चावल के एक दाने की कहानी

चावल के एक दाने की कहानी

 

चावल के एक दाने की कहानी

एक बार एक कवि हुआ करता था। एक बार उसकी हालत इतनी ख़राब हुई कि घर में खाने के लाले पड़ गए। इसी कारण उसने महल में जाकर राजा से मदद मांगने का  फैसला किया। राजा के बुलाए जाने पर उसने अपनी कविताएं पड़नी शुरू कर दी। राजा बहुत प्रसन्न हुआ और उसने कवि से अपना इनाम मांगने के लिए कहा।

 

कवि ने मोहरों से सजी शतरंज की और इशारा करते हुए कहा, “महाराज अगर आप पहले खाने में चावल का एक दाना रखे और हर खाने के लिए उसे दुगना करते जाए तो मैं समझूंगा मुझे मेरा इनाम मिल गया।”

 

राजा ने कहा, “बस इतना ही। सिर्फ चावल का एक दाना और सोना नहीं?” कवि ने कहा, “जी हाँ महाराज।” महाराज ने आदेश दिया और दरबारियों ने शतरंज के हर खाने में चावल रखना शुरू कर दिया। पहले खाने में एक, दूसरे में दो, तीसरे में चार, चौथे में आठ इस तरह वह रखते गए।

 

जब 10 वे खाने में चावल रखने की बारी आई तो उन्हें चावल के 512 दाने रखने पड़े। 20 वे खाने तक संख्या बढ़कर 5 लाख 24 हजार 288 हो गए। आधे हिस्से तक आते-आते 32 वे खाने में चावल की संख्या की गिनती 214 करोड़ 74 लाख 83 हजार 648 हो गए। जल्द ही गिनती अरबों खरबों में बढ़ गई।

 

आखिरकार अभागी राजा को अपना पूरा राजपाठ उस चतुर कवि के हाथों सौंपना पड़ा। और इसकी शुरुवात चावल के सिर्फ एक दाने से हुई थी।

 

शिक्षा – चक्रवृद्धि के ताकत को कम नहीं समझना चाहिए।

 

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