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Heart Touching Story in Hindi

बिटिया की खुशी | दिल को छू लेने वाली एक कहानी | Heart Touching Story in Hindi

बिटिया की खुशी, दिल को छू लेने वाली एक कहानी (Heart Touching Story in Hindi)

 

बिटिया की खुशी 

नारायण दास गाँव की पाठशाला में चपरासी का काम करते थे। उनके घर में उनकी पत्नी और बारह साल की बिटिया मानसी थी। आज छुट्टी का दिन था। घर का महीने का राशन भी ख़त्म हो गया था। अपनी सीमित कमाई में वह अपना घर चला ही रहे थे।

उस दिन वह बनिए की दुकान से राशन लेने के लिए चल पड़े साथ में मानसी भी निकल पड़ी कि आज बाजार में घूमना भी हो जायेगा। बनिया लाला की दुकान पर पहुंचकर उन्होंने अपना राशन बंधवाया और मानसी का हाथ पकड़कर वापस चल दिए।

चलते-चलते मानसी की नजर गोलगप्पे वाले की ठेले पर पड़ी। बेटी गोलगप्पे खाने के लिए मचल गई। पिता ने ठेले वाले से पूछा, “किस भाव दिए हैं गोलगप्पे वाले भाई?”

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गोलगप्पे वाले ने जवाब दिया, “दस रूपये के आठ गोलगप्पे।”

पिता को मालूम ना था कि गोलगप्पे इतने महंगे हो गए हैं। जब वह खाया करते थे तो एक रुपये में दस मिलते थे। नारायण दास ने अपनी जेब में हाथ डाला तो सिर्फ पंद्रह रुपये ही बचे थे। बाकि के पैसे घर का राशन लेने में खर्च हो गए। उनका गाँव शहर से दूर था। दस रुपये तो बस किराए में ही लग जायेंगे।

पिता ने कहा, “नहीं भाई, पांच रुपये के दस दे दो तो ठीक है वरना हम नहीं लेंगे।”

यह सुनकर बेटी ने मुँह फुला लिया।

पिता ने कहा, “अरे चलो भी, नहीं लेने इतने महंगे गोलगप्पे।” पिता के माथे पर लकीरे उभर आयी।

तभी ठेले वाला बोला, “अरे खा लेने दो न साहब। अभी आपके घर में है तो आपसे लाड और जिद भी कर सकती है। कल को पराए घर चली जाएगी तो पता नहीं ऐसे मचल पायेगी भी या नहीं। तब आप भी तरसेंगे बिटिया की ख्वाइश पूरी करने के लिए।”

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गोलगप्पे वाले के यह शब्द पिता को चुभने लगे और उनको सुनकर पिता को अपनी बड़ी बेटी की याद आ गई। जिसकी शादी तीन साल पहले एक खाते-पीते और पढ़े-लिखे परिवार में की थी। उन्होंने पहले ही साल से बेटी को सताना शुरू कर दिया। दो साल पहले तक वह मुट्ठी भर-भर कर नोट उनके मुँह में ठूसते रहे। पर लड़के वालो का पेट बढ़ता ही चला गया। और अंत में एक दिन सीढ़ियों से गिरकर बेटी की मौत की खबर ही मायके तक पहुंची।

आज नारायणदास छटपटाते हैं कि फिर उनकी बेटी उनके पास वापस लौट आए, तो चुन-चुन कर उसकी सारी अधूरी इच्छाएं पूरी कर देंगे। पर वह अच्छी तरह जानता था कि अब यह असंभव है।

” दे दूँ क्या बाबूजी” गोलगप्पे वाले की यह आवाज ने पिता की तंद्रा तोड़ी।

“रुको भाई दो मिनिट” यह कहकर वह वापस उस राशन की दुकान पर गए जहाँ उन्होंने अपना सामान ख़रीदा था। महीने के राशन में खरीदी हुई पांच किलो चीनी में से एक किलो चीनी उन्होंने वापस कर दी। तो अब उनकी जेब में चालीस रुपये पड़े रहे। फिर पिताजी और बिटिया दोनों ठेले वाले के पास पहुंचे।

पिता ने डबडबाई आंखे पोछते हुए कहा, “अब खिला दे भाई इसे गोलगप्पे। और हाँ तीखा जरा कम ही डालना मेरी बिटिया बहुत नाजुक है।”

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यह सुनकर बेटी के आँखों में चमक आ गई। उसने पिता का हाथ और भी कसकर पकड़ लिया। मानसी एक एक करके गोलगप्पे खाती है और पिता की तरफ मुस्कुराकर देखती है। पिता की चेहरे पर ख़ुशी की चमक साफ-साफ दिखाई दे रही थी। इसके बाद दोनों गाँव जाने वाली बस में बैठ गए और अपने  घर पहुंचे।

माँ ने घर पहुंचते ही पूछा, “क्या-क्या  खरीदकर लाए हो बाजार से।”

पिता ने मुस्कुराते हुए कहा, “महीने भर का राशन और बेटी की ख़ुशी।

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Sonali Bouri

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