने क्या सुझा, उसने अपनी बंदूक वापस खींच ली और अपने साथियों को वापस चलने का इशारा किय, बिना कोई लूटपाट किये हुए।

वह लोग हवा की तरह अपने घोड़ों पर बैठकर गायब हो गए। डकैत धर्मा पिछले सात-आठ सालों से पुरे इलाके में आतंक फैला रहा था। पर धर्मा की एक बात बिलकुल अलग थी कि उसने आज तक कभी भी किसी गरीब या असहाय को अपना निशाना नहीं बनाया। उसके शिकार अक्सर महाजन, जमींदार और साहूकार ही होते थे जो गरीबों का खून चूसकर अपने धंदे चमका रहे थे। इसी कारन से गाँव के बाकि लोग धर्मा को एक अच्छा आदमी मानते थे।

धर्मा के गिरोह में कुल आठ लोग थे। बियावान जंगल के बीच एक पुराणी से टूटी फूटी ईमारत उनके रहने की जगह थी। अपने डेरे पर पहुंचकर धर्मा के एक साथी ने कहा, “आज पहली बार हम बिना डाका डाले वापस आएं हैं, ऐसा क्यों किया बड़े भाई?”

धर्मा के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। उसकी आँखों के सामने बस मंजरी का वो निडर चेहरा ही घूम रहा था। लगता था कि डकैत धर्मा को मंजरी अच्छी लगने लगी। गाँव वालों की नजरों में धर्मा की छवि एक अच्छे आदमी की थी और इसलिए गाँव का कोई भी आदमी  पुलिस के पास उसकी शिकायत भी नहीं करता था। और ना ही उसके खिलाफ कोई गवाही देता था। बल्कि गाँव में कई लोग उसके लिये मुखबरी करते थे, गाँव की हर खबर उस तक पहुंचाते थे।

दिनु नाई भी धर्मा के खबरों में से एक था जिस पर धर्मा को पूरा विश्वास था। धर्मा ने दिनु नाई के हाथों मंजरी की खबर लेनी चाही तो उसे पता लगा कि मंजरी तीन दिन बाद गाँव में लगने वाली मेले में घूमने आएगी।

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धर्मा ने एक बार फिर मंजरी से मिलने का मन बना लिया। और मेले में भेष बदलकर पहुंच गया। धर्मा के गिरोह में एक बिस साल का लड़का भी था जिसका नाम सिनु था। धर्मा उसे अपने छोटे भाई की तरह मानता था। वह भी धर्मा का बहुत करीबी था। और उस दिन धर्मा के साथ सिनु भी गाँव के मेले में पहुंचा।

वो दोनों नकली दाड़ी मुछ में थे। धर्मा की नजरे लगातार मंजरी को ढूंढ रही थी। तभी उसकी नजर मंजरी पर पड़ी तो वह अपने कुछ सहेलियों के साथ थी। मौका देखकर धर्मा ने मंजरी को एकेले देखकर उसका हाथ पकड़ लिया और एक किनारे ले गया। अभी वह चिल्लाने ही वाला था कि धर्मा ने उसे अपना असली चेहरा दिखा दिया।

जिस डकैत को देखकर बड़े बड़ो के पसीने छूट जाते थे मंजरी उसे देखकर बिलकुल भी नहीं डरी। धर्मा ने बिना वक्त गवाए मंजरी से कहा, “कल दोपहर तुम मुझे गाँव के पास वाले तालाब पर मिलो बरगद के पेड़ के निचे, अकेले आना।” इतना कहकर धर्मा पलक झपकते वहां से गायब हो गया।

अगली दोपहर मंजरी तालाब पर पहुंच गया। धर्मा वहां पर पहले से ही मौजूत था और उसका साथी सिनु भी उसके साथ था। मंजरी के वहां पहुंचते ही धर्मा के पहला सवाल मंजरी से यही था कि क्या तुम्हें मेरे जैसे डकैत से डर नहीं लगता? लड़की होकर भी तुम बहादुर कैसे हो?” मंजरी  ने मुस्कुराते हुए कहा, “मुझे तुमसे डरने की क्या जरुरत है मुझे पता है तुमने कभी भी किसी औरत को नुकसान नहीं पहुंचाया। और कभी इसी बेकसूर को परेशान नहीं किया। जहाँ तक मुझे मालूम है तुम एक भले डकैत हो।” मंजरी ने आगे कहा, “पर तुम मेरे पिता को क्यों लूटना चाहते थे वह तो एक भले इंसान है।” धर्मा ने जवाब दिया, “तुम्हारे पिता भले इंसान नहीं है बल्कि एक खून चूसने वाले साहूकार हैं। तुम तो मुझे कुछ पड़ी-लिखी और समझदार लगती हो, एक बार अपने पिता के बहीखातें देख लेना तुम्हें सब कुछ समझ आ जायेगा। खेर मैंने तुम्हें यहां इसलिए बुलाया है कि मैं तुम्हें पसंद करता हूँ और तुमसे शादी करना चाहता हूँ।”

