बुद्धि की करामात | Embellishment of Wisdom Story in Hindi

बुद्धि की करामात | Embellishment of Wisdom Story in Hindi

आज की इस कहानी का नाम है “बुद्धि की करामात” यानि Embellishment of Wisdom Story in Hindi उम्मीद है आपको यह छोटी सी और मजेदार कहानी जरूर पंसद आएगी।

 

बुद्धि की करामात

Work of Wisdom Story in Hiindi

सम्राट हर्षवर्धन के दरबार में विद्वानों की भीड़ लगी हुई थी। उस सभा में तरह-तरह के प्रश्नोत्तर हो रहे थे। कोई भी व्यक्ति अपना प्रश्न पूछ सकता था। सभा में एक छोटा वालक भी था। वालक ने हाथ जोड़कर सम्राट से अपना प्रश्न पूछने की अनुमति माँगी।

 

अनुमति माँगकर वालक ने सम्राट को प्रणाम किया और बोला, “मैं जानना चाहता हूँ की बुद्धि मनुष्य के किस अंग में निवास करता है?”वालक के प्रश्न सुनकर सभी बोलने लगे कि भला यह भी कोई प्रश्न हुआ।

 

ब्राह्मण बोला, “महाराज बुद्धि मस्तिष्क में रहती है।”

मंत्री बोला, “महाराज मेरे विचार से बुद्धि ह्रदय में रहती है।”

 

सम्राट ने वालक से कहा, “वालक तुम्ही अपने प्रश्न का उत्तर दो।”

वालकबोला, “महाराज यदि आप मझे अपने यहाँ बैठने की आज्ञा दे तो मैं इस प्रश्न का उत्तर दे सकता हूँ।”

 

सम्राट ने हँसकर कहा, “आज से यह वालक हमारा मंत्री है।”

वालक मंत्री की सीट पर बैठकर बोला, “महाराज! बुद्धि सदा मनुष्य के होंठो पर रहती है। कोई भी  व्यक्ति  चाहे वह कितना भी विद्वान  हो यदि समय पर उचित बात नहीं कह  सकता तो उसे सदा लज्जित होना पड़ता है।”

 

वालाक का उत्तर सुनकर सभी ने  उसकी बहुत प्रशंसा की।

 

 

वालक ने  दूसरा प्रश्न पूछा, “अब मुझे  बताइए  कि बुद्धि  क्या खाती है?”

मंत्री बोला,  “क्या? बुद्धि कोई आदमी या जानवर है जो कुछ खाएगी?”

 

ब्राह्मण बोला,  “ऐसा बेकार सा प्रश्न पूछकर तुम हमारा समय नष्ट मत करो।”

वालक बोला, “महाराज! बुद्धि समय खाती है। जो लोग बिना  विचारे  जल्दबाजी में कुछ करते हैं, वे मुर्ख होते हैं।”

 

सम्राट ने कहा, “वालक!  तुम सचमुच विद्वान हो।”

वालक बोला, “महाराज! अब मेरे तीसरे प्रश्न का उत्तर दिलवाइए। बुद्धि पहनती क्या है?”

 

ब्राह्मण ने जवाब दिया,  “बुद्धि का कोई आकार नहीं होता। भला वह क्या पहन सकती है?”

वालक बोला, “महाराज! आप इस प्रश्न का उत्तर सकते हैं। मगर उसके लिए आपको मेरी जगह आना पड़ेगा।

 

महराज  वालक की कुर्सी पर बैठ जाते हैं और कहते हैं, “वालक मुझे तो अभी भी उत्तर नहीं सूझ रहा।”

ब्राह्मण बोला, “महाराज! आप अपना राजमुकुट मुझे दीजिए। तो अब महाराज  को उत्तर सूझ ही गया होगा।”

 

सम्राट ने  कहा, “अब मैं समझ गया कि एक बुद्धिमान व्यक्ति के लिए कुछ भी असंभव नही। वह आम आदमी से राजा भी बन सकता है। वालक तुम अद्भुत हो। आज से तुम मेरे न केवल  मुख्यमंत्री हुए, बल्कि मित्र भी हो।”

 

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यह वालक आगे चलकर बाणभट्ट के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाणभट्ट ने संस्कृत भाषा में अनेक रचनाएं लिखी।

 

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