जगन्नाथ पूरी रथ यात्रा की कहानी - Jagannath Puri Rath Yatra Story in Hindi 

जानिए जगन्नाथ रथ यात्रा की कहानी, इतिहास और उससे जुडी कुछ रोचक तथ्य

जानिए जगन्नाथ रथ यात्रा की कहानी, इतिहास और उससे जुडी कुछ रोचक तथ्य

ओडिशा के पूरी में स्तिथ जगन्नाथ जी का मंदिर समस्त दुनिया में प्रसिद्ध है। यह मंदिर हिन्दुओं के चारों धाम के तीर्थ में से एक है। कहते है मरने से पहले हर हिन्दू को चारों धाम की यात्रा करनी चाहिए। इससे उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। जगन्नाथ पूरी में भगवन विष्णु के अवतार भगवान श्री कृष्ण का मंदिर है जो कई विशाल और कई हजार साल पुराना है। इस मंदिर में लाखों वक्त हर साल दर्शन के लिए आते हैं। इस जगह का एक मुख्य आकर्षण जगन्नाथ पूरी की रथ यात्रा भी है। यह रथ यात्रा किसी त्योहार से कम नहीं होती। इसे पूरी के अलावा देश व विदेश के कई हिस्सों में भी निकाली जाती है।

तो दोस्तों आज के हमारे इस लेख पर आपका स्वागत है और आज मैं बात करने वाली हूँ जगन्नाथ पूरी की रथ यात्रा की और बताएँगे आपको पूरी के जगन्नाथ रथ यात्रा की कहानी, उसका इतिहास और उससे जुडी कुछ रोचक तथ्यों के बारे में, चलिए फिर जान लेते हैं।

 

जगन्नाथ पूरी रथ यात्रा निकाली कब जाती है – Jagannath Puri Rath Yatra Hindi

जगन्नाथ जी की रथ यात्रा हर साल आषाढ़ माह यानि की जुलाई महीने के शुक्ल पक्ष के दूसरे दिन निकाली जाती है। रथ यात्रा का महोत्सव  दस दिन का होता है जो शुक्ल पक्ष की ग्यारह दिन में समाप्त होती है। इस दौरान पूरी में लाखों की संख्या में लोग पहुंचते हैं और इस महाआयोजन का हिस्सा बनते हैं ।

 

इस दिन भगवान श्री कृष्ण, उनके भाई वलराम और उनकी बहन सुभद्रा को रथ में बैठाकर नगर की यात्रा करने निकलते हैं। तीनों रथों  भव्यरूप से सजाया जाता है जिसकी तैयारी महीने के पहले ही शुरू हो जाती है।

जगन्नाथ पूरी रथ यात्रा की कहानी – Jagannath Puri Rath Yatra Story in Hindi 

दोस्तों इस यात्रा से जुडी बहुत सी प्रचलित कथाएं मौजूत है जिसके कारण इस महोत्सव का आयोजन होता है।

[पहली कथा] कुछ लोगों मानना है कि कृष्ण की बहन सुभद्रा अपनी मायके आती है और अपने भाइयों से नगर भ्रमण करने की इच्छा व्यक्त करती है। तब भगवान श्री कृष्ण बलराम और सुभद्रा के साथ रथ में सवार होकर नगर घूमने जाते हैं। इसी के बाद से रथ यात्रा का पर्व शुरू हुआ।

[दूसरी कथा ] इसके अलावा कहते हैं कि गुंडिचा मंदिर में स्तिथ देवी भगवान श्री कृष्ण की मासी है जो तीनों को अपने घर आने का निमंत्रण देती है। भगवान श्री कृष्ण बलराम और सुभद्रा के साथ अपने मासी के घर दस दिन के लिए रहने जाते हैं।

[तीसरी कथा ] तीसरी कथा/ कहानी है भगवान श्री कृष्ण के मामा कंस उन्हें मथुरा बुलाते हैं इसके लिए कंस गोकुल में रथ भिजवाता है। भगवान श्री कृष्ण अपने भाई बहन के साथ रथ में सवार होकर मथुरा जाते हैं और इसके बाद से रथ यात्रा पर्व की शुरुवात हुई।

[चौथी कथा ] कुछ लोगों का कहना है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण कंस का वध करके बलराम के साथ अपनी प्रजा को दर्शन देने के लिए मथुरा में रथ यात्रा करते हैं।

[पांचवी कथा ] कुछ लोगों का मानना है कि श्री कृष्ण की रानियाँ माता रोहिणी से उनकी रासलीला सुनाने को कहती है। माता रोहिणी को लगता है कृष्ण की गोपियों  के साथ रासलीला के बारे में सुभद्रा को नहीं सुनना चाहिए इसलिए वह उसे कृष्ण बलराम के साथ रथ यात्रा के लिए भेज देती है। तभी वहां नारद जी प्रकट होते हैं। तीनों को एक साथ देखकर वह प्रशंसित हो जाते हैं और प्रार्थना करते हैं कि इन तीनों के असेही दर्शन हर साल होते रहें। उनकी यह प्रार्थना सुन ली जाती है और रथ यात्रा के दौरान इन तीनों के दर्शन सबको होते रहते हैं।

 

जगन्नाथ पूरी मंदिर से जुडी इतिहास – History of Jagannath Puri Mandir Hindi

कहते हैं कि भगवान श्री कृष्ण के मौत के पश्चात् जब उनके पार्थिव शरीर को द्वारिका लाया गया तब बलराम अपने भाई के मौत से अत्यधिक दुखी होते हैं। भगवान श्री के शरीर को लेकर वह समुद्र में कूद जाते हैं, उनके पीछे-पीछे सुभद्रा भी कूद जाती है।

