मेजर ध्यानचंद का जीवन परिचय | Biography of Major Dhyan Chand in Hindi

मेजर ध्यानचंद का जीवन परिचय | Biography of Major Dhyan Chand in Hindi | हॉकी के जादूगर ध्यानचंद

नमस्कार दोस्तों, आज के एक नए लेख में आप सबका फिरसे स्वागत है हमारे ब्लॉग में। आज इस लेख में हम जानेंगे हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद जी मेजर ध्यानचंद का जीवन परिचय | Biography of Mejor Dhyan Chand in Hindi. यह लेख आपके लिए बहुत ही महत्वपूर्ण साबित हो सकती है क्यूंकि इस लेख में उनके जीवन से संवंधित सारी जानकारियों को बताया गया है। तो चलिए जान लेते है मेजर ध्यानचंद जी का जीवन परिचय।

 

मेजर ध्यानचंद का जीवन परिचय – Biography of Mejor Dhyan Chand in Hindi

ध्यानचंद जी को दुनिया के महान हॉकी प्लेयरों में से एक माना जाता है और यह एक भारतीय हॉकी प्लेयर थे। ध्यानचंद जी को अपने अलग तरीके से गोल करने के लिए याद किया जाता है। उन्होंने भारत देश को लगातार तीन बार ओलोम्पिक में स्वर्ण पदक दिलाया था। यह वह समय था, जब भारत की हॉकी टीम सबसे प्रमुख टीम हुआ करती थी। ध्यानचंद जी का बॉल में पकड़ बहुत अच्छी थी और इसलिए उन्हें “दी विजार्ड कहा जाता था।

 

ध्यानचंद जी ने अपने अंतराष्ट्रीय खेल के सफर में 400 से अधिक गोल किये थे। उन्होंने अपना आखरी अंतराष्ट्रीय मैच 1948 में खेला था। ध्यानचंद को अनेको अवार्ड से सम्मानित किया गया है।

 

ध्यानचंद का जन्म और जीवन परिचय 

ध्यानचंद का जन्म उत्तरप्रदेश के इलाहबाद में 29 अगस्त 1905 को हुआ था। वे कुशवारा, मौर्य परिवार के थे। उनके पिता का नाम समेश्वर सिंह था, जो ब्रिटिश इंडियन आर्मी में एक सूबेदार के रूप कार्यरत थे, साथ ही हॉकी गेम खेला करते थे। ध्यानचंद के दो भाई थे, मूल सिंह एवं रूप सिंह। रूप सिंह भी ध्यानचंद की तरह हॉकी खेला करते थे, जो अच्छे खिलाडी भी थे। ध्यानचंद के पिता समेश्वर आर्मी में थे, जिस बजह से उनका तबादला आए दिन कहीं न कहीं होता रहता था। इस बजह से ध्यानचंद ने कक्षा छठवीं के बाद अपनी पढाई छोड़ दी। बाद में ध्यानचंद  के पिता उत्तरप्रदेश के झाँसी में आ बसे।

 

हॉकी से लगाव और आर्मी में ज्वाइन 

युवास्था में ध्यानचंद को हॉकी से बिलकुल लगाव नहीं था। उन्हें रेसलिंग बहुत पसंद थी। उन्होंने हॉकी खेलना अ14 साल की उम्र वह एक हॉकी मैच देखने अपने वहां एक पने आसपास के दोस्तों के साथ खेलना शुरू किया, जो पेड़ की डाली से हॉकी स्टिक बनाते थे और पुराने कपड़ो से बॉल बनाया करते थे। 14 साल की उम्र में वे एक  ध्यानचंद  ने अपने पिता को कहा हॉकी मैच देखने गए। वहां एक टीम दो गोल से हार रही थी। ध्यानचंद ने अपने पिता को कहा कि वह इस हारने वाली टीम के लिए खेलना चाहता है। वह आर्मी वालो का मैच था, तो उनके पिता ने ध्यानचंद को खेलने की इजाजत दे दी। ध्यानचंद ने उस मैच में चार गोल किये। उनके इस रवैये  आत्मविश्वास को देख आर्मी ऑफिसर बहुत खुश हुए और उन्हें आर्मी ज्वाइन करने को कहा।

 

ध्यान सिंह से ध्यान चंद

1922 में 16 साल की  उम्र में ध्यानचंद पंजाब रेजिमेंट से एक सिपाही बन गए। आर्मी में आने के बाद ध्यानचंद ने हॉकी खेलना अच्छे से शुरू किया, और उन्हें यह पसंद आने लगा। सूबेदार मेजर भोले तिवार जो ब्राह्मण रेजिमेंट से थे, वे आर्मी में ध्यानचंद के मेंटर बने, और उन्हें खेल के बारे में बेसिक ज्ञान दिया। पंकज गुप्ता, ध्यानचंद के पहले कोच कह जाते थे, उन्होंने ध्यानचंद के खेल को देखकर यह कह दिया था कि यह एक दिन पूरी दुनिया में चाँद की तरह चमकेगा। उन्ही ने ध्यानचंद को चंद नाम दिया, जिसके बाद उनके करीबी उन्हें इसी नाम से पुकारने लगे। इसके बाद ध्यान सिंह ध्यान चंद बन गया।

 

खिलाड़ी जीवन 

एक मैच में उनकी टीम 2 गोल से हार रही थी। ध्यानचंद ने आखरी 4 मिनट में 3 गोल मार टीम को जिताया था। यह पंजाब टूर्नामेंट मैच झेलम में हुआ था। इसके बाद ही ध्यानचंद को हॉकी विजार्ड कहा गया। ध्यानचंद ने 1925 में पहला नेशनल हॉकी टूर्नामेंट गेम खेला था। इस मैच में विज, उत्तरप्रदेश, पंजाब, बंगाल, राजपुताना और और मध्य भारत ने हिस्सा लिया था। इस टूर्नामेंट में उनके परफॉरमेंस को देखने के बाद ही उनका सिलेक्शन भारत के नेशनल टीम में हुआ। 1926 में न्यूजीलैंड में होने वाले एक एक टूर्नामेंट के लिए ध्यानचंद का चुनाव हुआ। यहाँ एक मैच के दौरान भारतीय टीम ने 20 गोल किये थे, जिसमें से 10 गोल ध्यानचंद ने किये थे।

 

हिटलर का ऑफर और हॉकी से रिटायरमेंट 

ध्यानचंद के प्रतिभा को देख जर्मनी के महान हिटलर ने ध्यानचंद को जर्मन आर्मी में हाई पोस्ट में आने का ऑफर दिया। लेकिन ध्यानचंद को भारत से बहुत प्यार था और उन्होंने इस ऑफर को बड़ी ही शिष्टता से मना कर दिया। इसके बाद 42 वर्ष की उम्र में उन्होए रिटायरमेंट ले लिया। ध्यानचंद इसके बाद भी आर्मी ने होने वाले हॉकी मैच में खेलते रहे और लभगग 1956 तक उन्होंने हॉकी स्टिक को अपने हाथों में थामे रखा।

 

मृत्यु 

ध्यानचंद के आखिरी दिन अच्छे नहीं रहे। ओलिंपिक मैच में भारत को स्वर्ण पदक दिलाने के बावजूद भी भारत देश उन्हें भूल सा गया। उनके आखिरी दिनों में उन्हें पैसों की भी कमी थी और उन्हें लिवर में कैंसर हो गया था। उन्हें दिल्ली के AIIMS हॉस्पिटल के एक जनरल वार्ड में भर्ती कराया गया था और उनका देहांत 3 दिसंबर 1979 को हुआ था।

 

अवार्ड्स 

1956 में भारत के दूसरे सबसे बड़े सम्मान पद्म भूषण से ध्यानचंद को सम्मानित किया गया था। उनका जन्म 29 अगस्त 1905 को इलाहबाद, ब्रिटिश भारत में हुआ था। उनके जन्मदिवस को भारत का राष्ट्रीय खेल दिवस यानि नेशनल स्पोर्ट्स डे घोषित किया गया है। ध्यानचंद की याद में डाक टिकट शुरू की गई थी और दिल्ली में ध्यानचंद नेशनल स्टैटियम का निर्माण कराया गया था।

 

तो यह था हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद का जीवन परिचय | Biography of Major Dhyan Chand in Hindi. हमें उम्मीद है आपको यह लेख जरूर पसंद आई होगी और इस लेख से आपको मेजर ध्यानचंद जी  के बारे में बहुत कुछ जानने भी मिला होगा।

 

यह भी पढ़े:-

 

Follow Me on Social Media

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *