गांधारी के सौ पुत्र कैसे हुए - कहानी जानकर आप हैरान रह जाएंगे

गांधारी के सौ पुत्र कैसे हुए – कहानी जानकर आप हैरान रह जाएंगे

गांधारी के सौ पुत्र कैसे हुए – कहानी जानकर आप हैरान रह जाएंगे  

कैसे हुआ था कौरवों का जन्म? एक साथ सौ पुत्र को जन्म देने वाले गांधारी ने जब अपने सौ पुत्र को युद्ध में मरा हुआ देखा तो  उन्हें कैसा महसूस हुआ होगा? जानिए कौरवों से जुड़ी यह कथा। 

 

गांधारी के सौ पुत्र कैसे हुए – Gandhari Ke 100 Putra Kaise Hue

हमारे पुराने शास्त्रों और ऐतिहासिक गाथाओं में कई चमत्कारों का वर्णन है, ऐसाही एक चमत्कार है कौरवों का जन्म। भला एक माता एक साथ सौ पुत्र को कैसे जन्म दे सकती है? जी हाँ यह रहस्यमय कथा आपको हैरान कर सकती है।

सौ कौरवों का जन्म कोई प्राकृतिक गर्भ घटना नहीं थी यह एक ऐसी घटना थी जो भारत के प्राचीन रहस्यमय विज्ञान का जीतजागता  उदाहरण है। महारानी गांधारी के गर्भधारण से लेकर शिशुओं की जन्म तक की यह कथा आज हम इस कहानी में चर्चा करने वाले हैं।

कौन थी गांधारी? कौरवों की जन्म से पहले उनकी माता गांधारी के बारे में जानना आवश्यक है। तो गांधारी गांधार देश की राजा सुबल की कन्या थी। गांधार से होने के कारण उनका नाम गांधारी रखा गया। कहा जाता है कि गांधार आज के अफगानिस्तान का ही एक क्षेत्र था कंदहार के नाम से जाना जाता है।

गांधारी के भाई का नाम शकुनि था जो गांधारी के विवाह के बाद भी उन्ही के साथ रहा करता था। आँखों पर पट्टी बांधकर रही गांधारी हस्तिनापुर के महाराज  धृतराष्ट्र की पत्नी थी। विवाह उपरांत पने अंधे पति को देखकर उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने भी आजीवन आँखों पर पट्टी बांधकर अंधे व्यक्ति के जीवन जीने का प्रण लिया। उन्होंने आजीवन आँखों पर पट्टी बांधकर पतिव्रता धर्म  निभाया।

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-:कौरवों की जन्म की कथा:-

महारानी गांधारी अपनी सेवाभाव के लिए जानी जाती थी। एक बार महर्षि वेदव्यास हस्तिनापुर पधारे। गांधारी ने तब उनकी बहुत सेवा की। महारानी के सेवा से प्रसन्न होकर महर्षि ने उन्हें सौ पुत्र की माता होने का वरदान दिया।

सौ पुत्रों का वरदान प्राप्त करके गांधारी बहुत प्रसन्न हुई। वरदान के अनुसार उन्हें समय पर गर्भ ठेरा लेकिन यह गर्भ मात्र एक शिशु का नहीं थी, दो वर्षों तक गर्भवती रही थी गांधारी। जो प्राकृतिक गर्भ होता है वह इंसान में केवल 9 महीने का होता है। लेकिन गांधारी जो कि सौ कौरवों की माता थी वह दो साल तक गर्भवती रही थी।

आप जानकर  हैरान होंगे कि गांधारी को यह गर्भ दो वर्ष तक रहा। सामान्य गर्भ नो महीने का होता है। लेकिन गांधारी के गर्भ के 24 महीने बीत जाने के बाद भी जब उन्हें बच्चा प्राप्त नहीं हुआ तो वह घबरा गई।

गांधारी ने इस गर्भ से चिंतित होकर इसे गिराना ही उचित समझा। गांधारी के गर्भप्राप्त के समय लोहे के समान मांस का एक पिंड निकला। गांधारी इसे देखकर बहुत घबरा गई।

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-:वेदव्यास की कृपा दृष्टि:-

अपनी योग्य दृष्टि से महर्षि इस घटना को पुरे देख रहे थे। जैसे ही उन्हों गर्भपात का पता चला वह फॉरेन हस्तिनापुर पहुँच गए। उन्होंने वहां पहुंचते ही महारानी को मांस के उस पिंड पर जल छिड़कने को कहा।

पिंड पर जल चीड़ाजट ही मांस की पिंड की 101 टुकड़े हो गए। इसके बाद महर्षि के कहने पर गांधारी ने मांस के पिंडो को एक घी से बड़े कुंड इ डालने को कहा। महर्षि ने घी कुंडो को दो वर्ष तक असेही रखने को कहा।

दो साल के बाद गांधारी ने घी कुंडो को खोलना शुरू किया। पहले कुंड से दुर्योधन का जन्म हुआ इसके बाद एक-एक कर और 99 पुत्र जन्मे और एक पुत्री का जन्म हुआ। गांधारी अपने सौ पुत्र और एक पुत्री को पाकर बहुत ही प्रसन्न हो गए। गांधारी अपने सौ पुत्रों और एक पुत्री को पाकर अति प्रसन्न हुआ।

हस्तिनापुर में ख़ुशी की लहर दौड़ गई लेकिन गांधरी को क्या पता था जिन 101 पुत्रों के जन्म के लिए उन्होंने इतनी मेहनत की, उन्हें एक दिन अपने ही भाई के हाथो मृत्यु प्राप्त हुई।

तो दोस्तों आपको गांधारी की यह कहानी “गांधारी के सौ पुत्र कैसे हुए” कैसी लगी आप हमें कमेंट करके जरूर बताए और असेही और भी रोचक कहानी जानने के लिए हमारे इस ब्लॉग को सब्सक्राइब जरूर करे।

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