इसी समय भारत के पूर्व में स्तिथ इंद्रद्युम्न को स्वप्न आता है कि भगवान श्री कृष्ण का शरीर समुद्र में तैर रहा है अत उन्हें यहाँ श्री कृष्ण की एक विशाल प्रतिमा बनानी छाइये या मन्दिर का निर्माण कराना चाहिए। उन्हें स्वप्न में देवदूत बोलते हैं कि कृष्ण के साथ बलराम सुभद्रा की लकड़ी की प्रतिमा बनाई जाए और भगवान श्री कृष्ण के अस्थियों को उनके प्रतिमा के पीछे छेद करके रखा जाए।

राजा का सपना सच हुआ। उन्हें कृष्ण की अस्थियां मिल गई लेकिन अब वह सोच रहे थे कि इस प्रतिमा का निर्माण कौन करेगा? माना जाता है भगवान विश्कर्मा एक बढ़ई के रूप में प्रकट होते हैं और मूर्ति का कार्य शुरू करते हैं। कार्य  शुरू करने से पहले वह सभी से बोलते हैं कि उन्हें काम करते वक्त परेशान नहीं किया जाए नहीं तो वह बीच में ही काम छोड़कर चले जाएँगे।

कुछ महीने हो जाने के बाद मूर्ति नहीं बन पाती है तब उतावली के चलते राजा इंद्रद्युम्न बढ़ई के कमरे का दरवाजा खोल देते हैं और ऐसा करते ही भगवान विश्वकर्मा गायब हो जाते है। मूर्ति उस समय पूरी नहीं बन पाती है लेकिन राजा असेही मूर्ति को स्थापित कर देते हैं और सबसे पहले मूर्ति के पीछे भगवान श्री कृष्ण की  अस्थियां रख देते हैं और फिर मंदिर में विराजमान कर देते हैं।

एक राजसी जुलुस तीन विशाल रथों में भगवान श्री कृष्ण, बलराम और सुभद्रा के साथ हर  साल मूर्तियों के साथ निकाला जाता। भगवान श्री कृष्ण, बलराम और सुभद्रा की प्रतिमा हर 12 साल के बाद बदली जाती है।

जगन्नाथ पूरी का यह मंदिर एक लौता ऐसा मंदिर है जहाँ तीन भाई बहन की प्रतिमा एक साथ है और उनकी पूजा अर्चना की जाती है।

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जगन्नाथ पूरी के रथ यात्रा से जुड़े कुछ रोचक तथ्य – Jagannath Puri Mandir Rochak Tathya Hindi 

 

  • भारत के ओडिशा में स्तिथ पूरी नगरी में इन दिनों जगन्नाथ यात्रा की तैयारी अपने अंतिम चरण में है पर वर्ष में एक बार निकलने वाली इस रथ यात्रा का देश और दुनिया के लिए विशेष महत्व है। भारत के चार पवित्र धामों में से एक पूरी के 800 वर्ष पुराने मुख्य मंदिर में योगश्वर भगवान श्री कृष्ण जगन्नाथ के रूप में विराजते हैं।
  • पूरी में जगन्नाथ यात्रा में एक रथ नहीं बल्कि तीन रथ निकलते हैं जिसमें बलराम, श्री कृष्ण और सुभद्रा विराजमान होते हैं।
  • जगन्नाथ के रथ को गरुड़ ध्वज  या नन्दिघोषा, सुभद्रा की रथ को दर्पदलन और बलदेव के रथ को तालध्वज कहा जाता है जिनका रंग लाल और पीला होता है। यह रथ एक लाइन में होते हैं। इसमें से पहले रथ पर बलभद्र, बीच वाले रथ पर सुभद्रा जी और सबसे पीछे वाले रथ में जगन्नाथ जी विराजमान होते हैं।
  • जब यह रथ तैयार हो जाते हैं तो इसके बाद पूरी का राजा एक पालकी में बैठकर इनकी प्रार्थना करता है और प्रतीकात्मक रूप से रथ मंडप को झाड़ू से साफ करते हैं।
  • इसके बाद लगातार तीनों रथों को एक रस्सा से बांधा जाता है, इसे भक्तजन खींचते हैं। माना जाता है इन रस्सी को चुने मात्र से मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है और इंसान जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है।
  • भगवान का यह रथ पूरी नगर से होते हुए गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं जहाँ पर सात दिनों तक भगवान जगन्नाथ यहाँ पर विश्राम करते हैं। इसके बाद इन रथों को फिरसे आषाढ़ के दसवें दिन मुख्य मंदिर की ओर फिरसे वापस ले जाया जाता है।
  • इस मंदिर में आकर सभी मूर्तियां रथ पर ही रहती है। एकादसी के दिन मंदिर के द्वार खोलकर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मुर्तिया मंदिर के अंदर फिरसे स्थापित की दी जाती है।

 

तो यह थी पूरी के जगन्नाथ मंदिर से जुडी कहानी, उसका इतिहास और उससे जुडी कुछ रोचक तथ्य। उम्मीद है आपको यह लेख जानिए जगन्नाथ रथ यात्रा की कहानी, इतिहास और उससे जुडी कुछ रोचक तथ्य जरूर अच्छी लगी होगी अगर अच्छी लगे तो कमेंट करके बताइए और शेयर भी करें अपने बाकि दोस्तों के साथ।

 

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