अपना मकान | Hindi Story

अपना मकान | Hindi Story

अपना मकान  Apna Makan Hindi Story 

अपना मकान

“भईया, परसों नए मकान पर हवन है, और वैसे भी रविवार का दिन है, तो छुट्टी रहेगी, आप सभी को आना है , मैं गाड़ी भेज दूंगा…” छोटे भाई रजत ने बड़े भाई महेश से मोबाइल पर बात करते हुए कहा।

तब महेश बोला, “क्या छोटे, किराए की किसी दूसरे मकान में शिफ्ट हो रहे हो क्या?”

रजत बोला, “नहीं भईया, यह अपना मकान है, किराए का नहीं।”

“अपना मकान…” भरपूर आश्चर्य के साथ महेश के मुँह से निकला। छोटे तूने बताया नहीं कि तूने अपना मकान ले लिया है।

हाँ भईया, यह कहते हुए रजत ने फ़ोन काट दिया।

अपना मकान, यह शब्द महेश के दिमाग में हतोड़े की तरह बज रहा था। रजत और महेश दोनों सगे भाई थे और दोनों की उम्र में अंतर था 20 साल का। रजत जब केवल 8 वर्ष का था, तभी उनकी माता-पिता की एक कार एक्सीडेंट में मौत हो गयी थी। अब रजत की पालन पोषण की सारी जिम्मेदारी महेश के ऊपर आ गयी। इसी चक्कर में उसने जल्दी शादी भी कर ली। ताकि रजत की परवरिश अच्छे से हो जाए।

प्राइवेट कंपनी में एक छोटी सी पोस्ट पर  काम करते हुए महेश की तनखाह का बड़ा हिस्सा दो कमरे के किराए के मकान और रजत की पढ़ाई व रहन-सहन में खर्च हो जाता था। इसी चक्कर में महेश और उसकी पत्नी ने शादी की कई साल बाद भी बच्चे पैदा ना करने का निर्णय लिया। क्यों कि उनके पहले से ही इतने ज्यादा खर्चे थे।

पढ़ाई पुरे होते ही रजत की एक बहुत अच्छे कंपनी में नौकरी लग गयी और थोड़े दिनों बाद शादी भी हो गयी। बड़े के साथ किराए के मकान में जगह कम पड़ने के कारण रजत ने एक दूसरा मकान किराए पर ले लिया। और अब तक महेश के भी दो बच्चे हो गए थे एक लड़का और एक लड़की।

रजत की मकान लेने की बात जब महेश ने अपनी बीवी को बताई, तो उसके आँखों में आंसू आ गए और वह बोली, “देवर जी के लिए हमने क्या कुछ नहीं किया, उनके परवरिश के कारण हमने कई सालों तक अपने बच्चे तक नहीं किए, उनके हर फरमाइश को पूरा किया, उनके अच्छे भविष्य के लिए अपनी हर इच्छा को दबाए रखा। मुझे इस बात का दुःख नहीं है जी ने अपने मकान ले लिया है बल्कि दुःख तो इस बात का है कि उन्होंने इस बात को हमसे छुपाया।”

रविवार की सुबह रजत महेश के लिए एक गाड़ी भेजता है। सभी उस गाड़ी पर बैठकर रजत के नए घर पहुंचते हैं। मकान को देखकर महेश की आंखे फटी की फटी रह जाती है। मकान बाहर से जितना सुंदर था अंदर से उतना ही ज्यादा शानदार और हर सुख सुविधाओं से परिपूर्ण था।

उस मकान के दो एक जैसे हिस्से थे। यह देखकर महेश मन ही मन सोचता है, देखो छोटा कितना समझदार है अभी से अपने दोनों बेटों के लिए दो जैसे हिस्से बनवाए हैं। पूरा मकान लगभग दो करोड़ रूपए से बना था।

अब महेश सोचने लगा कि इसने अपने दोनों बच्चों के लिए अभी से इतना शानदार मकान बनवाया है और मैं एक ऐसा अभागा हूँ, जिसके पास अपने बच्चों के भविष्य के लिए एक-दो लाख तक  इंतजाम नहीं है।

मकान देखते समय महेश के आँखों में आंसू आ गए। तभी पंडित जी ने आवाज लगाई, हवन का समय हो रहा है, मकान मालिक, हवन के लिए अग्नि कुंड के सामने बैठ जाइए। यह सुन रजत महेश के पास गया और बोला, “इस मकान का मालिक मैं अकेला नहीं हूँ, आप भी हैं भैया। आज मैं जो भी हूँ सिर्फ और सिर्फ आपकी बदौलत हूँ भैया। इसलिए तो मकान के मैंने एक जैसे दो हिस्से बनवाए हैं, एक आपका और एक मेरा।” और हवन कुंड के पास ले जाकर रजत महेश से बोलता है, “कि पूजा मैं आप बैठेंगे भैया, क्यों कि आप बड़े हैं तो पहला हक़ आपका ही है।”

यह सब सुनकर महेश के आँखों  आ जाते है और रजत को गले लगाते हुए कहता है, “छोटे, आज तूने मेरी परवरिश की लाज रख ली।”

पास खड़ी महेश की पत्नी सुनंदा अपने देवरानी से गले लगते हुए कहती है, “जब बड़ा बेटा हमारे साथ है तो फिर हमें किस बात की तकलीफ हो सकती है।”

तभी रजत मुस्कुराते हुए कहता है, “यह नया मकान नहीं, यह हमारा अपना मकान है, हमारा अपना आशियाना। और आज से हम सब साथ मिलकर अपने मकान में रहेंगे।

तो दोस्तों इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि आज के दुनिया में महेश जैसे बहुत मिलते हैं जो अपने जिम्मेदारियों को निभाने के लिए  इच्छाओं का तक त्याग कर देते हैं, लेकिन बहुत कम मिलते हैं रजत जैसे जो अपनों के उपकार को याद रख पाते हैं।

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