चतुर सुनार | The Clever Jeweler Story in Hindi

चतुर सुनार | The Clever Jeweler Story in Hindi

आज मैं आपको सुनाने जा रही हूँ एक चतुर सुनार की कहानी (The Clever Jeweler Story in Hindi) जिसने  अपनी चतुराई से एक राजा के घमंड को तोड़ दिया और राजा को उसके सामने हार मानना पड़ा।

 

चतुर सुनार की कहानी 

The Clever Jeweler Story in Hindi

एक समय की बात है, एक राजा था, जिसे अपने बुद्धिमान होने का बहुत घमंड था। उसे विश्वास था कि पुरे राज्य में ऐसा कोई भी नहीं है, जो उसे धोखा देकर साफ निकल जाए। एक दिन यह बात उसने मंत्रियों से कही। सबने हामी भर दी, सिवाय एक के।

 

राजा को बड़ा ही आश्चर्य हुआ और कहा, “क्या तुम नहीं मानते कि मुझे धोखा देना नामुमकिन है?” मंत्री ने कहा, “नहीं महाराज मैं नहीं मानता। हो सकता है यह बात औरो पर लागु होती हो पर मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि कुछ सुनार अपने ग्राहकों के साथ धोखा करते हैं, हमारे अपने राज्य में भी।”

 

राजा बोला, “मैं नहीं मानता, मैं सभी सुनारों को बुलाऊंगा और उनसे खुद बात करूँगा।” बाकि मंत्रियों ने प्रश्न किया, “पर महाराज, अगर यह बात सच है तो भी, क्या वे स्वीकार कर लेंगे?” राजा बोला, “आप लोग चिंता न करे, मैं उनसे लिपट लूंगा।”

 

अगली सुबह ही राजा ने राज्य के सभी सुनारों को बुला भेजा। देसानुसार सभी सुनार आ पहुंचे। सब हैरान थे कि आखिर माजरा क्या है। राजा ने हम सबको क्यों बुलाया है?” एक ने पूछा, “क्या राजपरिवार में किसी का विवाह या राज्यभिषेक की अक्समात तैयारी हो रही है?” दूसरे ने जवाब दिया, “या हो सकता है रानिया अपने पुराने गहनों से उब गई हो और उन्हें तुड़वाकर नए गहने बनवाना चाहती हो।”

 

तीसरा सुनार बोला, “नहीं , रानियां तो हमें स्वयं ही बुलाती हैं। यह मामला तो महाराज से जुड़ा मालूम होता है।” एक सुनार बोला, “मेरे विचार से महाराज पडोसी राज्य को कुछ खास तोहफे भेजना चाहते हैं और कुछ गहने बनवाने की जल्दी में होंगे।” मदन, जो सुनारों में सबसे छोटा था बोला, “इस तरह अनुमान लगाने से कोई फायदा नहीं है। महाराज स्वयं ही बता देंगे कि क्या बात है?”

 

इतने में राजा कमरे में प्रविष्ट हुए। राजा ने कहा, “मैंने आपको एक सीधा-सीधा प्रश्न पूछने के लिए यहां बुलाया है और मुझे आशा है कि आप सच बोलेंगे। यदि में आपको कुछ बनाने के लिए थोड़ा स्वर्ण दूँ तो क्या आप मेरे जाने बिना उस सोने में से जरा सा भी चोरी कर सकते हैं? और यदि आप यह काम किसी की निगरानी में करें तो भी क्या चोरी संभव है?”

 

कमरे में सन्नाटा छा गया। राजा ने उन्हें गौर से देखते हुए पूछा, “बोलिए।” सभी सुनार एक दूसरे का चेहरा देखने लगे। सभी सुनार एक स्वर में बोले, “जी हाँ महाराज, यदि हम सचमुच चाहें तो संभव है।” राजा को अपने कानो पर विश्वास नहीं हुआ और बोला “अच्छा। आप लोग कितना सोना चोरी कर सकते हैं?”

 

कुछ सुनार बोले, “हम चौथाई हिस्सा तक सोना निकाल सकते हैं।” दूसरे बोले, “हम आधा निकाल सकते हैं।” मदन बोला, “और मैं चाहूं तो पूरा ही उड़ा सकता हूँ।”

 

राजा ने नजर भरकर उसे ऊपर से निचे तक देखा। राजा मदन से बोला, “मैं तुम्हारी बात नहीं मानता, पर तुम एक बार कोशिश कर देखो। तुम मेरे राजमहल आओगे। वहां मेरे दिए हुए वस्त्र पहनोगे। मैं तुम्हे सोना दूंगा और मेरी उपस्तिथि में तुम गणपति की एक प्रतिमा बनाओगे। जब भी मैं बाहर जाऊँगा मेरा अंगरक्षक तुम पर नजर रखेगा। जब तुम घर लौटोगे तो सब कुछ पीछे छोड़ जाओगे। अपने पहने वस्त्र फिरसे धारण करोगे और महल के बाहर कदम रखने  तुम्हारी तलाशी ली जाएगी। जब तक तुम गणपति नहीं बना लेते, तब तक तुम्हारी यही दिनचर्या होगी।” मदन प्रसन्नतापूर्वक बोला, “जी महाराज।”

 

राजा ने एक बार फिर पूछा, “एक बार फिर सोच लो। क्या तुम यह कर पाओगे?” मदन बोला, “जी महाराज, मुझे विश्वास है कि मैं यह कर लूंगा।” राजा बोला, “अगर तुम अपने उद्देश्य में सफल हो गए तो मैं अपनी बेटी का विवाह तुमसे कर दूंगा और अपने राज्य का आधा हिस्सा दे दूंगा। पर अगर तुम असफल रहे तो तुम्हे हमेशा के लिए देश से निकाल दिया जाएगा।” मदन मुस्कुराते हुए बोला, “जो आज्ञा महाराज।”

 

राजा बोला, “याद रहे, मैं या मेरे सेवक हमेशा तुम पर नजर रखेंगे।” दूसरे सुनार बोले, “पागल हुए हो मदन। तुम जानते हो कि तुम यह काम नहीं कर सकते हो! तुम क्या, ऐसे कड़े पहरे में कोई भी नहीं कर सकता।” मदन ने आत्मविश्वास के साथ कहा, “मैं तो कर सकता हूँ।”

 

मदन अगले सुबह-सुबह ही महल पहुंच गया। उसने दूसरे कपडे पहने। सोना और औजार लिए और काम शुरू कर दिया। राजा पहरेदार दिन भर उसे घेरे रहते। अधिकतर राजा भी वहां आसपास रहता। मदन अपना काम सोना पिघलाना, तरासना, आकर देना आदि मन लगाकर करता। उसे अपनी आसपास बैठे जनता से कोई फर्क नहीं पड़ता था।

 

 

दिन भर की मेहनत के बाद अपने वस्त्र फिरसे पहनता, राजा के आदमियों को सब सामान सौंपता और अपने घर के ओर बढ़ जाता। लेकिन घर पहुंचने पर वह एक अजीबोगरीब काम करता, जिसके बारे में किसी  मालूम नहीं था। मदन पीतल की हूबहू प्रतिमा बना रहा था, जिस पर देर रात तक वह काम कर रहा था।

 

ऐसा रोज होता। दिन भर राजसेवकों की कड़ी निगरानी में वह सोने का गणपति बनाता और रात की चुप्पी में पीतल की प्रतिमा जिसमें कभी-कभी उसकी बहन उसकी मदद किया करती। आखिरकार, सात दिन बाद, दोनों मुर्तिया तैयार हो गई। सातवें दिन मदन ने गणपति की सोने की प्रतिमा उठाकर सबको दिखाई।

 

राजा की आवाज में उत्सुकता थी, “क्या यह पूरी हो गई?” मदन बोला, “बस महाराज जरा सा काम बाकि है। रात भर मूर्ति को ताजे दही में डुबोकर रखना होगा और अगली सुबह इसे चमकाऊँगा। यह बहुत जरुरी है।” राजा हैरान था और बोला, “अच्छा? मैंने तो पहले कभी किसी को दही से मूर्ति चमकाते नहीं देखा।” मदन ने कहा, “यह मेरी तकनीक है। क्या मुझे ताजे दही का एक बड़ा मटका मिल सकता है?”

 

शाही पहरेदार मुँह बिचकाते हुए बोले, “अब यह भी अच्छी फरमाइश है। संध्या के समय ताजा दही कहाँ से आएगा? आमतौर पर लोग रात में दही जमाते हैं जिससे की वह सुबह तैयार जाए। तुम्हे दही चाहिए तो सुबह क्यों नहीं बताया? हम थोड़ा दही जमाकर रखते।” मदन बोला, “मैं बिलकुल ही भूल गया था। क्या बाजार से भी नहीं मिल सकता?”

 

तभी उन्होंने एक युवती को सर पर बड़ा सा घड़ा लिए सड़क की ओर जाते हुए देखा। पहरेदार जोर से चिल्लाया, “तुम क्या बेच रही हो?” युवती बोली, “ताजा दही। आज मुझे घर से आने में देर हो गई और दही बिका ही नहीं। अब इसे वापस घर ले जा रही हूँ।” राजा का नौकर बोला, “रुको, इसे यहाँ लाओ। हम इसे खरीद लेंगे।”

 

मदन बोला, “भगवान का शुक्र है। मुझे तो चिंता हो रही थी। सोच रहा था किदही नहीं मिला तो क्या करूँगा।” लड़की दही का घड़ा लेकर आ गई। मदन बोला, “मैं पहले इसकी जाँच करूँगा। जाने अच्छा भी है या नहीं।” लड़की बोली, “मुझे जब तक इसके ऐसे नहीं मिलेंगे तब तक तुम्हे हाथ नहीं लगाने दूंगी।  ताजा दही है। तुमने अगर ख़राब कर दिया तो आधे दाम पर भी कही नहीं बिकेगा समझे।”

 

मटके के अंदर झांकते हुए मदन बोला, “अच्छा, अच्छा, ठीक है। हम खरीद लेते हैं। ठीक ही लगता है।” यह कहते हुए उसने गणपति की स्वर्ण प्रतिमा घड़े में डाल दी। राजा ने लड़की को सोने की अशर्फी दी। वह जाने ही वाली थी कि मदन ने उसे फिरसे आवाज दी। वह बोला, मुझे यह दही अच्छा नहीं लगा। इसमें पानी ज़्यादा है और इससे मूर्ति में वह चमक नहीं आएगी। मैं कल सुबह ताजा दही लेकर अपना काम करूँगा।”

 

लड़की गुस्से में बोली, “अब क्या मैं दही का अचार डालूँ? अब तो इसे कोई खरीदेगा भी नहीं।” मदन ने घड़े में से मूर्ति निकालते हुए कहा, “खाओ, फेंको, जो मन में आए करो, और ख़बरदार ज़्यादा बड़बड़ की तो। भूल गई, महाराज ने उसकी कीमत दे दी है।” लड़की ने घड़ा उठाया और मुँह में कुछ बड़बड़ाती हुई चली गई।

 

अगले दिन मदन ने मूर्ति को ताजे दही से चमकाई और राजा के हाथ में दे दी। राजा ने अपने स्वर्ण विशेषज्ञ को बुलाया। राजा ने विशेषज्ञ को कहा, “इसे देखकर बताओ कि सुनार ने इसमें से कितना सोना गायब किया है?” विशेषज्ञ स्वर्णकार ने उसे जांचना शुरू किया। लेकिन बार-बार जांचने-परखने के बाद भी उसे समझमें कुछ नहीं आया।

 

राजा अधीर हो चला था कहा, “बताओ भाई, क्या बात है?” स्वर्णकार बोले, “महाराज इसमें तो रत्ती भर भी सोना नहीं है।” राजा हैरान होकर बोले, “यह कैसे हो सकता है? स्वयं मैंने इसे सारा सोना दिया और इसने मूर्ति भी मेरे सामने बनाई है। इसे कमरे में से एक भी वस्तु बाहर नहीं ले जाने दिए।”

 

विशेषज्ञ बोला, “यह सब तो मैं नहीं जानता। पर इतना जानता हूँ कि मूर्ति खालिस पीतल की है। सोने का इसमें तो नामोनिशान भी नहीं है।” राजा चकित होकर बोला, “यह तो कमाल हो गया।” मदन मुस्कुराते हुए बोला, “मैंने कहा था कि मैं कर सकता हूँ।”

 

आखिरकार राजा ने मदन से पूछा कि उसने यह चकमा किया कैसे? मदन ने पूछा, “महाराज क्या आप वादा करते हैं कि मेरे सच बताने से आप मुझे सजा नहीं देंगे?” राजा ने कहा, “विश्वास रखो, मैं तुम्हे सजा नहीं दूंगा।” फिर मदन ने सारी कहानी सुनाई। वह दही बेचने वाली लड़की मदन की बहन थी, जो ठीक उसी वक्त वहां आ पहुंची तो। जब वह लड़की महल में आई तो मदन ने सोने की मूर्ति दही में डालकर पीतल की निकाल ली।

 

 

कहानी सुनकर पहले राजा को हैरानी हुई और फिर ठाठ से हंस पड़ा और कहा, “भई, बाह! तुम तो बहुत होशियार निकले। तुमने हम सबको कैसे बुद्धू बनाया! मैं मान ही नहीं सकता था कि कोई मेरे आँखों में भी धूल झोंक सकता है। पर तुमने मुझे गलत साबित कर दिया।”

 

वादे के मुताबिक मदन की शादी राजकुमारी से हो गई और राज्य का आधा भाग उसे दे दिया गया। राजा बनने के बाद मदन ने कोई चालबाजी नहीं की। कई वर्षो तक उसने प्रजा का स्नेह पाया और राज्य के श्रेष्ठतम राजाओं में से उसका नाम गिना जाने लगा।

 

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