नई बहु की समझदारी | Nayi Bahu ki Samajhdari Hindi Story

नई बहु की समझदारी | Nayi Bahu ki Samajhdari Hindi Story

नई बहु की समझदारी  Nayi Bahu ki Samajhdari Hindi Story

नई बहु की समझदारी

मोहन दास जी की कोई सरकारी जॉब तो नहीं थी लेकिन गाँव में जो पुस्तैनी जमीन थी उसी में खेती-बाड़ी करके अपने परिवार को पाला और खूब मेहनत करके अपने दोनों बच्चों को उच्च शिक्षा दिलवाई। और आज उन्ही के बदौलत दोनों बच्चे उच्च सरकारी पदों पर थे। उनके बड़े बेटे के नाम महेश था और छोटे का नाम था सुरेश।

सरकारी नौकरी लगने के कारण उनकी शादी भी बहुत जल्दी अच्छे घरों में सम्पन्न  हो जाती है। समय बीतने के साथ  दोनों के बच्चे भी हो जाते हैं। और अब दोनों बेटे अपने बच्चों के भविष्य के लिए शहर में जाकर बसने का निर्णय करते हैं। और पिता मोहन दास जी से इस बारे में बात करते हैं।

मोहनदास जी दोनों बेटों के निर्णय से सहमत हो जाते हैं लेकिन वह खुद शहर जाकर रहने से यह कहकर मना कर देते हैं कि हमें कहाँ शहर का वातावरण रास आएगा, हम तो गाँव में ही ठीक है। दोनों बेटे पिताजी के फैसले पर सहमत हो जाते हैं और उनको हर महीने खर्चा भेजने की बात कहकर स्वयं अपने परिवार के साथ शहर में बस जाते हैं।

अब जब तक मोहनदास जी जीवित रहे तब तक उनकी पत्नी सुशीला जी भी गाँव में ही रही लेकिन पति के मृत्यु के बाद उन्हें अकेलापन खलने लगा। और बुढ़ापे की बजह से बीमार भी रहने लगी।

तब पड़ोसियों ने कहा, “अम्मा जी अब बुढ़ापा आ गया है,  अब अपने बेटे बहु के पास जाकर क्यों नहीं रहती, अब बेटे बहु बुढ़ापे में काम नहीं आएंगे तो कब आएंगे।”

सुशीला जी को भी अपने पड़ोसियों की बात सही लगी और उन्होंने अपने दोनों बेटों को खबर भिजवा दी कि उसे लेने आ जाए। तो उनका बड़ा बेटा महेश उनको शहर ले आया और आदर भाव से अपनी माँ का सेवा करने लगा। लेकिन महेश जी की पत्नी रमा को अपनी सास का यहाँ आना बिलकुल पसंद नहीं आया क्यों की अब उसकी आज़ादी में खलल जो पड़ने लगा था। ऊपर से उनकी सेवा और करनी पड़ रही थी। उन्हें समय पर दवाइयां देना, डॉक्टर को दिखाना और नित्य कर्म।

सुशीला की की भी थोड़ी इच्छा होती कि उनकी बहु थोड़ी देर उनके पास बैठे, उनसे बातें करे लेकिन महेश की पत्नी रमा को यह बात कहाँ रास आने वाली थी। और अब तो आए दिन वह अपनी सास को लेकर महेश जी से झगड़ा करने लगी। महेश जी उसको खूब समझाते कि कल को तुम्हारी भी बहु आने वाली है तो सुधर जाओ। लेकिन रमा उनकी एक बात न सुनती और एक दिन रमा ने साफ-साफ कह दिया कि आप दो भाई हो तो हम माँ कि जिम्मेदारी अकेले क्यों उठायें। अब से माजी छः महीने इधर और छः महीने अपने छोटे बेटे के पास रहेगी।

अब महेश जी भी बेचारे क्या करते। अतः दोनों भाइयों की आपसी सहमति से ऐसा ही हुआ। अब बेचारी सुशीला जी छः महीने इधर और छः महीने अपने छोटे बेटे के पास रहने लगी। और जब भी वह छः महीने अपने बड़ी बहु के पास रहने आती, तो फिर वही झगड़े शुरू हो जाते कि बुढ़िया तो गंदगी कर देती है, उसे ठीक से खाना नहीं खाना आता,  दिन भर परेशान करती रहती है।

