दिवाली की कहानी | The Story of Diwali in Hindi

दिवाली की कहानी | The Story of Diwali in Hindi

दिवाली की कहानी  The Story of Diwali in Hindi

माँ काली की कहानी – Diwali Story in Hindi 

रक्तबीज, पौराणिक कथाओं का एक ऐसा असुर जिसके सर पर ब्रह्मा जी का हाथ था। उसे यह अद्भुत वरदान प्राप्त था की जब भी उसकी रक्त की बूंद जमीन पर गिरेगी उससे एक और रकबीज का जन्म होगा। इस कारण रक्तबीज युद्ध में जैसे अजय बन गया था। वह शक्तिशाली था और देवियों को हासिल करने की विकृत मानसिकता के साथ स्वर्ग पर राज करना चाहता था।

उसने देवलोग जाकर देवी-देवताओं पर हमला कर दिया। सभी को मजबूरन अपने प्राण बचाकर वहां से भागना पड़ा। पर रक्तबीज नहीं रुका। देवियों से मोहित होकर वह उनका पीछा करने लगा। देवी-देवता परेशान होकर कैलाश पर्वत पहुंच गए और देवी पारवती को सब कुछ बताया।

देवी पारवती ने सभी को पीछे हटने को कहा और खुद रक्तबीज का सामना करने के लिए खड़ी हो गई। रक्तबीज ने जब कैलाश जाकर देवी पारवती को देखा तो वह उन पर मुग्ध हो गया। देवी पारवती ने उसे लौट जाने का आदेश दिया। रक्तबीज हंस पड़ा और देवी पारवती की तरफ बढ़ने लगा।

देवी ने सामने रखा शिवजी का त्रिशूल उठाया और रक्तबीज पर प्रहार कर दिया। परिणामस्वरूप रक्तबीज के शरीर से रक्त टपकने लगा और फिर ब्रह्मा जी के वरदान के अनुसार रक्त की हर एक बूंद से एक रक्तबीज का जन्म हुआ। यह देखकर देवी कोपित हो उठी और सारे रक्तबीजों पर हमला कर दिया।

इससे कई और रक्तबीज का जन्म हो गया। देवी पारवती का क्रोध अब आसमान छूने लगा था।  वह अपने गुस्से पर काबू नहीं हो पा रही थी। जब उनका गुस्सा चरम सीमा पर आ गया उनका शरीर काला पड़ने लगा, आँखें खून से लाल हो गई और देखते ही देखते देवी ने भयंकर रूप धारण कर लिया।

पूरा ब्रह्मांड इस शक्तिशाली भयानक देवी की गर्जन से हिल गया। वे राक्षस जो पराक्रमी देवी के सबसे निकट खड़े थे उनके गर्जन से ही भष्म हो गए। बाघ की खाल पहने हुए, हाथों में प्रतिशोध की तलवार लेकर नरमुंडों की माला पहनकर विक्राल रूपी महाकाली प्रकट हुई। वह इतनी भयानक थी की रक्तबीज डरकर भागने लगा। माँ काली ने भयानक गर्जन किया और रकबीज के पीछे दौड़ने लगी।

काली माँ ने शक्तिशाली प्रहार किया और वह एक एक करके असुरों कको निर्मम तरीके से चीरने लगी। पर उससे और रकबीज पैदा होने लगे। प्रलय से क्रोधित माँ काली उनके क्रोध से सारा संसार जलने लगा। उन्होंने एक हाथ से रकबीज के सर को पकड़ा और तलवार से उसके सर को धड़ से अलग करके उससे खप्पर में रख दिया ताकि एक भी बूंद धरती पर न गिर सके। फिर वह रकबीज के शरीर  को  निगल गई।

काली माँ की एक ही साँस में बाकि असुर भी उनके मुँह में समा गए और माँ काली किक चीरती हुए हंसी की आवाज से आसमान  कांप उठा। इस तरह असुरों का नायक  रक्तबीज का भयानक वध हुआ। उनके गुस्से ने जैसे खुद उनको ही अपनी वश में कर लिया। उनके तांडव से त्रिलोक में जैसे हाहाकार मच गया, सब कुछ तबाह होने लगा।

देवी-देवता चिंतित होकर महादेव के शरण में  गए। महादेव बभी कालिका को रोकने का साहस ना कर पाए। ऐसा लग रहा था जैसे कुछ भी नहीं बचेगा और फिर से जीवन का पतन हो जाएगा। महादेव के पास अब देवी को रोकने का एक ही रास्ता था। वह काली माँ के सामने शव की तरह  लेट गए।

देवी तांडव करते हुए आगे बढ़ रही थी कि अचानक उनका पैर महादेव के शरीर से टकराया और वह शिवजी के ऊपर खड़ी हो  गई। जब उन्होंने निचे देखा तब उन्हें एहसास हुआ कि जिन्हे ववह अपने पैरों के निचे कुचल  रही थी वह उनके पति साक्षात् भगवान् शिवजी थे। तब जाकर माँ काली शांत हुई। इस प्रकार ख़त्म हुआ रक्तबीज का आतंक और माँ काली का तांडव।

माँ काली के शरण में दीपावली के एक दिन पहले कालीचौदस मनाई जाती है। इस दिन को काली पूजा होती है और इस दिन को नरक चतुर्दसी के नाम से भी जाना जाता है।

अयोध्या आगमन (Ayodhya Aagman Story of Diwali in Hindi)

जब रामजी रावण का वध करकर सीता को जीतकर 14 वर्षों के वनवास काटकर अयोध्या लौटे तब जैसे हवा में ख़ुशी की लहर दौड़ रही थी। हर कलि खिल गई और फूल मुस्कुराने लगे। अयोध्यावासियों का मन अपने राजा रघुवंश के उत्तराधिकारी दशरथपुत्र श्रीराम के लौटने पर प्रफुल्लित हो उठा। हर कदम पर दीप जलाए गए थे। अयोध्या नगरी जैसे नई दुल्हन की तरह सजी हुई हो। रावण पर राम की जीत, असत्य पर सत्य की जीत और रामजी के विजय होकर लौटने के ख़ुशी में मनाई जाती है दीपावली की यह त्योहार।

तो यह थी दो कहानी जिसकी बजह से दीपावली की यह उत्सव मनाई जाती है। उम्मीद करते हैं आपको यह दोनों कहानी जरूर पसंद आई होगी और हमारा यह लेख भी। अगर आपको यह कहानी पसंद आए तो इसे अपने दोस्तों के साथ भी जरूर शेयर करे और असेही और भी पौराणिक कहानियां पढ़ने के लिए हमारे ब्लॉग को सब्सक्राइब जरूर करे।

 

यह भी पढ़े –

Follow Me on Social Media

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *