Four Monks and Thrives story in Hindi

चार साधु और चोर | Four Monks and Thrives story in Hindi

 

आज मैं आपको सुनाने जा रही चार साधु और एक चोर की कहानी (Four Monks and Thrives story in Hindi) कहानी बहुत ही अच्छी है तो आप लोग जरूर पढ़े।

 

चार साधु और चोर

Four Monks and Thrives story in Hindi

चार साधु थे। वे शहर के पास एक जंगल में रहते थे और भगवान का भजन-स्मरण करते थे। उन चारों साधुओं की अपनी अलग-अलग एक निष्ठा थी। एक दिन वहां के राजा ने अपने स्त्री से कहा, “हमें अपने लड़के को अच्छा संत बनाना है. फिर वह चाहे राज्य करे, चाहे साधु बन जाए।”

 

रानी बोली, “महाराज! जो संत बनना चाहता है, वही संत बन सकता है, दूसरे के बनाने से कैसे बन जाएगा?” आपका और मेरा उद्दोग थोड़े ही काम करेगा?”

 

राजा ने कहा, “इसका एक उपाय है – सत्संग!” रानी बोली, “ऐसा कोई अच्छा संत है, जिसके पास हम अपने लड़के को भेजे?”

 

राजा बोला, “यहाँ पास में ही जंगल में चार अच्छे संत रहते हैं। उनके पास लड़के को भेज देते हैं।” इस प्रकार राजा और रानी ने अपने लड़के को उन चार संत के पास भजने का फैसला किया।

 

रात्रि का समय था। दैवयोग से एक चोर, जो चोरी करने के उद्देश्य से वहां आया था, छिपकर उनकी बातें सुन रहा था। उस चोर के मन में आया “चोरी करने से मैं फंस भी सकता हूँ पर साधु बन जाऊं तो काम बन जाएगा! राजकुमार आएगा और मेरा चेला बन जाएगा, फिर चोरी करने की क्या जरुरत है।”

 

चोर ने गेरुया वस्त्र पहन लिए और जंगल में चला गया। उसके मन में आया “कोई पूछेगा तो मैं क्या उपदेश दूंगा!” ऐसा सोचकर वह पहले चार संतो में से पहले संत के पास गए और पूछा, “महाराज! कल्याण कैसे हो?”

 

संत ने कहा, “भाई, किसी का जी मत दुखाओ। यहदिल खुदा का नूर है।” चोर बोला, “और महाराज!” संत बोला, “और की जरुरत नहीं, इस एक बात से ही काम बन जाएगा।”

 

चोर दूसरे संत के पास गया और बोला ,”महाराज! मैं कल्याण चाहता हूँ, कोई उपाय बताओ।” संत बोले, “कभी किंचिन्मात्र भी झूट नहीं बोलना। सदा सत्य ही बोलना, चाहे गला क्यों न काट जाए! जैसा देखा, जैसा सुना और जैसा समझा, ठीक वैसा का वैसा कह देना।” चोर बोला, “और कोई बात?” संत बोला, “और की जरुरत नहीं।”

 

अब वह चोर तीसरे संत के पास गया और बोला, “महाराज! मेरा कल्याण कैसे हो?” संत बोले, “सीधी-सादी बात है, रात-दिन राम-राम करो।” चोर बोला, “और कोई उपाय?” संत बोले, “और उपाय की जरुरत नहीं है।”

 

अब वह चौथे संत के पास पहुंचा और बोला, “महाराज! कल्याण कैसे हो?” संत बोले, “भाई! एक भगवान के शरण हो जाओ। मन में यह बात अटल रहे कि मैं तो केवल भगवान का हूँ। जैसे विवाह होने के बाद लड़की के मन में यह बात दृढ़ हो जाती है कि मैं कुआँरी नहीं हूँ, मेरा विवाह हो गया है, ऐसे ही मन में यह बात दृढ़ हो जाए कि मैं भगवान का हो गया हूँ,  अब मैं और किसी का नहीं हो सकता।” चोर बोला, “और कोई बात?” संत बोले, “और की जरुरत ही नहीं, इतना ही काम है।”

 

 

चोर ने संतो से चार बातें सीख ली और आगे जाकर बैठ गया। अब राजा आया। वह चारों संतों के पास गया। चारों ने एक-एक बात कह दी। राजा ने देखा कि आगे पांचवा साधु भी बैठा है! राजा उसके पास भी गया और प्रार्थना की, “महाराज! कृपया करके कल्याण की बात बताएं।”

 

वह साधु वेषधारी चोर चुपचाप ध्यान में बैठा रहा, कुछ बोला नहीं। राजा ने ज्यादा प्रार्थना की तो वह बोला, “मैं जैसा बताऊंगा, वैसा करोगे?” राजा ने कहा, “हाँ महाराज! वैसा ही करूँगा!” वह बोला, “किसी का जी मत दुखाओ।” राजा बोला, “और कोई बात?” वह बोला, “भगवान के नाम जप करो।” राजा बोला, “और कुछ बताइए?” वह बोला, “भगवान के शरण हो जाओ।” राजा बोला, “महाराजा! और कोई बात?” वह बोला, “संत जैसा कहे, वैसा कर दो।”

 

