देवाधिदेव महादेव को क्यों बनना पड़ा घड़ियाल?

देवाधिदेव महादेव को क्यों बनना पड़ा घड़ियाल?

देवाधिदेव महादेव को क्यों बनना पड़ा घड़ियाल? Mahadev Ko Akhir Kyu Banna Pada Ghadiyal Hindi Story:

देवाधिदेव महादेव को क्यों घड़ियाल बनना पड़ा? सर्वशक्ति महादेव को आखिर क्यों तुच्छ प्राणी का रूप लेना पड़ा? सृष्टि के सृजनकर्ता  संघारक, जिनका आदि है न ही अंत भोलेनाथ, शिव, शंकर, संभु जैसे दर्जनों नाम वाले महादेव के साथ ऐसा क्या हुआ जो उन्हें मगरमच्छ का रूप लेकर पानी में जाना पड़ा। तो आइए जानते हैं हैं इस रोचक कथा के बारे में।

देवाधिदेव महादेव को क्यों बनना पड़ा घड़ियाल? जानिए पूरी कहनी –

पौराणिक कथाओं के अनुसार देवों के देव महादेव पर्वत पर तपस्या पर लीन थे। तभी देवतागण अचानक से उनकी प्रार्थना करने लगे। देवतागण माता पारवती की अनुशासन को लेकर उनसे प्रार्थना कर रहे थे। महादेव ने देवताओं की प्रार्थना तो स्वीकार कर ली लेकिन विषय की गंभीरता को देखते हुए वह स्वयं इसका उपाय ढूंढने में लग गए। तो क्या थी वह कथा जिसके लिए देवतागण को महादेव से प्रार्थना करनी पड़ी।

तो कथाओं के अनुसार माता पारवती से शादी  करने का फैसला निश्चय कर चुके थे। वह सब कुछ त्यागकर घोर तपस्या में जुट गई थी। सालों साल तपस्या में लीन देवी पारवती की यह दशा देखकर देवता द्रवित हो गए और महादेव से उनकी आराधना को पूर्ण करने की प्रार्थना करने लगे।

महादेव ने देवताओं की प्प्रार्थना तो स्वीकार कर ली लेकिन अब उनके सामने एक बहुत बड़ी समस्या आ खड़ी हुई थी कि वह माता पारवती के बारे में कैसे पता लगाएं। भगवान स्वयं किस प्रकार से माता पारवती के सामने जाते, ऐसा करने पर माता पारवती नाराज भी तो हो सकती है। वह इसी सोच में थे कि तभी उन्हें एक उपाय सुझा।

महदेव ने सप्तऋषियों को माता पारवती की परीक्षा लेने के लिए भेजा। सप्तऋषियों ने महादेव से शादी करने के लिए  लिए गए फैसले के बारे में पारवती जी से पूछा। परन्तु फिर भी पारवती जी महादेव का गुणगान करते न थके। उन्होंने कहा, “कि वह सर्वगुण सम्पन्न एवं शक्तिमान है। उनमें ही सारी सृष्टि समाई हुई है। फिर सप्तऋषियों ने महादेव के सैकड़ों अवगुण बताएं। परन्तु देवी पारवती तस से मस नहीं हुई। और अपने फैसले पर अटल रहते हुए उन्होंने कहा, “कि महादेव के अलावा किसी और वर से विवाह करना उन्हें मंजूर नहीं है।” इसके पश्चात सप्तऋषि वहां से लौट आए। और पूरी कहानी महादेव को बताई। जिसके बाद उन्होंने स्वयं पारवती जी की परीक्षा लेने की ठान ली।

जैसा की हम सब जानते हैं कि शादी से पहले सभी वर अपनी अर्धांगनी को लेकर सभी संदेह को दूर करना चाहते हैं। इसमें महादेव भी पीछे न थे। ऐसे में उन्होंने स्वयं पारवती जी की परीक्षा लेने की योजना बनाई।

उधर माता पारवती एक तालाब किनारे शांत वातावरण में अपनी तपस्या में लीन थे। तभी तालाब किनारे एक बालक को मगरमछ ने पकड़ लिया। अपनी जान को खतरे में देखकर बालक शोर मचाने लगा। बालक चिल्लाकर मदद मांगने लगा। पारवती जी ने बच्चे की चिंक पुकार सुनी तो उनसे रहा नहीं गया। और वह तपस्या छोड़कर उसे बचाने के लिए तालाब किनारे पहुँच गए। वहां उन्होंने देखा कि मगरमच्छ ने एक बालक को पकड़ा हुआ है। और मगरमच्छ उसे तालाब में खींचकर अंदर ले जाने की ककोशिश कर रहा है।

