सेवा की कीमत | Seva ki Kimat Story in Hindi

सेवा की कीमत | Seva ki Kimat Story in Hindi

सेवा की कीमत  Seva ki Kimat Story in Hindi

सेवा की कीमत

रामप्रसाद अपने परिवार के साथ एक सुखमय जीवन व्यतीत कर रहे थे। घर में उनकी पत्नी दुर्गा, 2 पुत्र, 2 बहुएं और 5 पोते-पोतियां  संयुक्त परिवार की तरह रहते थे। बेटे और बहुएं सब रामप्रसाद और उनकी पत्नी दुर्गा का बहुत आदर कर रहे थे तथा हमेशा उनकी सेवा में लगे रहते थे। अपनी ईमानदारी, मेहनत और लगन से रामप्रसाद ने बहुत धन दौलत एकत्रित की थी।

एक दिन दिल का दोहरा पड़ने से रामप्रसाद का निधन हो गया। उनकी अचानक मृत्यु से पत्नी दुर्गा का तो रो-रो कर बुरा हाल था। मगर जीवन की गाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए सब ने अपने दिल पर पत्थर रख लिया। रामप्रसाद की मृत्यु के बाद अब सारे धन-दौलत की मालकिन उनकी पत्नी दुर्गा हो गई थी। बेटे और बहुएं अब उनकी बढ़-चढ़ कर सेवा करने लगे थे।

दुर्गा देवी तो यही समझती रही कि क्यों की अब पिता के मृत्यु के बाद वह अकेली रह गई है इसलिए वह अपना कर्तव्य समझ सेवा कर रहे हैं। मगर असलमे तो बेटे और बहुओं के मन में सेवाभाव नहीं बल्कि उनका अपना स्वार्थ छुपा हुआ था। उनकी इच्छा तो माँ के पास रखी धन-दौलत को हड़पने की थी और एक दिन वह भी आ गया जब दोनों बेटों ने बहला-फुसला कर पूरी संपत्ति और धन-दौलत पर कब्जा कर ही लिया।

दोनों बेटों में सब कुछ बराबर बराबर बांट कर दुर्गा ने चैन की साँस ली। लेकिन सब कुछ बेटों के नाम करते ही उनका असली चेहरा सामने आ गया। कल तक जो उनकी सेवा में लगे रहते थे अब वही सब उससे कतराने लगे। माँ को एक घूंट पानी तक पिलाने वाला कोई नहीं था। अकेली बैठी अपनी किस्मत को रोती रहती थी। मगर अब तो देर हो चुकी थी क्यों कि धन-दौलत ख़त्म तो माँ और बेटों का रिश्ता भी ख़त्म ही हो गया था।

कुछ महीने ऐसे ही बीत गए। एक दिन उनकी छोटी बहन उससे मिलने आई और उनकी हालत देख अपने आंसू ना रोक पाई। कहाँ तो सब पर राज करने वाली रामप्रसाद की पत्नी दुर्गा और कहाँ यह एक भिखारी सा जीवन व्यतीत करती दुर्गा अपनी बहन को इस दम घुटते जीवन से उबारने का वादा कर वह चली गई।

एक हप्ते के बाद दुर्गा की छोटी बहन फिर आई। जब वह घर में दाखिल हुई तो उनके हाथ में एक बैग था। उन्होंने इस बैग को ऐसे पकड़ा हुआ था कि बहन के बेटे और बहुएं भी उस बैग को देख सके। वह बैग ले सीधे दुर्गा के कमरे में गई और ऊँचे आवाज में बोली, “दीदी! जो गहनों की पोटली आपने मेरे पास रखवाई थी, यह वही है। अब आप इसे अपने पास ही रखो। फिर दुर्गा के कान में कुछ फुसफुसाकर बहन वहां से चली गई।

दुर्गा ने तुरंत वह बैग उठाया और अपनी अलमारी में बंद कर दिया। उधर दोनों बेटे और बहुएं कान लगाकर सुन ही रहे थे। उन सबके आँखों में एक अजीब सी चमक दिख रही थी। माँ के पास फिर से गहनों से भरा बैग जो आ गया था। बस फिर क्या था, उन गहनों को हतियाने के चक्कर में  बेटे और बहुओं ने फिर से माँ की देखभाल करना शुरू कर दी। रोज कोई नया पकवान बनता, कोई उनके लिए बाजार से फल ले आता और जरा सी खांसी होने पर डॉक्टर को बुला लिया जाता। इस तरह माँ का पूरा ख्याल रखा जाने लगा।

महीनों, सालों गुजर गए और सब उन गहनों से भरे बैग की लालच में दुर्गा की खूब सेवा करते रहे। आखिर एक दिन ऐसा भी आया जब दुर्गा को लगा शायद अब उनका संसार से कुछ  करने का समय आ गया है। तब उन्होंने दोंनो बेटों और बहुओं को बुलाया और वह गहनों से भरा बैग दे कर कह, “बच्चों , अब मेरा वक्त पूरा हो गया है। तुम दोनों इस बैग में जो कुछ है उसका आधा-आधा ले लेना और हंसी -ख़ुशी रहना।” बस इतना कहकर दुर्गा ने आखरी साँस ली और इस दुनिया से विदा हो गई।

दुर्गा की मृत्यु के बाद दोनों बेटों और बहुएं ने चैन की साँस ली कि बुढ़िया से छुटकारा मिल गया और इतने गहने भी मिल गए। बैग खोलकर देखा तो वह गहनों से भरा पड़ा था। मगर चूँकि वह सब पुराने ज़माने की गहने थे तो यह फैसला हुआ कि इन्हे बेच कर जो  रकम मिलेगी, उसे  दोनों आधा-आधा बाँट लेंगे।

सब मिलकर सुनार की दुकान पर गए और बोले,  “भाई हम इन गहनों को बेचना चाहते हैं।” सुनार ने बैग खोला और एक-एक गहनों को जांचने  लगा।  सब गहनों को जांचकर गुस्से से  बोला, “आप मुझे मुर्ख समझते हो जो यह नकली गहने बेचने चले आए। यह सब तो पीतल के गहने हैं  जिन पर सोने का पानी चढ़ा है, भागो यहाँ से।”

सुनार की बात सुन सबके चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी, दिल बैठ गया। क्या हमने इन पीतल की गहनों के लिए बेकार में माँ की इतनी सेवा की और फिर सब अपना माथा पकड़ बैठ गए। असलमें हुआ कुछ ऐसा था कि जब दुर्गा की बहन ने उनकी इतनी बुरी हालत देखि तो उन्होंने एक चाल चलकर पीतल के गहने बनवाकर दुर्गा को दिए थे। इसी चाल की बजह से सारा परिवार दुर्गा की अंतिम साँस तक उनकी सेवा करता रहा।

यह कहानी हमें बताती है कि माता-पिता की सेवा करना हमारा कर्तव्य है। किसी लोभ या लालच में पड़ कर नहीं, बल्कि सच्चे मन और प्यार से उनकी सेवा करनी चाहिए।

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