Sarpanch Ka Nyay Hindi Story  

सरपंच का न्याय | Sarpanch Ka Nyay Hindi Story

फ्रेंड्स आज मैं आपके साथ जो कहानी शेयर करने वाली उस कहानी का नाम है सरपंच का न्याय (Sarpanch Ka Nyay Hindi Story) इस कहानी में एक कंजूस व्यापारी के बारे में बताया गया है जो वयापरी बहुत ही कंजूस था और उसे अपने गलती की बजह से भी अंत में पछताना पड़ा।

 

सरपंच का न्याय

Sarpanch Ka Nyay Hindi Story  

एक समय की बात है, एक  गाँव में एक कंजूस व्यापारी रहता था। एक दिन उसकी सौ स्वर्ण मुद्राओं से भरी हुई पोटली कहीं खो गई। उसने अपने गाँव के सरपंच के पास अपनी शिकायत दर्ज करवाई। सरपंच ने कंजूस व्यापारी को सलाह दी, “देखिए व्यापारी हम अपने आदमियों को हर जगह भेजकर पोटली ढूंढवाएंगे। लेकिन क्यूंकि अब पोटली ढूंढने का और कोई तरीका नहीं है तो अच्छा होगा कि आप पोटली ढूंढने वालो के लिए दस स्वर्ण की मुद्राएं इनाम घोषित कर दे।”

 

कंजूस व्यापरी ने बिना मन से इनाम के लिए हाँ कर दी। उधर वह पोटली रास्ते में पड़ी हुई एक मजदुर को मिली। मजदुर पोटली लेकर व्यापारी के पास देने गया। व्यापारी ने पोटली ख़ुशी ख़ुशी ले ली। उसने मजदुर को धन्यवाद दिया और अपना दरवाजा बंद कर दिया। मजदुर ने सोचा व्यापारी ने इनाम के दस सोने की मुद्राएँ लेने अंदर गया होगा थोड़ी देर में आ जाएगा, वह वहां बहुत देर खड़ा रहा।

 

जब कंजूस व्यापारी अब तक नहीं आया तो उसने दोबारा घंटी बजाई। मजदुर को देख व्यापारी बोला, “बोलो अब क्या है?” मजदुर ने इनाम के दस स्वर्ण मुद्राएँ मांगी। इस पर कंजूस व्यापारी बोला, “कैसा इनाम? मेरी पोटली में 110 स्वर्ण मुद्राएँ थी, अब इसमें केवल सौ स्वर्ण मुद्राएँ है। इसका मतलम तुमने पहले ही इनाम के दस मुद्राएँ निकाल ली। चलो चलो जाओ कोई इनाम नहीं है।” इतना कहकर उसने फिरसे दरवाजा बंद कर दिया।

 

 

मजदुर व्यापारी की शिकायत लेकर सरपंच के पास गया। सरपंच ने व्यापारी को पोटली लेकर तुरंत बुलवाया। व्यापारी सरपंच का कहा टाल नहीं सकता इसलिए वह पोटली लेकर सरपंच के पास पहुंचा। सरपंच ने व्यापारी से अपनी पोटली दिखाने को कहा। पोटली को अच्छी तरह देख परखकर सरपंच ने पूछा, “क्या आप विश्वास से कह सकते हो कि आपके पोटली में 110 स्वर्ण मुद्राएँ थी सौ नहीं?” व्यापारी ने झट से हाँ कह दिया। इस पर सरपंच बोला, “फिर तो मुझे लगता है यह पोटली आपकी नहीं है। क्यूंकि 110 स्वर्ण मुद्राओं के लिए यह पोटली बहुत छोटी है। इस पर इतनी मुद्राएँ नहीं आ सकती। इस पोटली में तो केवल सौ मुद्राएँ ही आ सकती है।”

 

अब सरपंच वह पूरी पोटली उस मजदुर को देते हुए बोला, “मजदुर भाई! यह पोटली इन व्यापारी की नहीं है। इनके  पोटली में तो 110 स्वर्ण मुद्राएँ थे और क्यूंकि इस पोटली का असली मालिक कौन है यह हम नहीं जानते है और न ही अब तक किसी ने सौ स्वर्ण मुद्राएँ  खोने की शिकायत दर्ज करवाई है। इसलिए मैं यह पूरी पोटली तुम्हे तुम्हारी ईमानदारी के लिए इनाम के तौर पर देता हूँ।”

 

व्यापारी कुछ न बोल सका। क्यूंकि वह यह बात कह चूका था कि उसकी पोटली में 110 स्वर्ण मुद्राएँ थी। अब सरपंच के सामने वह हाथो हाथ मुकर नहीं सकता था। इसलिए उसे चुपचाप अपनी पोटली मजदुर के हाथो जाते देखनी पड़ी। लेकिन यही उसका सबक था।

 

 

इस कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती है कि धोखेबाजों की हमेशा हार होती है और न्याय की कुर्सी पर बैठने वाले को बिना किसी पक्ष पर उचित न्याय करना चाहिए। सरपंच ने सचमुच बहुत अच्छा न्याय किया।

 

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