जानिए गुरु पूर्णिमा की पूरी कहानी क्यों मनाई जाती है

जानिए गुरु पूर्णिमा की पूरी कहानी क्यों मनाई जाती है | Why Guru Purnima Celebrated | Guru Purnima 2021 in Hindi

गुरु पूर्णिमा की पूरी कहानी क्यों मनाई जाती है और कब मनाई जाती है

हेलो दोस्तों मेरे इस ब्लॉग पर आपका स्वागत है। आज इस लेख में मैं आपको गुरु पूर्णिमा के बारे में बताने वाली हूँ यानि गुरु पूर्णिमा कब मनाई जाती है क्यों मनाई जाती है इसके पीछे क्या कहानी प्रचलित है और इससे जुडी सारी छोटी बड़ी जो भी कहानी या जो भी बातें है वह सब इस लेख में बताने वाली हूँ।

 

गुरु पूर्णिमा की पूरी कहानी क्यों मनाई जाती है – Why Guru Purnima Celebrated

हमारे देश में गुरुओं का बहुत सम्मान किया जाता है क्यों कि एक गुरु ही है जो अपने शिष्य जको गलत मार्ग से हटाकर सही रास्ते पर लाता है। पौराणिक कल से सम्बंधित ऐसी बहुत सी कथाएं सुनने को मिलती है जिससे यह पता चलता है कि किसी भी व्यक्ति को महान बनाने में गुरु का विशेष योगदान रहा है।

 

इस दिन को मनाने के पीछे का एक कारण यह भी माना जाता है कि इस दिन मान गुरु महर्षि वेद व्यास जिन्होंने ब्रह्मासूत्र, महाभारत, श्रीमदभागवत और अठारा पुराण जैसी अद्भुत साहित्यों की रचना की, उनका जन्म हुआ था।

 

शास्त्र में आषाढ़ी पूर्णिमा को वेद व्यास का जन्म माना जाता है इसलिए आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष के पूर्णिमा के दिन गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। इस साल गुरु पूर्णिमा 24 जून को मनाई जाएगी।

 

इस दिन सभी शिष्य अपने अपने गुरुओं का आशीर्वाद लेते हैं और उन्होंने अब तक जो कुछ भी दिया है उसके लिए धन्यवाद देते हैं। गुरु के बिना एक शिष्य का जीवन का कोई अर्थ नहीं है। रामायण से लेकर महाभारत तक गुरु का स्थान सबसे महत्वपूर्ण और सर्वोच्चो रहा है।

 

 

गुरु की मेहता को देखते हुए महान संत कवीर दास जी ने लिखा है –

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पायं

बलिहारी गुरु अपने गोविन्द दियो बताय।

यानि एक गुरु का स्थान भगवान से भी कई ज्यादा बड़ा होता है।  गुरु पूर्णिमा का पर्व महर्षि वेद व्यास के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। वेद व्यास, जो ऋषि पराशर के पुत्र थे। शास्त्रों के के अनुसार महर्षि वेद व्यास को तीनो कालों का ज्ञाता माना जाता है। महर्षि वेद व्यास के नाम के पीछे की एक कहानी है। माना जाता है महर्षि व्यास ने वेदों को अलग अलग खंडो में बांटकर उनका नाम ऋक वेद, यदु वेद, शाम वेद और  अर्थ वेद रखा। वेदों का इस प्रकार बिभाजन करने के कारण ही वे वेद व्यास के नाम से प्रसिद्ध हुए।

 

गुरु पूर्णिमा मनाई जाने के पीछे प्रचलित कहानी 

महाभारत काल में महर्षि वेद व्यास के नाम से तो शायद ही कोई अनजान हो, यह वहीं मुनि श्रेष्ठ हैं जिन्होंने चारों वेदो का बिभाग किया, अठारा पुराणों की रचना की और श्रीमदभगवतगीता की रचना की। उन्हें गुरु शिष्य परंपरा का प्रथम गुरु माना जाता है। वे जानते थे कि यदि किसी व्यक्ति से कोई ज्ञान मिलता है, कुछ सिखने को मिलता है तो वो हमारे लिए गुरु समान है, पूज्यनीय है चाहे वो कोई छोटा सा जीव-जंतु, कोई प्राणी और मनुष्य ही क्यों न हो।

 

शास्त्रों में एक घटना का वर्णन आता है कि एक बार मुनिवर ने ग्रिल जाती के एक व्यक्ति को पेड़ को झुकाकर उससे नारियल तोड़ते हुए दिखा। उस दिन से व्यास जी उस व्यक्ति का पीछा करने लगे क्यूंकि ये विद्या सिखने की इच्छुक थे। पर वह व्यक्ति संकोच और डर के कारण वेद व्यास जी से दूर भागता है।

 

एक दिन पीछा करते -करते व्यास जी उस व्यक्ति के घर पहुंच गए, जहाँ वह तो नहीं उसका पुत्र मिल गया। उसने व्यास जी की पूरी बात सुनी और वह मंत्र देने को तैयार हो गया।

 

अगले दिन, व्यास जी पधारे और पुरे निति नियम के साथ उन्होंने वह मंत्र लिया। पिता ने यह सब देखा तो उससे रहा नहीं गया और उसने पुत्र से इसका कारण जानना चाहा। पुत्र की बात सुनकर पिता ने कहा, “बेटा मैं व्यास जी को यह मंत्र जानबूझकर नहीं देना चाहता था क्यों कि मेरे मन में यह बात थी की जिस व्यक्ति से मंत्र लिया जाता है वह गुरुतुल्य हो जाता है और हम लोग तो गरीब छोटी जाती के है तो ऐसे में क्या व्यास जी हमारा सम्मान करेंगे।

 

 

फिर पिता ने कहा कि, “यदि बेटा मंत्र देने वाले को पूज्य न समझाया जाए तो वह मंत्र फलित नहीं होता। पहले तुम जाओ और व्यास जी की परीक्षा लो वह तुम्हे गुरु सम्मान आदर देंगे या नहीं।”

 

पुत्र अदले ही दिन पहुंच गया व्यास जी के दरबार में, जहाँ वो अपने साथियों से विचार विमर्श कर रहे थे। अपने गुरु को देखते हुए व्यास जी दौड़कर आए पाठ पूजन कर निति नियम से उनका मान सम्मान किया। यह देखकर वह व्यक्ति बड़ा प्रसन्न हुआ और तब उसकी और उसकी  सारी दुबिधाएँ मिट गई। जो व्यक्ति एक छोटी जाती के व्यक्ति को भी गुरुतुल्य महत्व देता है वो वाकई में परम पूज्यनीय है। और तभी से यह गुरु शिष्य परंपरा में व्यास जी को सबसे अग्रणीय गुरु माना जाने लगा और वर्ष में एक दिन ब्रह्मा ज्ञानी सद्गुरु को समर्पित किया गया, जो व्यास पूर्णिमा या गुरु पूर्णिमा के नाम से प्रचलित है।

 

गुरु पूर्णिमा के दिन गुरुओं का पूजन किया जाता है। गुरु की हमारे जीवन में महत्व को समझाने के लिए गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा पर लोग अपने गुरुओं को उपहार देते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं।

 

जिन लोगों के गुरु  अब इस दुनिया में नहीं रहे वे लोग भी गुरुओं के चरण पादुका का पूजन करते हैं। माना जाता है कि इस दिन गुरुओं का आशीर्वाद लेने से जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। शास्त्र में गुरु को परम पूज्यनीय माना गया है।

 

तो दोस्तों इस लेख में मैं आप सबको गुरु पूर्णिमा से सम्बंधित वह सारी जानकारी बताया है यह कब मनाया जाता है, क्यों मनाया जाता है, और इसके पीछे की क्या कहानी है यह सब कुछ मने इस लेख जरिए बताने की कोशिश की है।

उम्मीद करते है आपको यह लेख पसंद आई होगी अगर पसंद आए तो अपना विचार हमें जरूर बताए और शेयर भी करें अपने दोस्तों और परिवारजनों के साथ।

 

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