शिवरात्रि की कहानी | Story of Shivaratri in Hindi

शिवरात्रि की कहानी | Story of Shivaratri in Hindi

 Story of Shivaratri in Hindi

 

शिवरात्रि की कहानी 

त्रिमूर्तियों में से एक हैं भगवन शिवजी। उनके रहने का स्थान कैलास। भगवन शिवजी हमेशा ध्यान करते दीखते हैं। पर्वतराजा हिमवंत का राज कैलास के समीप था। पर्वतराजा का विवाह स्वर्ग की अप्सरा मेनका से हुआ और उनकी पुत्री हैं माता पार्वती। उनका यह नाम इसलिए रखा गया क्यूंकि वह पर्वतराजा की पुत्री थी।

 

पार्वती हर कार्य में कुशल थी और उनकी बचपन से ही इच्छा थी कि उनका विवाह भगवान शिवजी से हो। एक दिन नारद ऋषि हिमालय के राज आते हैं और राजा से कहते हैं कि हे महात्मा, पार्वती हमेशा यही चाहती रही कि उनका विवाह भगवान शिवजी के अलावा और किसी से न हो। उन्होंने ऐसा इसलिए कहा क्यूंकि वह माता पार्वती की मन की बात जानते थे।

 

हिमवंत ने अपने पुत्री की विचार बदलने की हर कोशिश की किंतु पार्वती अपनी बात पर ज़िद्दी थी। पार्वती के आग्रह पर हिमवंत उन्हें भगवान शिवजी के पास ले गए और उनसे कहा कि अब से पार्वती तुम्हारी सेवा करेगी। शिव से सहमति लेने के बाद उस दिन से पार्वती भगवान शिव की सेवा करने लगी और उन्हें प्रसन्न करने के लिए पूजा करने लगी।

 

उस समय वहाँ तारकासुर नामक राक्षस रहा करता था जिसे यह वरदान प्राप्त था कि वे भगवान शिव के पुत्र के हाथ मरेगा इसलिए शिव का विवाह होना जरुरी था जिससे उस राक्षस से छुटकारा मिले।

 

भगवान ब्रह्मा इसके बारे में जानते हैं और उन्होंने प्रेम के भगवान से कहा की वे भगवान शिव पर प्रेम का बाण फेंके जिससे वह पार्वती से प्यार करने लगे। तुरंत प्रेम के भगवान अपनी पत्नी रती को लेकर कैलास पहुँचे। वहाँ पहुँचकर प्रेम के भगवान ने देखा कि भगवान शिव गहरे ध्यान में हैं। वे सोचने लगे कि इनके ध्यान में कैसे बाधा डाले जाए और अपने भेजे हुए कार्य को पूरा किया जाए।

 

जब पार्वती भगवान शिव की पूजा कर रहे थे तब प्रेम के भगवान ने उन पर प्रेम का बाण फेंका। विचलित होकर भगवान शिवजी ने अपना तीसरा नेत्र खोला और उससे जो आग उन्होंने फेंकी उससे प्रेम का भगवान जल गया। भगवान ने अपना ध्यान समाप्त किया। इस सबको देख चकित हुई पार्वती को पता चल चूका था कि भगवान शिवजी को केवल भक्ति और पूजा से प्राप्त किया जा सकता हैं।

 

पार्वती ने फैसला कर लिया कि शिवजी को प्रसन्न करने के लिए उन्हें कठिन तपस्या करनी पड़ेगी। एक दिन उस रास्ते आते हुए एक साधु ने पार्वती से प्रश्न किया, ‘सुंदर बालिका, तुम क्यों इतनी कठिन तपस्या कर रही हो?” पार्वती ने इतनी कठिन तपस्या करने के पीछे कारन उन्हें बताया तो वह चकित रह गए। तब साधु ने पार्वती से कहा कि शिव धोखेबाज है और उन्होंने यह भी कहा कि वह शिव पर विश्वास न करे। उस पर अपना समय न वर्वाद करे।

 

साधु ने पार्वती को समझाना चाहा कि वह शिव पर विश्वास न करे किंतु सब बेकार गया। पार्वती को साधु दयारा शिव के विरुद्ध झूठे आरोप लगाए जाने पर गुस्सा आया। अंत में साधु पार्वती के सामने अपने असली रूप में आ जाती है। वे साधु और कोई नहीं बल्कि भगवान शिव थे जिन्होंने पार्वती की परीक्षा लेने के लिए साधु का रूप लिया था। भगवान शिवजी का साधु का रूप लेना पार्वती को अच्छा लगा। भगवान शिवजी पार्वती से विवाह के लिए तैयार हो गए।

 

जब सब ऋषियों को भगवान शिव के विवाह के सहमति का पता चला तो वे हिमवंत के पास जाकर उन्हें शिव के साथ अपनी पुत्री के विवाह के लिए मना लिया। इस तरह भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ। उनकी शादी बड़ी जोर-शोर के साथ हुई। विवाह के बाद सभी देवता भगवान शिवजी के पास पहुँचे और उनसे कहा कि प्रेम के भगवान को वह फिरसे जीवनदान दे दें उन्होंने तो केवल ब्रह्मा के आदेश का पालन किया था। तब भगवान शिव ने प्रेम के देवता को जीवित कर दिया।

 

कुछ समय बाद शिव और पार्वती को एक पुत्र हुआ वे है कुमार स्वामी। गणपति बाप्पा, जिन्हे हम प्यार से बुलाते हैं वे भी भगवान शिवजी के पुत्र हैं। कुमार स्वामी अपने बचपन में ही देवताओ के प्रमुख बने और उन्होंने राक्षस तारकासुर को मारा।

 

तो यह थी शिवरात्रि की कहानी उम्मीद है आपको यह कहानी “शिवरात्रि की कहानी | Story of Shivaratri in Hindi” जरूर पसंद आई होगी अगर अच्छा लगे तो कमेंट और शेयर जरूर करें और असेही पौराणिक कहानियां पढ़ने के लिए इस ब्लॉग को सब्सक्राइब भी जरूर करे। 

 

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