बालक देवी को देखकर उनसे अपनी जान बचाने की विनती करने लगा। देवी पारवती से रहा नहीं गया और उन्होंने मगरमच्छ से कहा, “हे मगरमच्छ इस निर्दोष बालक को छोड़ दीजिये।” लेकिन मगरमच्छ ने पारवती जी की बात नहीं मानी। पारवती जी ने मगरमच्छ से विनती करके कहा, “कि आप इसे छोड़ दीजिए, बदले में आपको जो भी चाहिए वह आप मुझसे मांग सकते हैं।” जिसके पश्चात मगरमच्छ ने कहा, “कि एक शर्त पर मैं इसे छोड़ सकता हूँ। आपने तपस्या करके महादेव से जो वरदान प्राप्त किया यदि उस तपस्या का फल आप मुझे दे दें तो मैं इसे छोड़ दूंगा।”

पारवती जी तैयार हो गई और उन्होंने कहा, “मैं अपनी तपस्या का फल आपको देने के लिए तैयार हूँ। लेकिन आपको इस बालक को शीघ्र ही छोड़ना होगा।” मगरमच्छ ने देवी को समझाते हुए कहा, “कि विचार कर लीजिये देवी, जल्दबाजी में आकर कोई वचन न दीजिए। क्यों कि आपने हजारों वर्षों तक जिस प्रकार से तपस्या की है वह देवताओं के लिए भी असंभव है। उसका सारा फल इस बालक के प्राण के बदले में मत गवाइए।” पारवती जी ने कहा, “मैं फैसला कर चुकी हूँ मेरा इरादा अटल है। मैं आपको अपनी तपस्या का फल देती हूँ। आप इसे मुक्त कर दीजिए।”

मगरमच्छ ने पारवती जी से तपदान करने का वचन ले लिया। फिर पारवती जी ने जैसे ही अपनी तपस्या का फल दान किया तो मगरमच्छ का शरीर तेजी से चमकने लगा। फिर मगरमच्छ ने कहा, “देखिए तपस्या के प्रभाव से मैं कितना ऊर्जावान हो गया हूँ  .मेरी शरीर की चमक आपको साफ दिखाई दे रही होगी। आपने जीवन भर की पूंजी एक बच्चे के लिए व्यर्थ में गवा दी। अगर आप चाहो तो अपनी भूल सुधारने का एक मौका मैं आपको अभी भी दे सकता हूँ।” इसके उत्तर में पारवती जी ने कहा, “तपस्या तो मैं फिरसे कर सकती हूँ लेकिन अगर आप इस लड़के को निगल जाते  तो क्या इसका जीवन वापस मिल पाता?” इस पर मगरमच्छ ने कुछ जवाब नहीं दिया।

इसी क्रम में देखते-देखते वह लड़का और मगरमच्छ दोनों अदृश्य हो गए। पारवती जी को इस पर आश्चर्य हुआ कि ऐसा कैसे हो सकता है कि दोनों एक साथ अचानक से गायब हो गए। लेकिन पारवती जी ने इस पर अधिक ध्यान नहीं दिया। और वह इस बात पर विचार करने लगी कि उन्होंने अपनी तपस्या का फल तो दान कर दिया है अब फिरसे इसे कैसे प्राप्त किया जाए? इसके लिए उन्होंने फिर से तपस्या करने का संकप्ल लिया। वह तपस्या करने के लिए तैयारियां करने लगी कि अचानक महादेव उनके सामने प्रकट हो गए।

महादेव ने पारवती जी से कहा, “हे देवी भला अब क्यों तपस्या कर रही हो?” पारवती जी ने कहा, “हे प्रभु, आपको अपने स्वामी के रूप में पाने के लिए मैंने संकल्प लिया है। लेकिन मैंने अपनी तपस्या का फल दान कर दिया है ,असेही मैं फिरसे घोर तपस्या करके आपको प्रसन्न करना चाहती हूँ।” फिर उत्तर देते हुए महादेव ने कहा, “हे पारवती, अभी आपने जिस मगरमच्छ को अपनी तपस्या का फल दिया और जिस लड़के की जान बचाई इन दोनों रूपों में मैं ही था। अनेक रूपों में मैं दिखने वाला एक ही हूँ। यह मेरी ही लीला थी। मैं आपकी परीक्षा ले रहा था।” पारवती जी ने कहा, “हे प्रभु, क्या मैं आपके परीक्षा में सफल हुई?” महादेव ने कहा, “हे देवी, आप में दया है करुणा है अब आपको और तपस्या करने की जरुरत नहीं है क्यों कि आपने अपनी तपस्या का फल मुझे ही दिया है।”

यह सुनकर माता पारवती अति प्रसन्न हुई।

 

तो दोस्तों कैसा लगा आपको महादेव की यह कहानी उम्मीद करते हैं आपको जरूर अच्छा लगा होगा। तो दोस्तों अगर आप इसी तरह मैथोलॉजिकल कहानियां और भी पढ़ना चाहते हैं तो इस ब्लॉग को सब्सक्राइब जरूर कर दे क्यों कि आपको यहां असेही ढेरों कहानियां पढ़ने को मिलेगी।

 

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