चंद्रगुप्त की कहानी | Story of Chandragupta in Hindi

चंद्रगुप्त की कहानी | Story of Chandragupta in Hindi

 

आज हम जिसकी कहानी सुनेंगे वह है सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य (Story of Chandragupta in Hindi) की। तो चलिए कहानी को शुरू करते हैं।

 

चंद्रगुप्त की कहानी

Chandragupta Story in Hindi 

आज से लगभग 2300 साल पहले एक महान प्रतापी राजा ने भारत को एकता के सूत्र में बांधा। पटना से बलूचिस्तान, अफगानिस्तान, दक्षिण में  मैसूर, गुजरात में दूर-दूर तक शासन किया। इनकी  सुसंगठित सेना में 2 लाख पैदल सैनिक, 80 हजार घोड़े पर चलने वाले सैनिक, 8 हजार संग्राम रथ और 9 हजार हाथी थे।

 

इस महान सम्राट का बचपन बहुत ही संघर्ष में बीता। लेकिन यह बचपन से ही अद्भुत प्रतिभा का धनी था, जो सभी को अपनी और आकर्षित करती थी। यह एक खेल खेलता था जिसमें वह खुद राजा बनता, ऊँचे सिंहासन पर बैठता, राजसभा लगाता तो और मंत्री अध्यक्ष कार्यवाहको की नियुक्ति भी स्वयं ही करता था।

 

एक दिन इस बालक को यह खेल देखते हुए एक बड़े विद्वान पंडित ने देखा। इन विद्वान व्यक्ति का एक बार पाटलिपुत्र में, जिसे आज हम पटना कहते हैं, वहां के राजा धनानंद ने अभिमान में होकर अपनी भरी राज्यसभा में उन्हें अपमान कर दिया था। तो यह एक ऐसे प्रतिभावान इंसान को ढूंढ रहे थे जो की अभिमानी, गर्वित राजा धनानंद को हरा सके और इनकी अपमान का बदला ले सके।

 

उस विद्वान व्यक्ति को इस लड़के में अलौकिक तेज, बुद्धिमता और नेतृत्व जैसे अद्भुत प्रतिभा नजर आई। उन्हें लगा कि यह बालक उनकी सहायता कर सकता है। पर उस बालक को अपने साथ ले जाने के लिए रुपयों का लालच देकर उन्हें खरीदना पड़ा और वह उसको अपने साथ तक्षशिला ले गए।

 

तो यह बालक अपने गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण और उनके कुशल मार्गदर्शन में धीरे-धीरे बड़ा होने लगा। उसने शिक्षा के साथ अस्त्र शस्त्र की विद्या, राजनीती, रणनीति यानि कि युद्ध कैसे जीता जाए  आदि सीखते हुए सभी नीतियों में पारंगत और माहिर बन रहा था। गुरु शिष्य की यह जोड़ी पपुरे विश्व में विख्यात हुई, चाणक्य और चंद्रगुप्त के नाम से।

 

चाणक्य चन्द्रगुप्त को एक महान राजा के रूप में देखना चाहते थे। चन्द्रगुप्त भी अपने गुरु के हर  आदेश का पूरी निष्ठां से पालन करते थे। गुरु चाणक्य की नीति और उनकी सूझबूझ से सबसे पहले उन्होंने आसपास के छोटे छोटे गाँव के साथ मित्रता कर अपने सेना की शक्ति को बढ़ाया।

 

अब अगला लक्ष था छोटे छोटे टुकड़ो में बिखरे भारत को संगठित देश के रूप में स्थापित करने का। क्यूंकि उस समय देश में एक जुटता नहीं थी, छोटे छोटे शासक यहाँ वहां अलग अलग शासन चलाते थे और इससे जब भी विदेशी आक्रमण होता था तो वह हार जाते थे और अपना राज्य गवा बैठते थे।

 

 

उस समय भारतवर्ष के लिए सबसे बड़ा खतरा ग्रीक देश का सिकंदर था,  विश्व विजेता यानि पुरे दुनिया का राजा बनना चाहता था। उसने ईरान, तुर्किस्तान और अफगानिस्तान को जीत लिया था और अब वह छोटे छोटे राज्य पर आक्रमण कर भारत की तरफ आगे बढ़ रहा था। लेकिन चन्द्रगुप्त की वीरता, युद्धकौशल की बजह से सिकंदर को भारत में प्रवेश करना मुश्किल सा लग रहा था। इसलिए उसने चन्द्रगुप्त मारने का आदेश जारी कर दिया।

 

