पटाचारा और महात्मा बुद्ध की कहानी | Story of Patachara and Buddha in Hindi

पटाचारा और महात्मा बुद्ध की कहानी  Story of Patachara and Buddha in Hindi

 

पटाचारा और महात्मा बुद्ध की कहानी

पटाचारा श्रीवस्ती की नगरसेठ की पुत्री थी। किशोर अवस्था आने पर वह अपने घरेलु नौकर के प्यार में पड़ गई। जब उसके माता-पिता उसके विवाह के लिए उपयुक्त वर खोज रहे थे तब वह अपने नौकर के साथ भाग गई। दोनों पति-पत्नी एक छोटे से नगर में जाकर रहने लगे। कुछ समय बाद जब पटाचारा गर्भवती हो गई और स्वयं को अकेले पाकर उसका दिल घबराने लगा तो उसने अपने पति से कहा, “हम यहाँ अकेले रह रहे हैं, मैं गर्भवती हूँ और मुझे किसी की सहातया की आवश्यकता है। यदि आप आज्ञा दे तो मैं अपने माता-पिता के घर चली जाऊं।

पति पटाचारा को उसके मायके नहीं भेजना चाहता था इसलिए उसने कोई बहाना बनाकर उसका जाना स्तगित कर दिया। लेकिन पटाचारा के मन में माता-पिता की घर जाने की इच्छा बड़ी वलवती हो रही थी।

एक दिन जब उसका पति काम पर गया हुआ था, तब उसने पड़ोसी से कहा, “आप मेरे स्वामी को बता देना कि मैं कुछ समय के लिए अपने माता-पिता के घर जा रही हूँ।”

जब पति को इस बात का पता चला तो उसे बहुत बुरा लगा। उसे अपने ऊपर ग्लानि भी हुई कि उसके कारण ही इस कुलीन कन्या की इतनी बड़ी दुर्गति हो रही है। वह उसे ढूंढने के लिए उसी रास्ते पर चल पड़ा। रास्ते में पटाचारा उसे मिल गई। पति पटाचारा- बुझाकर घर ले आता है।

समय आने पर पटाचारा एक लड़के को जन्म देती है। इसके बाद पटाचारा अपने बच्चे और पति के साथ सुखपूर्वक रहने लगती है। कुछ सालो बाद जब पटाचारा दूसरी बार गर्भवती हुई तब उसका पति स्वयं उसे उसके मायके ले जाने के लिए राजी हो गया।

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जब पटाचारा अपने पति और बच्चे के साथ मायके जा रही थी तभी रास्ते में जोरो की आंधी और वर्षा होने लगी। पटाचारा ने पति से कहा कि वह किसी सुरक्षित स्थान की खोज करे। पति झाड़ियों से होकर गुजर रहा था तभी उसे एक विषैले सांप ने काट लिया और तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो गया।

पटाचारा अपने पति की प्रतीक्षा कर रही थी और ऐसे में ही उसे प्रसव हो गया और उसने फिर एक बच्चे को जन्म दिया। थोड़ी शक्ति जुटाकर उसने दोनों बच्चों को साथ लिया और अपने पति को खोजने निकल पड़ी। जब उसे पति मृत मिला तो वह फुट-फुटकर रोने लगी। और खुदको कोशने लगी कि मेरे कारण ही मेरे पति की मृत्यु हो गई। अब अपने माता-पिता के सिवा उसका कोई नहीं था।

पटाचारा अपनी नगर की ओर चली। रास्ते में नदी पड़ती थी। उसने देखा कि दोनों बच्चों को साथ लेकर नदी पार करना कठिन था। इसलिए बड़े बच्चे को उसने एक किनारे पर बैठा दिया और दूसरे को छाती से चिपकाकर दूसरे किनारे की ओर चली। वहां पहुंचकर उसने छोटे बच्चे को कपड़े में लेपटकत झाड़ियों में रख दिया और बड़े बच्चे को लेने के लिए नदी में उतर गई।

पटाचारा और महात्मा बुद्ध की कहानी | Story of Patachara and Buddha in Hindi
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नदी पार करते समय उसकी आंखे छोटे बच्चे पर ही लगी हुई थी। उसने देखा की एक बड़ा गिद्ध बच्चे पर झपट्टा मारकर उसे ले जाने की कोशिश कर रहा है। वह चीखी-चिल्लाई लेकिन कुछ नहीं हुआ। वह गिद्ध उस बच्चे को उठा ले गया।

दूसरे किनारे पर बैठे बच्चे ने जब अपनी माँ की चीख पुकार सुनी तो उसे लगा कि माँ किसी संकट में है और उसी बुला रही है। और वह बिना कुछ सोचे समझे ही झटपट पानी में उतर गया। पर क्यों कि पानी की धार बड़ी तेज थी इसलिए वह पानी में बह गया।