एकदम से यह सुनकर मंजरी भौंचक्की रह गई। उसने कहा, “तुम एक भले इंसान हो लेकिन हो तो एक डकैत ही। और एक डकैत को मैं अपना जीवनसाथी नहीं बना सकती।” धर्मा ने बिना देर किये जवाब दिया, “अगर मैं डकैती छोड़ दूँ तो?” मंजरी ने कहा, “अगर डकैती छोड़ दो तो मैं तुम्हारे  बारे में सोच सकती हूँ।”

असलमे मंजरी को भी धर्मा अच्छालगने लगा था। धर्मा ने कहा, “ठीक है मैं जल्दी ही कोई फैसला लेकर तुमहे बताऊंगा। तुम आज से तीसरे दिन मुझे यही तालाब पर मिलना।”

इसके बाद दोनों वापस लौट गए। वापस आकर धर्मा ने किसी भी नए  डाके की योजना नहीं बनाई। उसके गिरोह के लोग आपस में  फुसफुसाने लगे कि धर्मा तो प्रेम के चक्कर में पड़ गया है और अब अपने गिरोह का क्या होगा। लेकिन सिनु धर्मा के साथ ही था। सिनु का गाँव पास ही था जहाँ उसकी माँ अकेली रहती थी। सिनु ने कहा, “चलो आज रात का खाना मेरी माँ के हाथों खाएंगे।”  और दोनों दोस्त सिनु के माँ के घर  पहुंच गए।

सिनु ने जब अपनी माँ को धर्मा और मंजरी के बारे में बताया तो वह बहुत ही खुश हो गई और धर्मा से कहने लगी, “कि तुम जल्दी ही सिनु को भी इस नरक से निकालो ताकि उसका भी घर बसे।” और वह तीनों खिलखिलाकर हंसने लगे।

खाना खा कर दोनों दोस्त वापस अपने डेरे पर चले गए। धर्मा डकैती का काम छोड़ने का पूरा मन बना चूका था और उसे पता था कि इसके बदले उसे जेल में सजा भी काटनी होगी, पर वह तैयार था। अब मंजरी और धर्मा अक्सर ही तालाब पर मिलने लगे। सिनु हर बार धर्मा के साथ ही जाता  था।

एक दिन मंजरी ने धर्मा से पूछा, “कि तुम एक अच्छे इंसान हो फिर तुम डकैत क्यों बन गए। तब धर्मा ने कहा, “एक सूदखोर जंमीदार के पास मेरे पिता बन्दूया मजदूरी करते थे। उस जमींदार  के पास मजदूरी करते-करते मेरे पिता की मौत हो गई और माँ भी उस सदमे में छल बसी। बस उस जमींदार से बदला लेने के लिए मैंने एक  बार बंदूक उठाई तो फिर कभी नहीं छोड़ी। पर तुमसे मिलने के बाद एक बार फिरसे मेरे में जीने की इच्छा जाग गई है।”

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इधर मंजरी के पिता को भी भनक लग गई कि उनकी बेटी एक डकैत धर्मा से मिलती झूलती है तो उन्होंने कोतवाली में पुलिस को खबर कर दी। दो दिन बाद जब फिरसे मंजरी और धर्मा तालाब पर मिलने पहुंचे और सिनु और धर्मा उसके बाद वापस लौटने लगे तो पुलिस ने धर्मा और सिनु को घेर लिया। वह दिन इतना मनहूस था कि पुलिस के साथ गोलाबारी में धर्मा की बाजु घायल हो गई और धर्मा की जान बचाते-बचाते एक गोली सिनु का सीना चीरते हुए निकल गई। सिनु की मौके पर ही मौत हो गई और उसका शव पुलिस ने यप्त करके उसकी माँ के घर पहुंचा दिया। जबकि घायल धर्मा अपने घोड़े पर बैठकर वहां से फरार हो गया और अपने डेरे पर पहुंच गया।