सिकंदर चन्द्रगुप्त तक पहुँचता उससे पहले ही चन्द्रगुप्त ने सिकंदर के दो ताकतपर मित्रों को मार गिराया  सिकंदर को भारत छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। लौटते समय सिकंदर इतना बीमार और निराश था कि अपना देश ग्रीक तक नहीं पहुंच पाया और रास्ते में ही उसके प्राण निकल गए।

 

सिकंदर को हराने के बाद चन्द्रगुप्त का अगला लक्ष था अभिमानी राजा धनानंद को हराकर चनण्क्य के अपमान का बदला लेना। अपने गुरु की कुशल नीति से उसने धनानंद को हराकर चन्द्रगुप्त पाटलिपुत्र यानि पटना के राजा बने और चाणक्य को प्रधानमंत्री बनाया। सिकंदर की मृत्यु के बाद भारत में अधिकृत क्षेत्रों का राजा बना सेल्यूकस।

 

अब चन्द्रगुप्त ने बड़ी बहादुरी से सेल्यूकस को हराया और अफगानिस्तान और बलूचिस्तान पर अपना एकाधिपत्य स्थापित किया। फिर मध्यप्रदेश और गुजरात में भी अपना शासन किया। चन्द्रगुप्त की वीरता और पराक्रम को देखकर सेल्यूकस ने अपनी पुत्री कार्नेलिया का विवाह चन्द्रगुप्त से कर दिया।

 

चाणक्य के कुशल नेतृत्व में आगे बढ़ने के साथ साथ सम्राट चन्द्रगुप्त साधु संतो का भी सम्मान करते थे। एक दिन उन्हें समाचार मिला कि उनके गुरु चाणक्य की मृत्यु हो गई है। अपने गुरु चाणक्य की मरण से चन्द्रगुप्त को गहरा आघात लगा। उन्हें ऐसा विश्वास था कि जीवन भर उनके गुरु उनके साथ रहेंगे। लेकिन जीवन की सच्चाई तो कुछ और  ही थी। वह दिन रात इसी चिंतन में दुबे रहते कि महान सम्राट बनने के बाद और दिन रात संपत्ति इकट्ठा करने के बाद जब हमें सब कुछ छोड़कर यही जाना है तो इन सबका क्या मतलब?

 

एक दिन चन्द्रगुप्त ने षोला विचित्र स्वप्न देखा। उन स्वप्नों से चन्द्रगुप्त का मन बहुत व्यतीत हो गया। तभी चन्द्रगुप्त को समाचार मिला कि उनके नगरी में आचार्य भद्रबाहु का आगमन हुआ है। चन्द्रगुप्त तो शीघ्र ही आचार्य जी के पास पहुंचे और उनसे अपने षोला स्वप्नों के बारे में पूछा।

 

स्वप्नों के बारे में अच्छे से जानकर चन्द्रगुप्त ने अपने पुत्र बिंदुसार का राज्याभिषेक कर आचार्य भद्रबाहु के चरणों में जैन मुनि दीक्षा ले ली। आचार्य भद्रबाहु के चरणों का सहारा पाकर वह अपने समस्त परिग्रह, सारा राजपाठ को त्यागकर अपने आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने लगे।

 

आचार्य भद्रबाहु ने कई बार चन्द्रगुप्त की की नेतृत्व की परीक्षा ली मतलब कही वह एक मुनि है या कही अपने अभी भी सम्राट के भाव उनके मन में है। लेकिन चन्द्रगुप्त तो हर परीक्षा में  सफल हुए। आचार्य भद्रबाहु अपनी समाधी श्रवणबेलगोला के पहाड़ी पर लेना चाहते थे इसलिए मुनि चन्द्रगुप्त भी आचार्य भद्रबाहु के साथ आत्मा के कल्याण के लिए श्रवणबेलगोला पहुंचे। उन्होंने अपने गुरु की बहुत भक्तिभाव से सेवा की।

 

 

आचार्य भद्रबाहु के समाधी के बाद वही पर यानि की उसी गुफा में मुनि चन्द्रगुप्त ने अपने गुरु की विशाल चरण चिन्ह बनवाए। गुरु के चरणों को साक्षी मान वहीं वह निरंतर ध्यान करते थे। कुछ समय बाद उनका भी समाधिपूर्ण मरण हो गया। यह पर्वत धीरे-धीरे तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध हो गया और इसका नाम पड़ गया तीर्थगिरी।

 

तो यह थी चन्द्रगुप्त की कहानी। हमें उम्मीद है कि आपको यह कहानी “चंद्रगुप्त की कहानी | Story of Chandragupta in Hindi” जरूर अच्छा लगा होगा अगर अच्छा लगे तो इसे शेयर करे और असेही और भी कहानियां पढ़ने के लिए इस ब्लॉग को सब्सक्राइब कीजिए।

 

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