अंधे पंडित की मजेदार कहानी | Blind Scholar Story in Hindi

Blind Scholar Story in Hindi

 

अंधे पंडित की मजेदार कहानी

एक बार की बात है किसी गाँव में एक पंडित रहता था जो दोनों आँखों से अँधा था जो गाँव के बाहर एक झोपडी में रहता था। एक दिन उस गाँव में एक सेठ के घर रसोई का आयोजन किया गया जिसमे आसपास के गाँव के कई पंडितो को भोजन का निमंत्रण दिया गया।

 

इसी प्रकार गाँव के बाहर रेहने वाले उस पंडित को भी भोजन का निमंत्रण देने के लिए सेठ ने अपने नौकर को भेजा। जब नौकर सेठ के घर पहुँचा तो उसने पंडित जी को आवाज लगाई तो सेठ घर से बाहर आकर बोला, “कौन है भाई…!”

 

नौकर ने अपना परिचय दिया और कहा कि गाँव में सेठ के घर एक बड़ी रसोई का आयोजन किया जा रहा है और जिसमे आपको भी भोजन का निमंत्रण भेजा है सेठ जी ने।” पंडित -अच्छा…!!…फिर तो मैं जरूर आऊंगा वहाँ।” नौकर – “हाँ पंडित जी जरूर, आप तैयार रहना मैं आपको लेने के लिए आ जाऊँगा।” (ऐसा कहकर नौकर जाने लगा)

 

पंडित – “हाँ ठीक है भाई…(थोड़ी देर बाद) अरे लेकिन यह तो तुमने बताया ही नहीं कि खाने में क्या क्या बनाया है?” नौकर रूककर बोला- “पंडित जी…!! सेठ जी का प्रोग्राम है, कोई छोटा मोटा आयोजन थोड़े है! सब कुछ बनाया जाएगा खाने में।”

 

पंडित – “अरे…मैंने बस ऐसे ही पूछ लिया।” नौकर – “आप चिंता न करे वहाँ सब कुछ मिलेगा। खाने में हलुआ-पूरी, सेव-नमकीन, बर्फी अगेरह-वगैरह।” पंडित- “हाँ, हाँ मुझे मालूम था कि ऐसा ही कुछ, मैं वहाँ पहले भी खा चूका हूँ।”

 

नौकर के  के बाद पंडित मन ही मन सोचने लगा कि यार वह सब तो ठीक है परन्तु यह अगेरह वगेरह क्या है? यह अब भी समझ नहीं आया। यह तो कोई नया पकवान लगता है इस बार। अगर ऐसा है तब तो मैं जरूर जाऊँगा इस बार, देखूँ तो सही कैसा लगता है यह अगेरह वगैरह।

 

शाम होने पर सेठ का नौकर पंडित को खाने पर ले आया और पंडित को एक पंगत पर बैठा दिया। पंडित की जिज्ञासा अब और ज़्यादा बढ़ने लगी कि आज तो मजा आजाएगा नया पकवान (अगेरह वगैरह)

 

पंडित यह सब सोच ही रहा था कि तभी दौना-पत्तल लगाकर भोजन परोसा जाने लगा। अब पंडित जी की स्वादेंद्रिया जाग उठी। अब जैसे ही पत्तल में कोई पकवान रखा जाता पंडित तपाक से उसे छूकर यह जानने की कोशिश करता कि वह क्या है और सोचता…अच्छा यह तो रसगुल्ला है, अरे यह तो मिठाई है, हां यह तो बर्फी है…यह सब तो मैं कई बार खा चूका हूँ। मुझे तो बस वह मिल जाये अब, सबसे पहले तो मैं उसे ही चखूँगा और बाकि सब बाद में।

 

धीरे-धीरे पत्तल भरती गई और पंडित इसी तरह सभी पकवानो को उत्सुकता से जाँचता रहा परन्तु उसे अब भी इंतजार था उस अनजान और मायावी चीज का जिसके लिए आज वह पुरे दिन भर नमक का पानी पी-पीकर अपनी भूख को बढ़ाता रहा।

 

वह सोचने लगा…आखिर कब आएगा अगेरह वगैरह…पूरी पत्तल भर चुकी अब तो। तभी किसी की आवाज आई कि भोजन शुरू किया जाए। तभी…!!! अरे यह क्या…! अभी तो मेरा वो…!! कब लाओगे…? (पंडित जोर-जोर से बुदबुदाने लगा)

 

अरे ऐसा तो नहीं कि किसी ने जल्दीबाजी में रख दीया हो इधर-उधर। (पंडित अपने दोनों हाथो से उसे ढूंढ़ने लगे) तभी उसने पत्तल के बाहर एक गोल गोल चीज (गोल पत्थर) को छुआ तो मन थोड़ा शांत हुआ। “हाँ यही होगा सायद…और कितने मुर्ख लोग है…खाने की चीज को भी ऐसे ही रख जाते हैं।”

 

अब पंडित उस गोल चीज को पाकर बहुत खुश था, तभी उसने सोचा कि यह सब तो मैं बाद में खाऊँगा पहले इसका स्वाद लिया जाए कि लगता कैसा है और कैसा स्वाद है इसका।

 

तभी पंडित ने उस अद्भुत चीज को उठाया और जैसे ही मुँह में दबाया तो…”अरे…!! ये क्या…इतना भारी और कठोर…!!” पंडित ने फिर जोर से दांतो में दबाया तो इस बार मुँह से जोरदार आह निकल पड़ी। “अरे भगवान कितना सूखा हुआ है यह…कैसे खाया जाए इसे…!! इसे तो दांतो से तोडना भी मुश्किल है। अब क्या करे इसका…?”

 

तभी पंडित को एक उपाय सुझा। “लगता है इसे फोड़ना पड़ेगा, हो सकता है इसके अंदर कोई गुठली जैसा आइटम निकले।” पंडित को लगा की सामने कोई दिवार है और सायद उससे टकराने पर उसका वह अगेरह वगैहरा फुट जाये। और तभी उसने आव देखा न ताव और सामने दीवार समझकर दे मारा जोर से।

 

की तभी…!!! (किसी के जोर से चिल्लाने की आवाज आई) “आह…फुट गया रे…मेरा तो….!!!” (सामने पंगत पर बैठा हुआ आदमी दर्द से चिल्ला उठा क्यूंकि पत्थर की जोरदार चोट से उसका सर फुट गया था।

 

तभी पंडित गुस्से से बोला…ओये खाना मत यह मेरा आइटम है, फुट गया तो ला वापस दे दे मुझे। (पंडित को लगा कि उसका अगेरह वगैहरा फुट गया है) तभी सामने वाला आदमी भयंकर गुस्से से बोला…हाँ जरूर…रुको महाराज अभी देता हूँ आपको। और फिर सामने वाला आदमी टूट पड़ा पंडित पर।

 

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