तेनालीराम की कहानी (तलवार में पानी)

तेनालीराम की कहानी | तलवार में पानी | Talwar Me Pani Tenali Rama Story in Hindi

 

तेनालीराम की इस मजेदार कहानी का नाम है तलवार में पानी (Talwar Me Pani Tenali Rama Story in Hindi) उम्मीद करते हैं आपको यह कहानी पसंद आएगी।

 

तेनालीराम की कहानी (तलवार में पानी)

 

सम्राट कृषदेव राय के वंशज पुस्तो से विजयनगर पर राज करते आ रहे थे। प्रत्येक राजवंश की महत्वपूर्ण वस्तुओं की सुरक्षा के लिए सम्राट ने एक विशाल संघ्रालय की स्थापना की और उसकी देखरेख के लिए अनेक दक्ष तथा योग्य कर्मचारियों की नियुक्ति की।

 

एक दिन राजा दरबारियों के साथ संघ्रालय का निरक्षण कर रहे थे तभी उन्हें अपने एक पूर्वज नरेश नायक की तलवार देखकर रुक गए। सम्राट कृषदेव राय ने मंत्री से पूछा, “तुम्हे इस तलवार में क्या विशेषता दिखाई दे रही है?” मंत्री बोला, “अन्नदाता, यह तलवार नहीं आपके पूर्वजों की सौर्य की कहानी है।” सेनापति ने कहा, “महाराज यह तलवार नहीं अनमोल हीरा है जिसने शत्रुओं की कठोर से कठोर हाड़ मांस को गाजर मूली की तरह काट डाला।”

 

सम्राट तलवार की प्रशंसा सुन फुले न समा रहे थे। पुरोहित तथा अन्य सभी दरबारियों ने तलवार की प्रशंसा में जमीन आसमान एक  शुरू कर दिए। अचानक मंत्री ने देखा कि तेनालीराम चुप खड़ा है। सम्राट को सुनाते हुए उसने तेनालीराम से कहा, “तुम क्यों चुप हो तेनालीराम? तुम भी बताओ की तुमने तलवार में क्या देखा?” तेनालीराम ने कहा , “पानी! पानी!”

 

तेनालीराम का उत्तर सुनकर सभी दरबारी चौंक गए। तब मंत्री ने सम्राट कृषदेव राय की ओर देखते हुए तेनालीराम से कहा, “इस महान तलवार की तोहिन मत करो तेनालीराम। जो तलवार संसार की धन-संपत्ति से अधिक मूल्यवान है उसमे तुम्हे पानी दिखाई दे रहा है!”

 

सम्राट कृष्णदेव राय भी अपनी इस पुस्तैनी तलवार की अपमान को और अधिक देर सके। उन्होंने गुस्से से तेनालीराम की ओर देखा और बोले, “तेनालीराम! तुम आवश्यकता से अधिक ढीठ होते जा रहे हो या तो एक सप्ताह के अंदर साबित करो कि तुमने जो तलवार में देखा है वह सही है वरना मैं तुम्हे प्राण दंड दिए बिना न रहूँगा।”

 

दरबारियों को लगा कि इस बार तेनालीराम बच न सकेगा। वे मुस्कुरा-मुस्कुराकर एक दूसरे को देखने लगे। आदेश दे सम्राट जाने लगे तो तेनालीराम ने हाथ जोड़कर एक सप्ताह के लिए वही रहने की अनुमति देने को कहा। कुछ सोचकर सम्राट ने अनुमति दे दी।

 

आठवें दिन दरबार खचाखच भरा था। सभी को आशा थी कि तेनालीराम उस पुस्तैनी तलवार में पानी देखने की बात साबित नहीं कर पाएगा और उसे प्राण दंड मिलेगा। सभी तेनालीराम के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। आरंभ हुआ। आधा घंटा बिता ही था कि तभी तेनालीराम मुस्कुराता हुआ आता दिखाई दिया। उसके पीछे-पीछे संघ्रालय के तीन कर्मचारी अपने-अपने सर पर पुस्तकों की गट्ठर उठाकर ला रहे थे।

 

साम्राट सह सभी दरबारी चकित थे। तेनालीराम ने उन गट्ठरों को खोलकर महाराज से कहा, ‘महाराज! मेरी बात का प्रमाण यह प्राचीन पुस्तके है जो  मैं आपके संघ्रालय से लाया हूँ। सम्राट कुछ कहना चाह रहे थे कि तभी तेनालीराम ने बोला, “महाराज! इन पुस्तकों में आपके उन पूर्वजों की सौर्य गाथाएं हैं जिन्होंने इस प्रतापी तलवार का इस्तिमाल सत्रुओं के विरुद्ध किया। इन सभी में लिखा है कि उस तलवार ने विजयनगर के शत्रुओं को बार-बार पानी पिलाया है।”

 

फिर दूसरे गट्ठर की ओर इशारा करके तेनालीराम बोले, “इन पुस्तकों में लिखा है कि पानीदार तलवार के आगे शत्रुओं के सरे हवाईकिले धराशाही हो गए।”

 

तेनालीराम तीसरे गट्ठर की ओर इशारा करके कुछ कहना ही चाह रहा था कि सम्राट कृष्णदेव राय ने उठकर उसे गले लगा लिया और बोले, “बस बस तेनालीराम हम समझ गए कि जिस तलवार में पानी न हो वह हीरे की हो या चांदी की बेकार है। तुमने उस पुस्तैनी तलवार अवश्य ही पानी देखा होगा।”

 

दरबारियों के सिर झुक गए और राजा ने तेनालीराम को सम्मानित किया।

 

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