राधा रानी की जन्म कथा | Radha Birth Story in Hindi

कृष्ण की प्रेमिका राधा रानी की जन्म कथा | Radha Birth Story in Hindi

आज के लेख में हम बात करने वाले हैं भगवान श्री कृष्ण की प्रियसी श्री राधा रानी के जन्म कथा (Radha Birth Story in Hindi) के बारे में। हमारे धर्म पुराणों में श्री राधा रानी जी के जन्म कथा के अनेक प्रथा प्रचलित हैं तो उन्ही के आधार पर आज हम आपको श्री राधा रानी जी के जन्म की बहुत सारी कथाएं बताने वाली हूँ।

राधा रानी की जन्म कथा | Radha Birth Story in Hindi

हमारे धार्मिक कथाओ के अनुसार आज से 5200 वर्ष पूर्व मथुरा जिले के गोकुल महावन कस्बे के निकट रावल गाँव में वृषभानु-कीर्तिदा के पुत्री के रूप में राधा रानी ने जन्म लिया था। राधा रानी के जन्म के संवंध में यह कहा जाता है कि माता के पेट से पैदा नहीं हुई थी। उनकी माता ने अपने गर्भ में वायु को धारण कर रखा था। उन्होंने योगमाया की प्रेरणा से वायु को ही जन्म दिया था परंतु वहाँ स्वेछा से ही श्री राधा रानी जी प्रकट हो गई थी।

 

श्री राधा रानी जी कलिंदजा कूलवर्ती निकुंज प्रदेश के एक सुंदर मंदिर में अवतीर्ण हुई। उस समय भाद्रपद का महीना था शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि  अनुराधा नक्षत्र मध्यान्ह काल 12 बजे और सोमवार का दिन था। उस समय राधा जी के जन्म पर नदियों का जल पवित्र हो गया, सम्पूर्ण दिशाए प्रसन्न और निर्मल हो उठी। वृषभानु और कीर्तिदा ने पुत्री की कल्याण की कामना से आनंददायनी दो लाख उत्तम गायों को ब्राह्मणों को दान में दे दी थी।

 

 

एक कथा के अनुसार, ऐसा भी कहा जाता है कि एक दिन जब वृषभानु जी एक सरोवर के पास से गुजर रहे थे तब उन्हें एक वालिका कमल के फूल पर तैरती हुई मिली थी जिसे उन्होंने पुत्री के रूप में अपना लिया। राधा जी आयु में श्री कृष्ण से इग्यारा माह बड़ी थी लेकिन वृषभानु जी और कीर्ति देवी को यह बात जल्दी ही पता चल गई कि श्री किशोरी जी ने अपने मर्जी से ही आंखे नहीं खोली है। इस बात से उन्हें बड़ा दुख हुआ। कुछ समय पश्चात जब नंदमहराज की पत्नी यशोधा जी गोकुल से अपने लाडले के साथ वृषभानु जी के घर आती हैं तब वृषभानु जी और कीर्ति जी उनका स्वागत करते हैं।

 

यशोधा जी कान्हा को गोद में लिए राधा जी के पास आती है और जैसे ही श्री कृष्ण और राधा आमने सामने आते हैं तब राधा पहली बार अपनी आंखे खोलती हैं अपने प्राणप्रिय श्री कृष्ण को देखने के लिए। वह एक तक श्री कृष्ण को देखती हैं। अपने प्राणप्रिय को अपने सामने सुंदर सी बालिका के रूप में देखकर कृष्ण जी स्वयं बहुत आनंदित होते हैं।

 

पद्म पुराण के अनुसार श्री राधा रानी जी की जन्म कथा (Radha Birth Story in Hindi)

श्री राधा रानी जी की जन्म कथा को लेकर पद्म पुराण में भी एक कथा मिलती है कि वृषभानु जी योगभूमि साफ कर रहे थे तो उन्हें भूमि कन्या के रूप में श्री राधा जी प्राप्त हुई। यह भी माना जाता है कि विष्णु के अवतार के साथ अन्य देवताओ ने भी अवतार लिया। वैकुण्ठ में अस्तित्व लक्ष्मी जी राधा के रूप में अवतरित हुई। कथा कुछ भी हो, कारन कुछ भी हो राधा बिना तो कृष्ण है ही नहीं। राधा का उल्टा होता है धारा और धारा का अर्थ होता है जीवनशक्ति। भगवान की जीवनशक्ति राधा हैं। कृष्ण देह हैं तो श्री राधा आत्मा, कृष्ण शव्द हैं तो राधा अर्थ, कृष्ण गीत हैं तो राधा संगीत, कृष्ण बंसी है तो राधा स्वर।

 

भगवान ने अपनी समस्त संसारी शक्ति राधा में समाहित की है। श्री राधा नाम की महिमा अपरमपार हैं। भगवान श्री कृष्ण स्वयं कहते हैं “जिस समय मैं किसी के मुख से रा सुनता हूँ मैं अपना भक्तिप्रेम प्रदान करता हूँ और धा शव्द के उच्चारण करने पर तो मैं राधा नाम सुनने के लोभ से उसके पीछे चल देता हूँ।” कृष्ण के साथ श्री राधा सर्वोच्च देवी रूप में विराजमान हैं। भगवान श्री कृष्ण जगत को मोहते हैं तो राधा कृष्ण को।

 

बारहवीं सदी में जब जयदेव जी के गीत गोविंद रचना से सम्पूर्ण भारत में कृष्ण और राधा के आध्यात्मिक प्रेम संवंध जन-जन में प्रचार हुआ। विद्वान और पंडित लोग कहते हैं कि जिस समाधी भाषा में भगवत लिखी गई हैं और जब राधा जी का प्रवेश हुआ है तो व्यास जी इतने डूब गए कि राधा चैत्र लिख ही नहीं सके।

 

 

सुकदेव जी पूर्व जनम में राधा जी की निकुंज के सुख थे। निकुंज में गोपियों के साथ परमात्मा क्रीड़ा करते थे। सुकदेव जी सारे समय श्री राधे राधे करते थे। यह सुनकर राधे ने हाथ उठाकर तोते को अपनी ओर बुलाया। तोता आकर राधा जी के चरणों की वंदना करता है। वह उसे उठाकर अपने हाथ में ले लेते हैं। तोता फिर श्री राधे श्री राधे बोलने लगा। राधा जी ने कहा कि अब तू राधे राधे न कहा कर कृष्ण कृष्ण कह। उसी समय वहाँ भगवान श्री कृष्ण आ जाते हैं।

 

राधा जी ने कहा कि यह तोता कितना मधुर बोलता है और उस तोते को ठाकुर जी के हाथ में दे देते हैं। इस प्रकार श्री राधा जी ने सुकदेव जी का बब्रह्मा के साथ प्रत्यक्ष संवंध कराया इसलिए सुकदेव जी ही सद्गुरु श्री राधा जी ही हैं। इसलिए सद्गुरु होने के कारन भगवत में सुकदेव जी ने अपनी सद्गुरु राधा जी का अपने मुख से कहीं नाम ही नहीं लिया और दूसरा कारन राधा शव्द भागवत में न आने का कारन यह है कि जब सुकदेव जी यदि राधा शव्द ले भी लेते तो यह उसी पल राधा जी के भाव में इतना डूब जाते तो पता ही नहीं कितने दिनों तक उस भाव से बाहर ही नहीं आ पाते।

 

अब प्रश्न यह उठता है कि तीनो लोक के तारक भगवान कृष्ण को शरण देने का समर्थ रखने वाला यह ह्रदय उसी आराधिका का है जो पहले राधिका बनी। उसके बाद कृष्ण की आराध्य हो गई। राधा को परिभाषित करने का सामर्थ तो ब्रह्मा जी में भी नहीं। एक बार श्री कृष्ण राधा से पूछते हैं कि हे राधे भागवत में तेरी क्या भूमिका होगी? इसके जवाब में राधा जी कहती है कि मुझे कोई भूमिका नहीं चाहिए कान्हा मैं तो तुम्हारी छाया बनकर रहूंगी। भगवान श्री कृष्ण के प्रत्येक सृजन की पृष्टभूमि यही छाया हैं चाहे वोह कृष्ण की बाँसुरी का राग हो या गोवर्धन को उठाने वाली तर्जनी या लोकहित के लिए मथुरा से दयारका तक की यात्रा की आत्मशक्ति। श्री राधिका को भगवान श्री कृष्ण आराधिका कहा गया हैं। आराधिका का आ हटा दिया जाये तो राधिका शव्द ही बनता हैं।

 

 उम्मीद करता हूँ आपको यह लेख “कृष्ण की प्रेमिका राधा रानी की जन्म कथा | Radha Birth Story in Hindi” जरूर अच्छी लगी होगी अगर अच्छा लगे तो कमेंट करके जरूर बताएं और हमारे इस ब्लॉग को भी जरूर सब्सक्राइब करें।

 

यह भी पढ़े 

माता लक्ष्मी कैसे बनी विष्णु जी की पत्नी

छठ पूजा की सुरुवात आखिर कैसे हुई पूरी कहानी

भगवान राम की मृत्यु कैसे हुई थी?

रावण की असली कहानी

सावन महीने में भोलेनाथ की कहानी

 

Follow Me on Social Media

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *