बिसरा मुंडा का जीवन परिचय | Birsa Munda Story in Hindi

बिरसा मुंडा का जीवन परिचय | Birsa Munda Story in Hindi

बिरसा मुंडा का जीवन परिचय (Birsa Munda Story in Hindi) 

“मैं केवल देह नहीं

मैं जंगल का पुस्तैनी दावेदार हूँ

पुश्तें और उनके दावे मरते नहीं

मैं भी मर नहीं सकता

मुझे कोई भी जंगलों से बेदखल नहीं कर सकता

उलगुलान!

उलगुलान!!

उलगुलान!!!”

कवि हरिराम बीणा की यह पंक्तिया आदिवासियों के हक़ और अधिकारों के साथ-साथ संघर्ष की एक कहानी बया करती है, जो उपनिषदवादी ऍंगरेज सरकार, साहूकार और जमींदारियों के अमाननीय नीतियों पर कड़ा प्रहार करती है। भारत के दो तिहाही क्षेत्र पर कब्ज़ा जमाए ऍंगरेज सरकार जब आदिवासियों पर अन्य कानून लादकर उनके जल, जंगल, जमीन के अधिकारों को नियंत्रित करने की कोशिश की तब अपने कुदरती अधिकारों के संरक्षण में उलगुलान का नारा देते हुए अपने अनपढ़ आदिवासी भाइयों ने क्रांति की ज्वाला भड़काने वाले बिसरा मुंडा की यह कहानी बड़ी ही प्रेरणदायी है। तो आइए फ्रेंड्स जानते है देश के एक महान क्रांतिवीर के बारे में, जिनकानाम है बिसरा मुंडा

 

Birsa Munda Story in Hindi

बिहार का दक्षिण क्षेत्र जो बर्तमान झाड़खंड राज्य के रांची जिले का पहाड़ी और जंगली इलाका है, सदियों से बिभिन्न आदिवासी जनजातियों का यह गृहस्थान है। तब के बंगाल प्रेसीडेंसी ने आने वाले इस क्षेत्र में मुंडा जनजाति विपुल मात्रा में निवास करती थी। घास काटना, भेड़ बकरियां चराना, लकड़िया इकट्ठा करना जैसे दैनिक  कार्य करने वाले इन आदिवासियों जनजातियों का जीवन पूर्ण जंगल की सम्पदा पर निर्भर था।

 

इसी क्षेत्र के छोटे से आदिवासी गाँव उलिहातू चालकाद में 15 नवंबर सन 1875 में बिरसा मुंडा का जन्म हुआ। इनके पिता का नाम सुगना मुंडा और माता का नाम करमी हातु था। बृहस्पतिवार मतलब उनकी प्रचलित भाषा में वीर बार के दिन जन्म होने के कारण इनका नाम बिरसा रखा गया।

 

बिरसा बचपन में भेड़ चराते, बांसुरी बजाते, अपने प्रचलित भाषा में गीत गाते, जंगल और अपनी जनजाति से उनका अपार स्नेह था। साल्गा गाँव में प्रारंभिक पढाई के बाद उन्होंने चाईबासा इंग्लिश मिडिल स्कूल में पढाई किया। वह पढाई में काफी तीक्ष्ण थे। प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने अपने पिता से क्रिस्चियन मिशनरी में पढ़ने की इच्छा व्यक्त की।

 

उस समय क्रिस्चियन स्कूलों में दूसरे धर्म के विद्यार्थियों को पढ़ने की अनुमति नहीं थी। फिर न चाहते हुए भी धर्मान्तरण करना पड़ा। क्रिस्चियन स्कूल में दाखिल होते ही बिरसा मुंडा का नामकरण बिरसा डेविड किया गया। अंग्रेजी शिक्षा के दौरान ही बिरसा मुंडा को अनुभव हुआ कि अंग्रेज सरकार हम भूमि पुत्रों को जबरन धर्मांतरित करके उनके बाइबिल हमें सौंपकर अपनी जमीन छीनना चाहते है।

 

दमन की इस नीति का निषेध करते हुए बिरसा स्कूल छोड़कर अपने गाँव चले आते हैं। इस दौरान अंग्रेज सरकार ने Indian Forest Act 1882 पारित कर आदिवासियों को जंगल के अधिकारों से बंचित कर दिया, जिसके चलते जंगल से सटे इलाके में अंग्रेज और उनके दलालों की आवाज काफी बढ़ गई थी। कई क्षेत्रों दलालों द्वारा खतिया लिए गए थे और भोले भले आदिवासियों को जंगल की संपत्ति का इस्तेमाल करने में विरोध हो रहा था।

 

अपनी साझा संपत्ति का हरण होते देख बिरसा मुंडा व्यथित हो उठे। उन्होंने देखा अपने अनपढ़, अशिक्षित जनजाति अंधश्रद्धा में काफी लिप्त है। इसी बात का फायदा उठाकर हम इन्हे अंग्रेज सरकार के खिलाफ एकजुट कर सकते है। उन्होंने खुदको धरती बाबा अर्थात इस धरती के देवता के रूप में घोषित कर दिया।

