जादुई नदी की कहानी | Magical River Story in Hindi

जादुई नदी की कहानी | Magical River Story in Hindi

Magical River Story in Hindi

 

जादुई नदी की कहानी

रामु नाम का एक व्यापारी शहर से दूर एक छोटे से गाँव में रहता था। वह गाँव से अलग-अलग प्रकार के सामान ले जाता और बाजार में जाकर बेचता था। रामु के पास एक गधा था। गधे के पीठ पर सारा सामान की बोरी लादकर व्यापर के लिए रोजाना शहर जाया करता था।

 

रामु अपने गधे का खूब ख्याल रखता था। खिलाने-पिलाने से लेकर हर जरूरते उसकी पूरी करता था। उसे पता था गधा उसके लिए बहुत जरुरी है इसलिए अपने गधे को हमेशा साफ और स्वस्थ रखता था। उसे अच्छा-अच्छा खाना देता था लेकिन गधा एक नंबर का आलसी था।

 

गधे को काम करना बिलकुल पंसद नहीं था। वह सिर्फ बैठकर मालिक की रोटी तोडना और पुरे दिन सोना चाहता था। अगले दिन रामु बाजार जाने के लिए तैयार हो रहा था। गधे का बिलकुल मन नहीं था।

 

गधे को यह नहीं पता  था कि व्यापारी एक दिन भी छुट्टी लेगा बाजार नहीं जाएगा तो उसे कितना बड़ा नुकसान होगा और जब पैसे नहीं आयेंगे तो गधे को भी खाना कहाँ से खिलाएगा।

 

व्यापारी रोज गधे को लेकर बाजार के लिए निकल पड़ता था। रास्ते में एक नदी पड़ती थी। व्यापारी बहुत संभलकर गधे को नदी पार कराता था।

 

घर वापस आते ही व्यापारी को उसका दोस्त मिल गया। दोस्त ने बताया कि बाजार में नमक की बहुत माँग है। व्यापारी ने यह बात सुनते ही उसके दोस्त को सुक्रिया कहा और अगले दिन वयापारी ने नमक की बारह बोरियाँ तैयार कर ली।

 

अगले दिन उसने गधे के पीठ पर छह बोरियाँ लाद दी। गधा आगे नहीं बढ़ पा रहा था। रामु को अहसास हुआ कि बोरियाँ बहुत ज़्यादा भारी हैं। गधे को तकलीफ होता देख रामु ने एक बोरी उसके पीठ से उतार दी। इसके बावजूद भी गधा एक कदम नहीं चल पा रहा था।

 

रामु को पता था कि उसका गधा एक नंबर का आलसी हैं। उसने छड़ी निकाली गधे को मारने के लिए फिर भी गधा आगे नहीं बढ़ा। रामु को लगा कि सायद आज उसके गधे की तबियत ख़राब है इसलिए नहीं जा रहा है।

 

रामु ने खुद अपने सिर पर दो बोरियाँ लादकर बाजार चला गया। इधर मालिक के जाते ही गधा बहुत खुश हुआ। उसने पुरे दिन खाया-पिया और मस्ती किया।

 

अगले दिन जब मालिक ने फिरसे गधे की पीठ पर नमक की बोरियाँ लाद दी तो गधा फिर एक कदम नहीं चलने को तैयार था। मालिक ने छड़ी निकाला और गधे के पीठ पर बरसाना शुरू कर दिया। गधा सामान लेकर बाजार की ओर निकल पड़ा। उस दिन सारी नमक की बोरियाँ बिक गई।

 

 

इस तरह व्यापारी ने रोज नमक बेचना चालू कर दिया। आलसी गधे को नमक की बोरियाँ ढोना अच्छा नहीं लगता था। एक दिन जब व्यापारी नमक की बोरियों के साथ नदी पार कर रहा था तो नदी के बीचो-बीच गधा गिर पड़ा। व्यापारी ने जैसे तैसे कर गधे को ऊपर की ओर खिंचा।

 

गधा डरा हुआ था। उसे कुछ महसूस हुआ “अरे बाह! बोरियाँ मेरी पीठ पर लदी हैं पर उसका वजन पता क्यों नहीं चल रहा मुझे। नदी में कोई जादुई शक्ति हैं।”

 

गधा यह नहीं जानता था कि कोई जादुई शक्ति नहीं बल्कि जब वह नदी में गिर गया था तो सारा नमक पानी में घुल गया इसलिए उसे हल्का महसूस हो रहा था। व्यापारी ने जब बोरियाँ खोलकर देखि तो बोरियाँ खाली थी।

 

उस दिन व्यापारी वापस घर लौट गया। गधा बहुत खुश हुआ। उस पुरे दिन गधा घर आया और खूब खाया और सोया। अगले दिन व्यापारी ने फिरसे छह बोरियाँ नमक की भरी और लाद दी।

 

दोनों बाजार की ओर चल पढ़े। रास्ते में गधा सोच रहा तथा “कल तो पुरे दिन मजा किया आज वापस से काम करना पढ़ रहा हैं। मैं तो अपने पीठ का वजन कम करने वापस घर जा सकता हूँ। पानी में जादुई शक्ति है। मुझे यकीं है कि मुझे जरूर छुट्टी मिलेगी।

 

नदी पार करते समय गधा वापस से उसी जगह बैठ गया जहाँ वह ही गीरा था और गधे के ऊपर रखा हुआ नमक पिघल गया। तीसरे दिन भी गधा यही करता है।

 

व्यापारी को सब समझमे आ गया कि यह गधा जान-बूझकर ऐसा कर रहा है और कहा, “मैं इसकी इतनी सेवा करता हूँ और वदले मने अपने मालिक के साथ ऐसा वर्ताव कर रहा है। इसे तो सबक सिखाना ही पड़ेगा।

 

अगले दिन व्यापारी गधे के पीठ पर आठ बोरियाँ लाद दी। गधे ने कोई शिकायत नहीं की और कहाँ ,”आज आठ बोरियाँ। मालिक चाहें मेरी पीठ पर कितनी बोरियाँ लाद दे मैं कहाँ बाजार जाने वाला हूँ।” नदी के बीचो-बीच जाकर गधा वापस से फिसलकर हमेशा की तरह पानी में बैठ गया।

 

 

जैसे ही गधे ने उठने की कोशिश की पीठ पर रखा वजन उसे दुगना लगने लग गया। व्यापारी बहुत ही चालाक आदमी था। वह जानता था कि गधा वापस वहीं तरकीब अपनाएगा इसलिए उसने नमक की जगह कपास बोरियों में भरी थी। जैसे ही गधा पानी में बैठ गया कपास ने पानी सोख लिया और भारी हो गया।

 

व्यापारी पहले खूब हँसा। गधा समझ गया कि पानी में कोई जादू नहीं है। गधे को फिर आठ भारी कपास की बोरियाँ लेकर बाजार जाकर वापस भी लौटना था। उस दिन के बाद गधे ने कभी भी पानी में बैठने की हिम्मत नहीं की।

 

इस कहानी से सीख, Moral of The Story:

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती हैं कि हमें कभी भी काम करने से जी नही चुराना चाहिए।

 

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