महान ऋषि अष्टावक्र की कहानी | Hindi Story of Sage Ashtavakra

 Hindi Story of Sage Ashtavakra

 

ऋषि अष्टावक्र की कहानी

ऋषि उद्दालक के आश्रम में कई शिष्य वैदिक ज्ञान अर्जन करने आते थे, उन्ही शिष्यों में एक थे कहोड़। उद्दालक अपने शिष्य कहोड़ को अत्यधिक पसंद करते थे और इसी बजह से उन्होंने अपनी पुत्री सुजाता का विवाह कहोड़ ऋषि के साथ कर दिया। विवाह के कुछ समय पश्चात ही सुजाता गर्भवती हो गई और वह चाहती थी कि उनका संतान इतना बुद्धिमान हो कि महान से महान ऋषि भी उसके सामने कमजोर पड़ जाए।

 

इसी उद्देश्य के साथ सुजाता ऋषि उद्दालक और कहोड़ द्यारा शिष्यों को दिए जाने वाले वैदिक ज्ञान से जुड़ी कक्षाएं लेने लगी, ताकि गर्भ में रह कर ही उनकी संतान सभी मंत्रो उच्चारण और उनके अर्थो को समझ पाए। लेकिन एक दिन अचानक जब कहोड़ वेदपाठ कर रहे थे तब सुजाता के गर्भ से ही उसकी संतान ने कहा आप वेद का गलत पाठ कर रहे हैं।

 

कहोड़ ऋषि को शिष्यों के सामने ऐसा व्यवहार तिरस्कार स्वरुप लगा और क्रोधित होकर उन्होंने अपने ही पुत्र को श्राप दे दिया की तू आठ स्थानों से वक्र (टेढ़ा) हो जाएगा। सुजाता ने इस घटना को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया और अपने संतान के अच्छे पालन-पोषण के लिए धन एकत्रित करने के उद्देश्य से उसने अपने पति से राजा जनक के पास जाने को कहा, जो की उस समय एक यज्ञ करने की तैयारी कर रहे थे।

 

कहोड़ ऋषि राजा जनक के पास गए। लेकिन राजा जनक ने उनसे कहा कि अब वह उस यज्ञ को नहीं कर पाएंगे, जिसकी तैयारी वह कई वर्षो से कर रहें हैं। क्यूंकि एक दिन बंदी ऋषि ने उसके पास आकर कहा था कि वह इस यज्ञ को तभी सम्पन्न कर सकते हैं जब यज्ञ में शामिल होने वाले ऋषि उन्हें शास्त्रार्थ में पराजय कर सके। दरहसल जो भी ऋषि बंदी से हारता था उसे नदी में डुबो देता था। ऐसा करते-करते ऋषि बंदी ने कई ऋषियों की हत्या कर दी थी।

 

 

राजा जनक ने कहोड़ ऋषि से कहा कि अगर बंदी ऋषि को शास्त्रार्थ में हराते हैं तो वह इस यज्ञ को पूरा कर सकते हैं। कहोड़ ऋषि ने यह बात मान ली और उन्होंने बंदी ऋषि को शास्त्रार्थ में  चुनौती दी। इस चुनौती में बंदी ऋषि की जीत हो गई। अन्य हारे हुए ऋषियों की तरह उसने कहोड़ को भी नदी में डुबो दिया।

 

सुजाता को जब यह सुचना मिली तो उसे बहुत ज्यादा पछतावा और आत्मग्लानि हुई। इस ग्लानि के साथ उसने अपने पुत्र को जन्म दिया, जिसका शरीर आठ जगहों से मुड़ा हुआ था। इस पुत्र का नाम उन्होंने अष्टावक्र रखा। अष्टावक्र ने अपनी शिक्षा अपने नाना उद्दालक ऋषि से लेनी शुरी की और 12 वर्ष की आयु में ही उन्होंने सब कुछ सिख लिया।

 

अष्टावक्र बहुत बुद्धिमान और चतुर वालक थे। उनके गुरु उद्दालक भी उनसे बेहद ज्यादा प्रभावित थे। जब वालक अष्टावक्र को ऋषि बंदी और अपने पिता की हत्या के बारे में पता चली तब उन्होंने ऋषि बंदी को चुनौती देने का निर्णय लिया। एक रात वह अचानक आश्रम से भागकर राजा जनक के पास पहुँचे। अष्टावक्र का कुरूप स्वरुप देखकर महल के सैनिक उन पर हँसने लगे। इस पर अस्टावक्र ने जवाब दिया कि इंसान की पहचान उसकी रूप या उम्र से नहीं बल्कि उसकी बुद्धि से होती हैं।

 

अस्टावक्र जब राजा जनक के पास पहुँचे और अपने आने का उद्देश्य बताया तो पहले तो राजा जनक हैरान हुए। लेकिन फिर जब उन्हें अस्टावक्र की बुद्धिमत्ता का परिचय हुआ तब उन्होंने ऋषि बंदी के साथ उनके शास्त्रार्थ का आयोजन किया। बहुत ही कम समय में अस्टावक्र ने ऋषि बंदी को हरा दिया और बदले में राजा ने कहा कि इसे भी नदी में डुबो देना चाहिए, जैसे यह अन्य ऋषियों के साथ करता आया है।

 

 

इस पर ऋषि बंदी अपने असली सरूप में आए और कहा कि मैं वरुणदेव का पुत्र हूँ। मुझे मेरे पिता ने धरती पर मौजूत उच्च संतो को भेजने के लिए कहा था ताकि वह यज्ञ पूरा कर पाएं। अब जब मेरे पिता का यज्ञ सम्पन्न हो चूका है तब जितने भी ऋषियों को उन्होंने पानी में डुबोया था वे नदी के बाण से वापस आ जाएंगे।

 

महल में मौजूत सभी लोग भागते हुए नदी के तट पर पहुँचे, जहाँ सभी ऋषि खड़े थे। ऋषि कहोड़ ने यह स्वीकार कर लिया कि उनका पुत्र उनसे भी अधिक बुद्धिमान हैं। बंदी ऋषि ने अस्टावक्र से कहा कि वह उनके पिता का आशीर्वाद लेने के लिए इस नदी में डुबकी लगाए। जैसे ही नदी में डुबकी लगाकर अस्टावक्र बाहर आए उनका शरीर ठीक हो चूका था और वह एक आकर्षक युवक के तब्दीर हो चुके थे।

 

तो यह थी महान ऋषि अस्टावक्र की कहानी। अगर आपको यह लेख “महान ऋषि अष्टावक्र की कहानी | Hindi Story of Sage Ashtavakra ” अच्छा लगा हो तो इसे शेयर जरूर करें और कमेंट में अपने विचार भी जरूर बताइए।

 

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