राजा ने मन में विचार किया कि यह संत ज़्यादा ऊँचा है! अन्य संतो ने तो एक-एक बात कही, पर इन्होने पांच बातें कह दी! राजा बड़ा सरल स्वभाव का था। उसको मालूम नहीं था कि संत की पहचान इस तरह नहीं होती।

 

राजा लौटकर महल में आ गया। रात होने पर वह चोर फिर छिपकर महल में आया। जब राजा रानी के पास गया, तब वह चोर दरवाजे के पीछे छिपकर उनकी बातें सुनने लगा। रानी ने पूछा, “क्या बात हुई?” राजा ने कहा, “मैं जंगल में संतों के दर्शन करके आया हूँ। मैं तो चार ही संत समझता था, पर वहां पांच संत थे।” रानी बोली, “वहां जाकर आपने क्या कहा?” राजा बोला, “भगवत्प्राप्ति की बात पूछी तो उनमे से एक संत ने कहा कि किसी का जी मत दुखाओ, दूसरे ने कहा कि सदा सत्य बोलो, तीसरे ने कहा कि नाम जप करो और चौथे ने कि भगवान के शरण हो जाओ। परंतु पांचवे संत ने उन चारों संतों की की चार बातें भी बताई और साथ में पांचवी बात यह भी बताई कि संत की आज्ञा का पालन करो।”

 

राजा और रानी दोनों सच्चे और सरल स्वभाव के थे। उन्होंने विचार किया कि वह पांचवा संत ठीक है, अपने लड़के उसी के पास भेजना चाहिए। उनकी बातों का चोर पर बड़ा असर पड़ा और सोचने लगा “अरे! मैंने तो नकली बात कही, उस पर भी राजा ने श्रद्धा कर ली अगर सच्ची बात कहूं तो कितनी मौज हो जाए!

 

राजा के श्रद्धा स्वभाव के कारण चोर का ह्रदय वदल गया! वह सच्चा साधु गया और जंगल में निकल गया। उसने विचार किया कि चार बातों का तो ठीक पालन, पर पांचवीं बात का पालन तब हो, जब कोई अच्छा और सच्चा संत मिले। कोई ऐसा भगवत्प्राप्त संत मिले, जिसके आज्ञा का पालन करूँ।”

 

वह संत को ढूंढने में लग गया। पहले चोर होने से वह चालाक तो था ही, इसलिए हर एक साधु पर उसका विश्वास नहीं नहीं बैठता था। वह कई साधुओं के पस्व गया, पर किसि पर उसका विश्वास नहीं बैठा। अब अच्छे संत को पाने के लिए उसकी लगन लग गई। उसके मन में यह बात थी कि जिसमे मेरा चित्त खींच जाए, मेरा विश्वास हो जाए, उसी को गुरु बनाऊंगा।”

 

भगवान ने उसकी सच्ची लगन देखि तो वह संत बनाकर उसके सामने आ गए। उनको देखते ही उस पर असर पड़ा और बोला, “महाराज! मैं आपके शरण हूँ, मुझे दीक्षा दीजिए। आप जैसा करेंगे, मैं वैसा ही करूँगा।”

 

संत रूपमें भगवान बोली, “जैसा  मैं कहूंगा वैसा करोगे क्या? सच्ची बात कहते हो न?” चोर बोला , हाँ महाराज१ सब सच्ची बात कहता हूँ।” भगवान बोले , “तो फिर पहले एक काम, पीछे तुम्हे मंत्र देंगे। तुम यह काम करो कि जो किसी का जी नहीं दुखाता, उसका सिर काटकर लाओ और जो नाम जप करता है उसका सिर काटकर लाओ, जो भगवान के शरण है उनका सर काटकर लाओ, यह चार सर काटकर लाओ तब तुम्हे दीक्षा देंगे।”

 

उसन सोचा “यह चारों तो एक ही जगह बैठे हैं, काम आसानी से बन जाएगा ?” वह चोर तलवार लेकर भागा-भागा गया और रास्ते में ही विचार आया “मैंनेयह नियम लिया है कि किसी का जी नहीं दुखाऊंगा, पर जी दिखाना तो दूर रहा, मैं तो गला ही काटने जा रहा हूँ। उसे विचार आया कि यह काम उससे नहीं होगा। उसमे सद्बुद्धि पैदा हो गई।

 

 

वह भागा-भागा पीछे आया। भगवान बोले, “कहाँ हैं?” वह बोला, “मेरे एक सर में चरो बातें हैं! मैं कभी किसी का जी नहीं दुखाता, सदा सत्य बोलता हूँ, नाम जप करता हूँ और भगवान के शरण हूँ। यह चारों बातें मेरे म हैं इसलिए मैं अपना ही सर कटकट आपको देता हूँ।” भगवान ने कहा, “बस, अब सर काटने की जरुरत नहीं, मैं तुझे दीक्षा देता हूँ।”

 

भगवान ने उसे दीक्षा दी और वह अच्छा संत बन गया। इस तरह चालाकी से पांच बातें धारण करने से भी चोर को भगवान मिल गए और वह संत बन गया।

 

अगर कोई सच्चे मन से पांचों बातों को धारण कर ले तो फिर कहना ही क्या है 

 

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