धर्मा की ऐसी हालत देखकर उसके साथियों ने उसका इलाज तो किया लेकिन वे सब आपस में योजना बनाने लगे कि धर्मा तो अब लड़की के प्रेम चक्कर में पड़ गया है और मारा जायेगा, अगर पुलिस ने इसे पकड़ लिया या इसने आत्मसमर्पण कर दिया तो दोनों ही परिस्तिथियों में हम सब बेमौत मारे जायेंगे। इसलिए धर्मा को रास्ते से हटाना ही होगा।

सामने से धर्मा के ऊपर हमला करके मारने की हिम्मत तो किसी में न थी इसलिए उन्होंने सोचा कि किसी और तरिके से धर्मा को रास्ते से हटाना होगा। धर्मा ने घायल होने के वाबजूद सिनु के माँ के घर जाने का फैसला लिया। अपने दोस्त की मौत के बाद वह एक बार उसकी माँ के साथ मिलना चाहता था।

जैसे ही धर्मा सिनु के माँ के घर पहुंचा, सिनु की माँ रोते-बिलखते हुए धर्मा को दरवाजे पर ही रोक दिया और कहने लगी, “तू ही है मेरे सिनु का हत्यारा। ना तू उस लड़की के चक्कर में पड़ता और ना ही मेरा बेटा पुलिस की गोली से मारा जाता। चला जा तू यहाँ से। एक माँ की बद्दुआ लगेगी तुझे तू हत्यारा है मेरे बेटे का।” धर्मा के सीने में मानो सेकड़ो गोलियां एक साथ धस गई हो। धर्मा बिना कुछ बोले वहां चला गया। उसने नाई के हाथों मंजरी को संदेशा भिजवाया कि अगली दोपहर को वह तालाब पर मिलने के लीये पहुंचे।

अगले ही दिन वह मंजरी से मिंलने ही वाला था। दोपहर का खाना खा कर धर्मा अपने घोड़े पर बैठा और तालाब की तरफ रवाना हो गयामंजरी से मिलने की लिलयी। घोड़े पर बैठे -बैठे ही उसका सिर भारी सा होने लगा मानो चक्कर सा आ रहा हो। जैसे तैसे वह तालाब पर पहुंचा जहाँ पर मंजरी पहले से ही उसका इंतजार कर रही थी।

धर्मा घोड़े से उतरते ही गिरने पड़ने लगा। मंजरी ने उसे संभाला और बरगद के पेड़ के निचे लेटा दिय। मंजरी ने पूछा, “क्या हुआ तुम्हें धर्मा? ” लेकिन धर्मा कुछ बोलने की हालत में नहीं था। मंजरी न धर्मा का सिर अपने गोद में रख लिया और कुछ पानी के छींटे उसके मुँह पर मारने लगी। धर्मा को मानो यह एहसास होने लगा कि उसका आखरी समय आ गया है। उसकी आँखों के सामने सिनु की माँ दिखने लगी और कानो में सिनु की माँ का चीखना-चिल्लाना सुनाई देने लगा। और वह मन ही मन सोच रहा था कि शायद यही मेरा अंत है मैंने एक माँ का दिल दुखाया है और मेरी बजह से ही एक माँ इ अपना बेटा खोया है और उस माँ की बद्दुआ आज मुझे लग गई है। यह सोचते-सोचते कब धर्मा की आंखे और सांसे बंद हो गई पता ही न चला। और मंजरी पर मानो तो दुखो का पहाड़ टूट पड़ा। वह बेतहाशा रोते-रोते बेसूद सी हो गई।

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दरहसल जब धर्मा दोपहर का खाना खा कर अपने डेरे से निकला था तब उसके गिरोह के बाकि साथियों ने उसके खाने में जहर मिला दिया था उसे अपने रास्ते से हटाने के लिए। और  इस तरह से एक डकैत की प्रेम कहानी का बहुत ही दुखद अंत हो गया। कुछ देर में आसपास के कुछ लोग आए और उन्होंने धर्मा का दाह संस्कार किया पर किसी ने पुलिस को खबर नहीं की। और मंजरी को उसके पिता वापस अपने घर ले गए। धर्मा के बाकि साथी फिरसे अपने डकैती के कामो में लग गए। और इस तरह से एक डकैत की प्रेम कहानी का दर्दनाक अंत हो गया।

कहानी थोड़ी बड़ी है लेकिन उम्मीद करते हैं की आपको यह कहानी ” प्रेम का डाका एक दर्दभरी प्रेम कहानी: Sad Love Story in Hindi | Hindi Kahani” जरूर पसंद आई होगी अगर पसंद आए तो अपने दोस्तों को भी शेयर करे और कमेंट करके बातएं कि आपको यह कहने कैसी लगी।

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