महेश जी भी अपनी पत्नी की इस व्यवहार से बहुत दुखी रहते थे लेकिन पत्नी के आगे उनकी एक न चलती थी। महेश जी का एक लौता बेटा आदित्य भी अपने माँ के व्यवहार से बहुत दुखी था। वह अपनी दादी का खूब ध्यान रखता। और ऑफिस से आते ही सबसे पहले अपनी दादी के जाता। और दादी जिस चीज के लिए भी कहती, वह लाकर देता।

आदित्य का स्वभाव बहुत अच्छा था अपने दादी के प्रति। आदित्य की सगाई अभी दो महीने पहले ही उसके ही ऑफिस में उसके साथ काम करने वाली रागिनी से तय हुई थी। और एक महीने बाद ही दोनों की शादी होने वाली थी। लेकिन आदित्य का शादी की ओर कोई ध्यान नहीं था क्यों कि वह रोज-रोज अपने माँ और दादी के झगड़े से परेशान रहने लगा था।

एक महीने बाद जैसे ही शादी की तारीख नजदीक आती है, तो रमा अपने सास को यह कहकर किसी वृद्ध आश्रम में भेज देती है कि बाद में भुला लेगी, अभी यहाँ शादी के माहौल में उनकी देखभाल कौनक करेगा। रमा के आगे किसी की एक न चलती और सुशीला जी को वृद्धाश्रम भेज दिया जाता है।

शादी होने के कुछ दिन बाद जब आदित्य की पत्नी रागिनी को पता चलता है की दादी माँ वृद्धाश्रम में है, तो वह दादी को वापस घर लाने की जिद करती है। जब रमा को यह पता चलता है की बहु दादी  को वापस घर लाने के लिए कह रही है तो वह बहुत गुस्सा होती है अपने बेटे पर।

रमा अपने बेटे से कहती है, “कल की आई बहु अब हमें सिखाएगी कि हमें क्या करना है और क्या नहीं।”

यह बात सुनकर रागिनी को बहुत गुस्सा आ जाता है और वह बड़े ही शांत स्वर में अपने सास से कहती है, “माजी आपके सास के तो दो बेटे हैं, इसलिए छः महीने इधर और छः महीने अपने दूसरे बेटे के पास रहती है और आखिर में आपने उन्हें वृद्धाश्रम भेज दिया। पर आप यह तो सोचो, आपकी तो एक ही बेटा है, आप छः महीने तो यहाँ रह लोगे लेकिन बाकि के छः महीने कहाँ रहोगी? आपको तो शायद हमेशा के लिए वृद्धाश्रम में रहना पड़े”

बहु की यह बात सुनकर रमा देवी एकदम से अवाक सी रह गई,  अब एक शादी भी उनके मुँह से बाहर नहीं निकल रहा था। पास खड़े महेश जी मंद मंद मुस्कुरा रहे थे कि जो बात मैं इतने दिनों से अपनी पत्नी को समझाने की कोशिश कर रहा हूँ वह बात तो मेरी नई बहु ने आते ही समझा दी।

दूसरे दिन ही आदित्य दादी को वृद्धाश्रम से लेकर आया और दादी जैसे ही गाड़ी से निचे उतरी, तो रमा दादी के पास जाकर रोने लगी और अपनी किए माफ़ी मांगने लगी।

तब सुशीला जी ने कहा, “अरे बहु तुम्हें अपने किए का पछतावा है यही तुम्हारी माफ़ी है।” यह कहकर सुशीला जी ने अपनी बहु रमा को गले लगा लिया। और अपने पोते के बहु रागिनी के सर पर हाथ रखकर कहा, “कि  तू सच में किसी बड़े बड़े घराने की लक्ष्मी है, जो तुम्हारे माँ-बाप ने  तुम्हें इतने अच्छे संस्कार दिए हैं कि तूने आज अपनी समझदारी से मेरी बहु का मन भी बदल दिया।” यह कहकर सुशीला जी ने रागिनी को गले लगा लिया।

तभी आदित्य हँसता हुआ कहता है, “अरे दादी आप मुझे तो भूल ही गई।”

तो सुशीला जी कहती है, “आजा तू भी आजा, तू तो मेरा लाडला बेटा है।”

दूर खड़े महेश जी ख़ुशी के आंसू आँखों में लिए आज परिवार को एक होता हुआ देखकर भगवान का शुक्रिया कर रहे थे।

तो दोस्तों यह कहानी जीवन की एक सच्चाई को दर्शाती है कि हम जो भी कर्म करते हैं, ईश्वर हमें वही वापस दो गुना कर लौटाता है। अगर हम बच्चों से अपेक्षा करते हैं की वह बुढ़ापे में हमारी सेवा करेंगे तो हमें भी अपने माँ-बाप की अपेक्षा को पूरा करना चाहिए।

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