छोटे बच्चे को गिद्ध उड़ा ले गया। बड़ा नदी में बह गया। उसका छोटा सा परिवार पूरी तरह से नष्ट हो गया था। वह विलाप करती हुई और रोती-बिलखती अपने पिता की घर की और चली। लेकिन रास्ते में तभी उसे नगर का एक यात्री मिलता है जिसने उसे बताया कि नगरसेठ का परिवार अर्थात उसके माता-पिता और भाई-बहन कुछ समय पहले घर में आग लग जाने के कारण मृत्यु को प्राप्त हो गए। यह सुनते ही पटाचारा पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। उसे तन मन की कोई परवा न रही। वह पागल होकर निर्वस्त्र घूमने लगी। उसके मुख पर सिर्फ यही शब्द रहते थे पति मर गया, बड़ा बेटा डूब गया, छोटे को गिद्ध खा गया, माता-पिता और भाई-बहन चिता भी नसीब नहीं हुई। असेही विलाप करती निर्वस्त्र घूमती-फिरती पटाचारा को सभी अपमान करते और यहाँ से वहां भागा देते।

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उन्हीं दिनों जितवन में भगवान बुद्ध ठेरे हुए थे। एक दिन भगवान बुद्ध जितवन में धर्म उपदेश दे।  पटाचारा अनयासी उस दिन वहां पहुंच गई। उपस्थित लोगों ने कहा, “अरे यह तो पागल है। इस स्त्री को तो यह भी नहीं पता कि इसने कुछ पहन नहीं रखा। अरे भगाओ इस पागल और नग्न स्त्री को यहाँ से।” बुद्ध ने उन सबको रोकते हुए कहा, “इसे मत रोको। इसे मेरे पास आने दो।”

पटाचारा, जो बुद्ध के समीप आई, तो बुद्ध ने उसे कहा, “बेटी अपनी चेतना को संभाल। ”

भगवान बुद्ध को अपने समक्ष पाकर पटाचारा को कुछ होश आया और अपनी नग्नता का बोध हो आया। तभी वहां उपस्थित लोगों में से एक ने उसे चादर से ढक दिया। और पटाचारा वही फुट-फुटकर रोने लगी। उसने कहा, “मेरे पति को सांप ने डस लिया और छोटे-छोटे मेरे बच्चे मेरे सामने ही मारे गए। मेरे माता-पिता और भाई-बहनों को चिता भी नसीब नहीं हुई। मेरा अब इस दुनिया में कोई नहीं है मैं क्या करू?”

बुद्ध ने उससे कहा, “दुखी मत हो। अब तुम मेरे पास आ गई हो। जिन परिजनों के मृत्यु के लिए तुम आंसू बहा रही हो ऐसेही अनंत आंसू तुम जन्म-जन्मान्तरों से बहाते आ रही हो। उनसे भरके के लिए तो महासमुद्र भी छोटे पड़ जायेंगे। तेरी रक्षा कोई नहीं कर सकता। जब मृत्यु आती है तो कोई परिजन आदि काम नहीं आते।”

यह सुनकर पटाचारा का दुःख कुछ कम हुआ। उसने बुद्ध से साधना की अनुमति मांगी। बुद्ध ने उसे अपने संग में शरण दे दी। धर्म के परम स्त्रोत में इतने समीप रहकर पटाचारा का दुःख धीरे-धीरे जाता रहा। वह रोज ध्यान की साधना करती रही और वह ध्यान की साधना में बहुत निपुण हो गई।

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एक दिन स्नान करते समय उसने देखा कि देह पर पहले डाला गया पानी कुछ दूर जाकर सुख गया। फिर दूसरी बार डाला गया पानी थोड़ी और दूर जाकर सुख गया। और  तीसरी बार डाला गया पानी उससे भी आगे जाकर सुख गया। इस अत्यंत साधारण घटना में पटाचारा को समाधी का सूत्र मिल गया। पहली बार उड़ेले गए पानी के समान कुछ जीब अल्प आयु  में ही मर जाते हैं, दूसरी बार उड़ेले गए पानी के समान कुछ जीव अपनी आधी आयु पूर्ण करके ही चले जाते हैं। और तीसरे बार उड़ेले गए पानी के समान कुछ जीव अपना पूरा जीवन जी कर ही मरते हैं लकिन मरते सभी हैं अमर कोई भी नहीं है।

ऐसे में पटाचारा को यह भान हुआ जैसे प्रभु बुद्ध उसे कह रहे हैं “हां पटचरे, समस्त प्राणी मरणधर्मा है। इस दुनिया में कोई भी अमर नहीं है।  एक दिन मैं भी अपना शरीर त्यागूंगा और एक दिन तू भी।”

इस प्रकार पटाचारा उन बोध साधिकाओ में गिनी गई जिनको बिना ज्यादा ही प्रयास किये ही एक ही जीवनकाल में निर्वाण यानि मोक्ष की प्राप्ति होगी।

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