पिता की सीख | Pita Ki Seekh Hindi Story

पिता की सीख | Pita Ki Seekh Hindi Story

 

इस कहानी में (Pita Ki Seekh Hindi Story) बताया गया है कि जो बालक अपने माता-पिता का कहना नहीं मानते उन्हें अनेक परिशानियों का सामना करना पड़ता है। इस लेख में एक ऐसे ही बालक की कहानी है।

 

पिता की सीख 

(Pita Ki Seekh Hindi Story)

 

एक गाँव में एक जमींदार रहता था। उसका एक ही लड़का था, जिसका नाम किशन था। किशन बहुत वीर था और सभी प्रकार के युद्ध विद्याओं में प्रारंगक था। किशन वीरता की कार्य करना चाहता था परंतु उसे इसके लिए कभी मौका नहीं मिलता था। उसने एक दिन अपने पिता से अपनी इच्छा व्यक्त की कि वह बाहर घूमने जाना चाहता है। 

 

पिता ने उसे घूमने जाने की आज्ञा दे दी। घूमने जाने से पहले उसके पिता ने किशन को बुलाया और कहा, “तुम्हे तीन खास बातों का ध्यान रखना होगा, पहला यह कि कभी भी अकेले यात्रा पर मत जाओ, दूसरी बात कि जहाँ भी विश्राम करो उस जगह को ध्यान से याद करलो, अपने देश  जंगलो में भालू बहुत है उनका सामना कभी न करना और यदि भालू दिखाई दे तो चुपचाप साँस रोककर जमीन पर लेट जाना क्यूंकि भालू ऐसे लोगों को कभी नहीं छेड़ता है।

 

पिता की सीख लेकर किशन घूमने के लिए रवाना हो गया। उसकी देखभाल के लिए पिता ने दो आदमी उसके साथ भेजे परंतु वह अकेले घूमना चाहता था तथा किशन उन दोनों को चख्मा देकर भाग गया। चलते-चलते रास्ते में एक जंगल पड़ा। जंगल में वह थोड़ी ही दूर आगे बढ़ा होगा कि सामने से एक शेर गरजता हुआ उस पर कूद पड़ा। किशन को अपनी वीरता दिखाने के लिए पहली बार मौका मिला था। उसने वीरता के साथ कटार निकाली और शेर से भीड़ गया।

 

काफी देर तक दोनों में लड़ाई होती रही। अंत में उसने शेर को मार गिराया। शेर को मारने के बाद उसने सोचा, “मैं ऐसे ही सभी खतरों का सामना आसानी से कर सकता हूँ।” थोड़ी देर विश्राम करने के बाद वह वहाँ से उठकर आगे बढ़ा। थोड़ी ही दूर गया होगा कि उसे आहट सुनाई दी। आहट सुनते ही उसने जैसे ही कटार निकालने के लिए कमर पर हाथ बढ़ाया उसे कटार न मिली। वह कटार वहीं पर भूल गया था जहाँ उसने विश्राम किया था परंतु उसे अब वह जगह याद नहीं थी।

 

थोड़ी ही देर में उसे दो भालू अपनी ओर आते दिखाई दिए। उसे अपनी पिता की दी हुई सीख याद आ गई कि भालू के दिखाई देने पर साँस रोककर लेट जाना। वह वहीं साँस रोककर लेट गया। भालू वहाँ से उसे बिना कुछ हानि पहुँचाए अपने रास्ते चले गए। भालू के जाते ही किशन उठा और अपनी कटार ढूंढने के लिए उस जगह पहुँचा जहाँ उसने विश्राम किया था। उसे वह जगह ढूंढने पर भी नहीं मिली और न ही कटार मिली। वह बिना कटार के जंगल में और आगे जाने का ख्याल छोड़कर वापस लौटने लगा।

 

कड़ी धुप में किशन को भूख-प्यास सताने लगी। उसे निकट ही एक बड़ा बगीचा और सरोवर दिखाई दिया। सरोवर देखते ही उसे नहाने की इच्छा हुई। वह कपड़े उतारकर नहाने लगा। नहाने के बाद जब वह लौटकर किनारे आया तो देखा कि कपड़े नहीं है। उसने चारो और देखा तो उसे कोई दिखाई नहीं दिया। उसकी नजर फिर पेड़ के ऊपर गया तो उसे पेड़ पारर बंदर दिखाई दिए। बंदरो के पास उसके कपड़े थे और वे कपड़ो को दांतो से नोच रहे थे। उसने सोचा, “पिताजी ने ठीक ही कहा था कि सफर में अकेले नहीं चलना चाहिए। यदि साथ में कोई होता तो ऐसा न होता।”

 

कपड़े प्राप्त करने के उद्देश्य से उसने बंदरो पर पत्थर फेंके तो उसके जवाब में बंदरो ने उस पर कपड़े फेंके। कपड़े तो किशन को वापस मिल गए परंतु वे फट गए थे। उसे मज़बूरी में ही फटे कपड़े पहनने पड़े। फटे कपड़े पहनकर वह घर वापस आ गया और उसने अपने पिता से सफर में हुई सारि मुश्किलों को बताया और पिता दुयारा बताई गई बातों को न मानने पर उत्पन्न हुई परेशानियों को बताया और माफ़ी मांगी। पिता ने किशन से कहा, तुम्हे मेरी बातों का अनुभव हुआ और इन्ही अनुभवों से ही आदमी कुछ सीखता है।”

 

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