एक विधवा की कहानी | Story of a Widow in Hindi

एक विधवा की कहानी | Story of a Widow in Hindi

एक विधवा की कहानी  Story of a Widow in Hindi

एक विधवा की कहानी

माँ! मुझे बबैंगलोर में नौकरी लग गई है…20 दिन बाद निकलना पड़ेगा। गौरव ने अपनी माँ विभा को कहा। चलो अच्छा है…तैयारी आज से शुरू करनी पड़ेगी।

पर तुम रहोगे कहा…विभा ने पूछा।

गौरव बोला, “कंपनी की एक कोलोनी वहां पर ही है…वही रह लुंगी।”

“ठीक है, आरती अपने भाई के यहाँ गई है वो वही खाना खाएगी। तुम हाथ मुँह धो लो मैं खाना लगाती हूँ।” विभा ने किचेन में जाते हुए कहा।

विभा, साठ साल की हाउसवाइफ उसके पति यानि महेश चौहान जिनकी 2 साल पहले ही हार्ट अटैक से मौत हो गई थी…तभी से विभा शांत रहने लगी थी।

विभा को एक बेटा और एक बेटी पूर्वी थी जिसकी शादी तीन साल पहले ही जयपुर के एक बड़े घराने में हो चुकी थी। विभा अपने बेटे गौरव और उसकी पत्नी आरती के साथ बोरीवली मुंबई में रहती थी। महेश के जाने के बाद मानो उसकी लाइफ निरश हो गई थी…अब बेटा भी जा रहा था।

गौरव ने बहुत मनाया की वो भी उनके साथ बैंगलोर चले लेकिन विभा ने मना कर दिया। वो यहीं रहना चाहती  थी अपने पति की आखिरी निशाना यानि उसके घर में जिसको महेश ने कपंनी में से लोन लेकर बनाया था। घर नहीं दोनों ने सपनो का महल खड़ा किया था। घर की एक-एक चीज से महेश की याद जुड़ी थी। विभा भी इसी घर में अपनी आखरी सांसे लेना चाहती थी ऐसे में वो घर छोड़कर कैसे जा सकती थी।

बीस दिन कब बीत गए पता ही नहीं चला। विभा ने गौरव और आरती को भीनी आँखों से विदा किया। समय ने रफ़्तार पकड़ी महीने बीतते चले गए। कभी-कभी पूर्वी का फ़ोन आ जाता और कभी-कभी गौरव का। पच्चीस दिन हो गए थे गौरव का फ़ोन आए।

विभा महेश की फोटो की ओर देखते हुए बोली, “देखा महेश, जो लड़का हमें यह कहता था कि वो हमें चार धाम की यात्रा पर ले जाएगा, आज उसी के पास पांच मिनट का भी टाइम नहीं है यह पूछने के लिए कि माँ तुम ठीक हो की नहीं।”

थोड़े दिनों बाद अचानक पूर्वी और गौरव घर आए। दोनों  अचानक देखकर विभा खुश हो गई।

विभा ने कहा, “इतने दिनों बाद माँ की याद कैसे आ गई!”

गौरव ने कहा, “हम तुम्हें यहाँ से ले जाने आएं हैं।”

विभा ने दोनों की तरफ देखते हुए पूछा, “कहाँ?”

गौरव ने कहा, “मैंने बैंगलोर पर किराए का एक घर लिया है तो बस तुम्हें वहीं ले जाने आया हूँ। तुम यहाँ अकेली कब तक रहोगी। हमें कितनी चिंता होती है तुम्हारी मालूम है?”

विभा ने बहुत मना किया लेकिन आखिर में दोनों के दलीलों के सामने हार मान गई और हामी भर दी।

पूर्वी ने कहा, “परसों शाम को टेम्पों आ जाएगा घर का सामान लाने।”

दूसरे दिन पूर्वी और गौरव सामान समटने लग गए। पुरे घर में सामान पड़ा हुआ था। घर का सामान मानो छाती पर बोझ लग रहा था। खिड़की के पास पड़ी आराम कुर्सी पर बैठे विभा सब देख रही थी। थोड़े सामान के बीच में से कुछ दिखा तो वो उठी और सामान हटाया। वहां पर एक टेडी था।

“मुझे यही टेडी चाहिए पापा।” रोते हुए पूर्वी ने कहा। और महेश ने झट से वो टेडी खरीदकर पूर्वी के हाथों में रख दिया। विभा ने गुस्से से कहा, “हर जिद पूरी करना जरुरी है? ऐसा कर तुम बच्चों को बिगाड़ रहे हो।”

महेश ने हँसते हुए कहा, “अरे विभु! इसे जिद नहीं लाड लड़ाना कहते हैं। आज हम उनको लाड़ लड़ाएंगे कल बुढ़ापे में वो हमें लाड़ लड़ाएंगे।”

मांजी! ओ मांजी! विभा चौंकी और अतीत से बाहर आई। उसने टेडी नीचे रखा और कहा, “कौन?”

“यह भंगार बेचना है क्या?” भंगार वाले ने कहा।

विभा बोली, “नहीं कुछ नहीं बेचना।”

तिनका तिनका जोड़कर घर बनाया था। आज वही भंगार बन गया। अब बचे कूचे साल भी भंगार बन जाएंगे और वैसे भी एक बुढ़ी विधवा की जिंदगी भंगार से कम थोड़े होती है। विभा सोचते-सोचते घर के अंदर चली गई। फिर आरामसे कुर्सी पर जाकर बैठ गई और फिर अपने अतीत में चली गई।

मैं ऐसी जगह पर नहीं रहूंगी…यहाँ तो पुरे दिन मैं अकेली रह जाऊंगी…विभा ने महेश से कहा।

हम तुम्हें अकेले रहने ही नहीं देंगे माँ…पूर्वी और गौरव ने कहा। माँ तो मेरे साथ ही रहेगी…गौरव में कहा। नहीं मेरे साथ रहेगी पूर्वी ने कहा और दोनों लड़ने लगे।

ठीक है ठीक है, मैं दोनों के साथ रहूंगी बस…विभा ने दोनों को शांत करते हुए कहा। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ सब धीरे-धीरे अकेले छोड़कर चले गए और विभा के आँखों में आंसू आ गए।

महेश और विभा घंटो तक साथ में बैठे बातें करते रहते थे। पूर्वी शादी करके चली गई थी और गौरव भी पढ़ने के लिए चैन्नई चला गया। बस दोनों ही रह गए थे घर में।

विभा इंसान को अकेले रहने की आदत डाल लेनी चाहिए। हर कोई आपके साथ जिंदगी भर नहीं होगा….महेश ने सोते हुए कहा। दूसरी सुबह महेश उठा ही नहीं। विभा को बहुत बड़ा सदमा लगा मानो बहुत बड़े पत्तर के निचे दब सी गई हो।

थोड़े दिनों बाद सब सगे अपने-अपने घर चले गए। पूर्वी भी अपने ससुराल चली गई। गौरव भी चैन्नई चला गया। रह गई तो बस विभा और महेश की यादें। आज उसी यादों को समेटकर विभा को जाना था।

माँ! माँ चलो टेम्पो आ गया…गौरव ने आवाज लगाई। विभा अभी भी आराम कुर्सी पर बैठी थी। गौरव ने जैसे ही विभा को हिलाया उसकी गर्दन एक और झुंक गई। उसकी सांसे रुक गई थी। आखिर वही हुआ जो वो चाहती थी। उसके पति  आखिरी निशानी उसके घर में उसने आखिरी सांसे ली।

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