बुद्धिमत्ता की कहानी | Story of Intelligence in Hindi

बुद्धिमत्ता की कहानी | Story of Intelligence in Hindi

 

यह कहानी है वसीर नामक एक दरजी की और इस कहानी का नाम है “बुद्धिमत्ता की कहानी | Story of Intelligence in Hindi” यह कहानी बहुत ही मजेदार है उम्मीद है आपको जरूर पसंद आएगी।

 

बुद्धिमत्ता की कहानी

Story of Intelligence in Hindi

राजनगर में एक दरजी रहा करता था। उसका नाम वसीर था। वसीर का पिता भी एक दरजी ही था। वह मरते समय वसीर के लिए एक सिलाई मशीन छोड़ गया था। वसीर ने धन कमाकर जल्द ही सिलाई की चार नई मशीने खरीदी। वसीर अपने पिता की तरह वक्त पर कपडे सिलकर ग्राहकों को संतुष्ट किया करता था।

 

वसीर के कारण जिन दर्जियों का काम छूट गया था, उन सबने मिलकर वसीर को तबाह करने की योजना बनाई। उनमे रेहमान नामक एक दुष्ट दरजी था। उसने सलाह दी कि ओझा के जरिए वसीर पर तंत्र-मंत्र कर दिया जाए तो वह तबाह हो जाएगा।

 

एक दिन सारे दरजी एक ओझा के घर पहुँचे मगर ओझा के घर पर ताला लगा था। दूसरे दिन रेहमान की दुकान पर एक ओझा जैसा आदमी आ पहुँचा। उसने पूछा, “पता चला था कि कल आपने मेरे गुरूजी को याद किया था। उन्होंने मुझे आपके पास भेजा है। बताइए क्या बात है?”

 

उस व्यक्ति की वेश-भूषा देखकर रेहमान को लगा कि यह सचमुच का ओझा है। रेहमान ने विस्तार से उसे सारी बात बताई। ओझा के शिष्य ने पूछा, “इसके लिए क्या तुम कुछ खर्च उठा सकते हो?” रेहमान ने जवाब दिया, “हाँ क्यों नहीं।” शिष्य बोला, “मैं तुम्हे जादू के नींबू दूंगा। तुम लोग उनके भीतर सोने का एक-एक सिक्का रखकर वसीर के दुकान में डाल देना, तुम्हे हमेशा के लिए उससे छुटकारा मिल जाएगा।”

 

 

सबने वैसा ही किया। कई दिन बीत गए पर वसीर के काम में कोई फेर बदल न हुआ बल्कि उसने और दस सिलाई की मशीन खरीद ली। यह सब देखकर सारे दरजी हताश हो गए। सारे दरजी ओझा के घर पहुँचे और पूछा, “महाशय! आपका शिष्य कहाँ है?” ओझा ने आश्चर्य में आकर कहा, “मेरा कोई शिष्य नहीं है। मैं स्वयं इस काम से अपना पेट ठीक से नहीं पाल पा रहा हूँ तो भला मैं शिष्य कहाँ से रखूँगा?”

 

रेहमान आश्चर्य में पड़ गया। इस बीच वसीर ने अपने गली में सभी दर्जियो को अपनी नई दुकान के उद्घाटन पर निमंत्रण भेजा। उनके उन्नति का रहस्य जानने के लिए सभी दरजी वसीर के दुकान पर पहुँचे। वसीर ने सबका आदर-सत्कार किया।

 

रेहमान अपने कौतुहल को रोक न सका। उसने पूछा, “भाई वसीर! भाई वसीर! अचानक तुम्हारे पास इतनी सारी संपत्ति कैसे आ गई?” वसीर ने उत्तर दिया, “किसी ने मेरे दुकान में दस नींबू और दस सोने के सिक्के भिजवा दिए। नीम्बुओं का रस सरवत पिया तो शरीर में ताकत बढ़ गई और सोने के सिक्को से नई मशीने खरीदकर दुकान का कारोवार बढ़ाया।”

 

दर्जियो ने कहा, “वे सोने के सिक्के हमारे ही हैं। हम लोगों ने तुमको तबाह करना चाहा था। इसके लिए हमने अपना सब कुछ बेचकर सोने के सिक्के ख़रीदे थे। इसके लिए हमने एक ओझा को भी इसके बारे में बताया मगर हमारी कोशिश बेकार गई।”

 

 

वसीर ने बड़े ही स्नेहभाव से उन्हें समझाया, “मैंने सिलाई की नई मशीने खरीदी है पर काम करने के लिए मुझे दस दर्जियो की जरुरत है। तुम में से कोई भी यहाँ आकर काम करे तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। तुम लोग जितना काम करोगे उतना धन तुम्हारा होगा।”

 

इसके बाद सभी दर्जियो ने वसीर के यहाँ काम करने की बात मान ली। जिस दिन दस दर्जियो ने वसीर को तबाह करने की योजना बनाई थी उस दिन चुपके से वसीर ने उनकी सारी बातें सुन ली थी और उसने ओझा के शिष्य के रूप में उनकी योजना विफल की थी। पर उसने जिंगदी भर इस रहस्य को गुप्त ही रखा।

 

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