 

 

बिरसा में बिलक्षण शक्ति है। अंग्रेज की गोलिया उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती है ऐसी धारणा आदिवासियों में आग की तरह फ़ैल गई और फिर बिरसा से मिलने और उनके भाषण सुनने लोगों का जूनून बढ़ने लगा। उन दिनों चेचक और हैजे की बीमारी ने सबको घेरा रखा था। हजारों लोग मर रहे थे। ऐसे में सुशिक्षित बिरसा अपने आदिवासी लोगों को स्वच्छता और सावधानी के तौर तरीके समझाकर बीमारी से काफी हद तक बचाने में कामियाब हो जाते हैं। इसलिए लोग उन्हें सींग बोगा का दूत मतलब भगवान का दूत समझकर उनको पूजने लगते है।

 

उन्होंने अपने भाषणों से आदिवासी मुंडाओं को अंग्रेज सरकार और साहूकारों की नीतियों से अवगत करवाया। देखते ही देखते बिरसा की समर्थको की संख्या हजारों में पहुंच गई। उन्होंने अपने अनुयायियों का एक दल स्थापित किया, जिसका नाम वीरसाइट रखा गया। सन 1895 में बिरसा ने अंग्रेजो की लागु की गई जमीनदारी प्रथा और राजस्व व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई के साथ-साथ जंगल जमीन की लगाई छेड़ी।

 

बिरसा ने सूदखोर महाजनों के खिलाफ जंग का एलान किया। यह विद्रोह मात्र नहीं था, आदिवासी अस्मिता, स्वतंत्रता और संस्कृति को बचाने के लिए एक संग्राम था, उलगुलान। उलगुलान मतलब प्रचंड विद्रोह। बिरसा ने अबुवा दिशुम अबुवा राज यानि हमारा देश हमारा राज का नारा दिया।

 

देखते ही देखते चोटनागपुर के सभी आदिवासी जंगल दावेदारी के लिए एकजुट हो गए। अंग्रेजी सरकार के पाव उखड़ने लगे। महाजन, जमींदार उलगुलान के भय से काँपने लगे। अंग्रेजी सरकार ने बिरसा के उलगुलान को दबाने की हर मुमकिन कोशिश की लेकिन आदिवासियों के युद्ध के सामने उनकी कुछ नहीं चली। बिरसा और उनके अनुयायिओं ने अंग्रेजो की नाक में दम करके रखा था।

 

सन 1899 के दिसंबर महीने में क्रिसमस की रात वह पूर्ण क्रांति की घोषणा करते हुए अंग्रेजो और दलालो के ऊपर भारी आक्रमण कर देते हैं। इस हमले में कई दलाल, अंग्रेज अधिकारी मौत के घाट उतार दिए जाते हैं। कई पुलिस कर्मियों को भी मार दिया जाता है। उनकी संपत्ति को जलाया जाता है। इस घटना से दलाल और जमींदार बिरसा के नाम से भयभीत हो उठते हैं। अंग्रेज सरकार बिरसा पर 500 रूपए का इनाम रखते हैं।

 

जनुअरी 1900 में डोम्बरी पहाड़ी पर बिरसा अपने विशाल जनसभा को संबोधित कर रहे थे। तभी अंग्रेज सिपाही उन्हे चारो तरफ से घेर लेते है। अंग्रेज और आदिवासियों के बीच भीषण संघर्ष होता है। बंदूकों का सामना यह धनुष भला कब तक कर पाते। औरते और बच्चे समेत बहुत से लोग मारे जाते हैं। अंत में स्वयं बिसरा भी 3 फेब्रुअरी 1900 को चक्रधरपुर में गिरफ्तर कर लिए जाते हैं। जल, जंगल, जमीन के अधिकार को प्राप्त करने निकला यह तूफान आखिरकार गिरफ्त हो जाता है।

 

 

गिरफ़्तारी के दौरान अंग्रेज सरकार बिरसा पर काफी जुलुम उठाती है। कई अत्याचार सहने के बाद 9 जून सन 1900 के दिन बिरसा को वीरगति प्राप्त होती है। बिरसा ने केवल अपने 25 साल के उम्र में समस्त देशवासियो को स्वाभिमान और स्वतंत्रता का अद्भुत पाठ पढ़ाया। मुंडा जनजाति आज भी बिरसा को भगवान बिरसा के रूप में याद करते हैं। उनके मृत्यु दिन को बलिदान दिवस के रूप में मनाया जाता है। बिरसा मुंडा के अद्भुत संकल्प और साहस को हम नमन करते हैं।

 

हमें उम्मीद है आपको इस लेख में बिरसा मुंडा (Birsa Munda Story in Hindi) के बारे में एक अच्छी जानकारी मिली होगी। अगर आपको लगे की हमने आपको इस लेख के माध्यम से एक मूल्यवान जानकारी प्रदान करि है तो फिर इस लेख को सबके साथ शेयर जरूर करे।

 

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