कृष्ण पुत्र पद्युम्न की कहानी | Krishna Son Pradyumna Story in Hindi

कृष्ण पुत्र पद्युम्न की कहानी | Krishna Son Pradyumna Story in Hindi

आज इस लेख  में हम बात करेंगे श्री कृष्ण के सबसे पहले पुत्र के जन्म के कहानी के बारे में। तो चलिए इस कहानी को शुरू करते हैं।

कृष्ण पुत्र पद्युम्न की कहानी

वह श्री कृष्ण और रुक्मिणी के अनंत प्रेम का निशानी था, वह स्वयं महालक्ष्मी का पुत्र था। मैं बात कर रही हूँ श्री कृष्ण के सबसे बड़े पुत्र पद्युम्न के बारे में जो उन्हें अपनी सबसे पहली पत्नी लक्ष्मीस्वरूप प्राणप्रिय पत्नी श्री रुक्मिणी जी से प्राप्त हुआ था। हम सब यह कहानी तो जानते ही हैं कि शिव जी ने किस प्रकार कामदेव को भस्म कर दिया था और उनकी पत्नी रति के अनुरोध के बाद उन्हें यह आशीर्वाद दिया था कि कामदेव का जन्म भगवान कृष्ण के पुत्र के रूप में दैत्यराज संभासुर के वध करने के लिए द्वापर युग में होगा। इसलिए रति संभासुर के यहाँ दासी के रूप में काम करने लगी और समय आने पर माता रुक्मिणी ने द्वारका में अत्यधिक सुंदर वह दिव्य वालक को जन्म दिया।

 

उस वालक का सौन्दर्य, शील सा गुण आदि सभी श्री कृष्ण के समान थे मानो खुद श्री कृष्ण की परछाई हो। जब दैत्यराज संभासुर को यह पता चला कि उसका शत्रु यदुकुल में जन्म ले चूका है तब वह वेश बदलकर द्वारका पहुँच जाते हैं और दस दिन के पद्युम्न को उठाकर ले जाता है और समुद्र में डाल देता है।

 

समुद्र में  उस शिशु को एक मछली निगल गई और वह मछली एक मछुआरे के जाल में फँस गई। उसे  संभासुर के रसोई घर में भिजवा दिया गया। जब उस मछली के पेट को फाड़ा गया तो उसमें से एक  अति सुंदर वालक निकला। उसको देखकर संभासुर के दासी मायावती के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। वह समझ गए कि वह उन्ही के पति कामदेव हैं। वह उस वालक का पालन-पोषण करने लगी। तभी एक दिन देवर्षि नारद वहाँ आए और उन्होंने उसे बताया कि शक न करे देवी, यह आप ही के पति कामदेव हैं। उस वालक का नाम पद्युम्न रखा गया।

 

 

थोड़े ही काल में पद्युम्न युवा हो गए और पद्युम्न का रूप इतना अद्भुत था कि साक्षात् श्री कृष्ण ही प्रतीत होते थे। रति उन्हें अत्याधिक प्रेमभाव से  देखा करती थी। तब पद्युम्न बोले कि तुमने माता के समान मुझे पाला फिर तुम मुझे एक प्रेमिका के समान क्यों देखती रहती हो? तब रति ने बताया कि आप मेरे पुत्र नहीं मेरी पति हो और आपका जन्म संभासुर के वध हेतु हुआ है। इस प्रकार उन्होंने पद्युम्न को पुनर्जन्म का बोध कराया और उन्हें महाविद्याऐं प्रदान की, उन्हें धनुष-वान और युद्ध विद्या में निपुण बनाया। तत्पश्चात अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर पद्युम्न संभासुर के सभा में पहुँचे।

 

संभासुर प्रसन्न होकर सबसे कहते हैं कि इस वालक का पालन-पोषण हमने किया है। इस पर पद्युम्न बोले, “अरे दुष्ट, मैं तेरा वालक नहीं हूँ बल्कि शत्रु हूँ जिसे तुमने समुद्र में डाल दिया था।” पद्युम्न का जन्म ही संभासुर के वध के लिए हुआ था इसलिए उन्होंने संभासुर के वार को काट दिया और अपने तलवार से आसानी से संभासुर का सर काटकर भूमि पर गिरा दिया।

 

 

देवतागण उन पर फूलो की वर्षा करने लगे और देवी रति और कामदेव का पुनर्मिलन हो गया। उसके बाद देवी रति और कामदेव दोनों द्वारिका जाकर कृष्ण से मिले। जैसे ही माता रुक्मिणी ने दूर से पद्युम्न को देखा तो उन्हें लगा कि वह कृष्ण हैं और वह स्वामी कहकर उनकी ओर बढ़े। तभी उन्हें श्री कृष्ण दूसरे ओर से आते हुए दिख गए और उन्हें समझ आ गया की यह और कोई नहीं बल्कि उन्ही का पुत्र है। इतने सालो की ममता जिस पुत्र को देखने के लिए तरस गई थी उसे सामने खड़ा देख उनके आँखों से आँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। आज तक किसी ने भी द्वारिका में माता रुक्मिणी का यह रूप नहीं देखा था। उन्होंने तुरंत उन्हें दौड़कर गले से लगा लिया और जोर-जोर से रोने लगी। इस प्रकार माता रुक्मिणी और पद्युम्न का पुनर्मिलन हुआ।

 

तो दोस्तों आपको यह कहानी “कृष्ण पुत्र पद्युम्न की कहानी | Krishna Son Pradyumna Story in Hindi” कितनी हद तक सही लगती है और आपका इसके बारे में क्या विचार हैं आप कमेंट करके जरूर बता सकते हैं।

 

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