बूढ़ी माँ

बूढ़ी माँ – इस माँ की कहानी सुनकर रो पड़ोगे

बूढ़ी माँ की कहानी Budhi Maa Ki Kahani in Hindi 

 

बूढ़ी माँ की कहानी 

बेटा आज मेरा चस्मा टूट गया है, जरा तू शाम को ऑफिस से आते वक्त ठीक करवा लाना। “माँ मैंने तुझसे हजार बार कहा कि ऑफिस जाते वक्त टोकाटाकी मत किया करो, पर तुम हो कि समझते ही नहीं हो। सारा मूड ख़राब करके रख दिया।” गुस्सा करते हुए राकेश ने कहा।

 

बेटे से ऐसी बात सुनकर बेचारी माँ क्या करती। अपने आँखों में आए आंसुओ को छुपाने की कोशिश करती हुई अपने कमरे में चली गई। राकेश तीन मंजिला बंगले में बस वह, उसकी पत्नी और उसके दो बच्चे और उसकी विधवा माँ रहती थी। लेकिन वह कहते है न कि बड़े घर में रहने वालो के दिल बहुत छोटे होते हैं और बस ऐसाही कुछ हाल था राकेश और उसकी पत्नी अनीता का।

 

राकेश की माँ जिन्होंने राकेश को बचपन में बहुत ही मुस्किलो से पाला, आज उनका उसी राकेश के घर में बुरा हाल। राकेश के पिता, जब राकेश सिर्फ पांच वर्ष का था तभी उसको अकेला छोड़कर इस दुनिया से चले गए। उसकी माँ ने दुसरो के घर में झाड़ू, पोछा, वर्तन मांजना आदि काम करके इतनी तकलीफो से राकेश को पाल पोषकर बढ़ा किया। उसको अच्छी शिक्षा दिलाई। एक काबिल इंसान बनाया। अगर कोई कहता – अरे राकेश की माँ, तू सारादिन इतना काम करती रहती है कभी तो अपने बारे में भी कुछ सोचा कर। इस पर वह बड़े गर्भ के साथ उत्तर देती – अरे बस कुछ दिनों की ही तो बात है फिर देखना बड़ा होकर मेरा बेटा एक बहुत ही अमीर आदमी बनेगा और मेरा बहुत ख्याल भी रखेगा। लेकिन उस बेचारी को क्या पता था कि उसका यह ख्वाब बस ख्वाब ही बनकर रह जाएगा।

 

जैसे-जैसे राकेश बड़ा होता गया वैसे-वैसे वह कामियाब होता। अब उसका बड़े-बड़े लोगों के साथ उठना-बैठना हो गया। उन लोगों के साथ पीना पिलाना भी शुरू हो गया। अगर माँ कभी टोक देती तो राकेश कहता,  “माँ तू कुछ नहीं समझती।” राकेश अपने उन रईस मित्रों से माँ को मिलवाने में शर्म महसूस करता था। राकेश ने भी बिना बताए शहर के एक बड़े बिजनेसमैन की बेटी के साथ शादी कर ली। लेकिन इन सबके बीच वह अपनी माँ की सारी कुर्बानियों को भूल चूका था।

 

राकेश की पत्नी राकेश को बिलकुल भी पंसद नहीं करती थी। एक दिन घर में पार्टी चल रही थी। राकेश की पत्नी अपनी सहेलियों को अपना नया हीरो का हार दिखा रही थी, जो की राकेश ने उसके जन्मदिन पर दिया था। उसकी सहेलियां उसकी तो कभी उसकी हार की तारीफ करती नहीं थक रही थी। तभी अचानक उसकी बूढ़ी सास पानी लेने के लिए कमरे से बाहर गई और उसने बहु से कहा, “बहु जरा एक गिलास पानी दे दो, बहुत प्यास लगी है।”

 

राकेश की पत्नी बहु शब्द सुनकर बहुत बुरा लगा। वह मुँह बनाते हुए उठी और अपने सास को घसीटते हुए कमरे में ले गई और बहुत ही तीखे स्वर में बोली, “क्या जरुरत थी बाहर आने की।” उसकी सास बोली, “बहु बहुत प्यास लगी थी।” राकेश की पत्नी चिल्लाती हुई बोली, “प्यास ही लगी थी न मर तो नहीं थी न। मेरी नाक कटाकर रख दी सबके सामने।” इतना कहकर वह बाहर निकल गई। अब तो मानो ये रोज का सिलसिला हो गया।

 

कभी राकेश तो कभी उसकी पत्नी माँ को अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। आखिर एक माँ, माँ होने के साथ-साथ  एक इंसान भी तो होती है। क्या उसे जीने का हक़ नहीं है। आखिर कब तक सहन करती वह यह सब। और जब सब्र का बांध टूट गया तो उसकी माँ राकेश से बोली, “बेटा तू एक काम कर मुझे बृद्धाश्रम छोड़ दे। इस पर भी राकेश और उसकी पत्नी दोनों गुस्से में हो गए।

 

राकेश की पत्नी बोली, “अब इस उम्र में यही दिन देखना बाकि रह गया था। सारी दुनिया हम पर थूकेगी। लोग कहेंगे की बूढ़ी माँ को बृद्धाश्रम छोड़ दिया। तुम्हे आखिर तकलीफ क्या है यहाँ? खूब मजे में तो रह रही हो। तुम यही चाहती हो न कि हम बदनाम हो जाए।”राकेश की माँ समझ भी नहीं पा रही थी कि आखिर उसका कसूर क्या है और वह एक बार फिर अपने कमरे में चली गई। 

 

समय गुजरता गया। फिर एक समय ऐसा आया जब हमारे देश में पुराने नोट बंद हो गए और इसके तहत हर व्यक्ति अपने खाते में सिर्फ ढाई लाख तक के ही पुराने नोट जमा कर सकता था। राकेश भी अब बहुत परेशान हो गया क्यों की उसके पास तो बहुत सा काला धन था। इस मुसीबत की घडी में उसे सबसे पहले अपनी माँ की याद आई।

 

भागा-भागा राकेश अपने माँ के पास गया और किनारे पर रखी टेबल से टकराया। माँ ने तुरंत पूछा, “बेटा कहीं चोट तो नहीं लगी।” लेकिन राकेश के दिल में तो पाप बसा था। राकेश बोला, “अरे माँ यह सब छोड़ो और मुझे जल्दी से अपना पासबुक दो। मुझे जल्दी से तेरे खाते में पैसे जमा कराने है।”

 

भोली-भाली माँ उसकी चालो को समझ ना पाई और उसकी माँ बोली, “मुझे पैसों की भला क्या जरुरत है बेटा?” राकेश बोला, “मेरा समय मत बर्बाद करो और जल्दी से अपना पासबुक दे दो।” इतना कहकर माँ के हाथ से पासबुक लेकर वह  तेजी से निकल गया। आज उस माँ की ममता ठगी गई थी। आज उस माँ के आँखों से आंसू बहते ही जा रहे थे मानो आज यह आंसू अपने संग सबको बहा ले जाएंगे।

 

माँ ने अपने आंसू पोछे और बैग में अपना सामान भरकर दरवाजे के बाहर चला गया। तभी राकेश की पत्नी ने कहा, “कहाँ जा रही हो?” इधर राकेश के सामने समस्या थी अपने काले धन को ठिकाने लगाने की। उसने अपने कई पैसे कई अपने जान पहचान के कई लोगों के खाते में जमा करा दिए लेकिन गलत तरीके कमाई गई  इतने धन को ठिकाने लगाना भी इतना आसान नहीं था।

 

अब जब सभी के खातों में पैसे जमा हो चुके थे तो फिर कोई उपाय न देख उसने मंदिरो में दान करने की सोची। एक मंदिर से दूसरे मंदिर की चक्कर लगा रहा था पर कोई फायदा न हुआ। क्यों उस समय सारे मंदिरो के दान पेटियों को सील कर देने का आदेश दिया गया था। अब उसके चारो ओर निराशा ही निराशा छाया हुआ था। तभी अचानक उसके मन में एक ख्याल आया और वह जल्दी से गाड़ी में बैठकर चल पड़ा।

 

राकेश ने गाड़ी रोकी और जल्दी से बृद्धाश्रम कि ओर भागा। लेकिन तभी अपने सामने उसके माँ को देखकर उसके कदम रुक गए। राकेश की माँ ने कहा, “बेटे तुम यहाँ से जाओ। इस बिद्धाश्रम को तुम्हारे पैसों की जरुरत नहीं है।”

 

राकेश मुँह लटकाये हुए घर आ गया। अब उसे अपने गलती पर बहुत पछतावा हो रहा था। उसने पैसों के लिए अपनी माँ को छोड़ा। गलत तरीको से लोगों को परेशान करके पैसा कमाया। जिस पैसों पर इतना घमंड करता था उसके सारे घमंड अब टूट चुके थे। और अब उसने अपनी माँ और उसके प्यार को भी खो दिया।

 

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