पंचतंत्र की कहानी | सियार पंडित की पाठशाला | Jackal Pandit's School Panchatantra Story in Hindi

पंचतंत्र की कहानी | सियार पंडित की पाठशाला | Jackal Pandit’s School Panchatantra Story in Hindi

Jackal Pandit’s School Panchatantra Story in Hindi

 

सियार पंडित की पाठशाला

किसी जंगल में नदी के भवर में एक मगरमच्छ रहता था। मगरमच्छ के सात बच्चे थे। लेकिन मगरमच्छ को वहाँ के बंदरों ने काफी बार मुर्ख बनाया था। इसलिए मगरमच्छ चाहता था कि उसके बच्चे उसकी तरह मुर्ख नहीं बल्कि लोमड़ी की तरह चतुर बने। इसलिए एक दिन मगरमच्छ ने अपने बच्चों को कहा, “देखो बच्चो, वैसे तो हमारी लोमड़ी से दुश्मनी है लेकिन हम मुर्ख लोग है, गधे भी हमें मुर्ख बना जाते है। इसलिए मैं तुम्हें सियार पंडित की पाठशाला में दाखिल करने ले जाता हूँ। सियार पंडित की पाठशाला नदी की पास की गुफा में ही है। कल सुबह मैं तुम सबको उनकी पाठशाला में ले जाऊँगा।”

 

दूसरे दिन सुबह, मगरमच्छ अपने सातों बच्चों को सियार पंडित की गुफा के पास ले गया और सियार पंडित को आवाज लगाई, “सियार पंडित, ओ सियार पंडित।” मगरमच्छ की आवाज सुनकर सियार बाहर आया और मगरमच्छ से पूछा, “क्यों सुबह सुबह गला फाड़ रहे हो?”

 

मगरमच्छ ने कहा, “अरे सियार पंडित, मैं अपने सात मुर्ख बच्चों को आपकी पाठशाला में पढ़ाना चाहता हूँ, ताकि वे भी आपकी तरह चतुर और चालाक बने।” सियार पंडित ने कहा, “ठीक हैं, आप अपने सातों बच्चों को यहाँ छोड़कर जाइए। सात दिनों के बाद सातों के सात बच्चे हमारी तरह चालाक बन जाएँगे।” मगरमच्छ बोला, “ठीक है सियार पंडित। लेकिन मैं हर रोज अपने बच्चे को एक बार देखने जरूर आऊँगा।” इतना कहकर मगरमच्छ अपने सातों बच्चों को सियार के पाठशाला में छोड़कर चला गया।

 

इस तरफ सियार ने मगरमच्छ के बच्चों को कहा, “आज से मैं तुम्हें चालाक बनाने की शिक्षा शुरू करूँगा। इसके लिए आपको एक मंत्र सीखना पड़ेगा। तो तुम में से कोई एक बच्चा मेरे साथ चलो।”

 

एक बच्चा सियार के साथ एक बड़े से पत्थर के पीछे गया। सियार ने मगरमच्छ के बच्चे को कहा, “जैसे मैं बोलता हूँ वैसे बोलना। कच्चा पक्का कच्चा पक्का सबसे अच्छा मगर का बच्चा।” इतना बोलकर सियार मगरमच्छ के बच्चे को खा गया।

 

दूसरे दिन, मगरमच्छ अपने बच्चों को देखने आया। उसने गुफा के बाहर से सियार पंडित को आवाज लगाई, “सियार पंडित, ओ सियार पंडित, मैं अपने बच्चों को देखने आया हूँ।” मगरमच्छ की आवाज सुनकर सियार बाहर आया और बोला, “आप यहीं रुकिए, मैं आपके बच्चों को बाहर लाता हूँ।” फिर सियार अंदर गया और मगरमच्छ के एक बच्चे को बाहर लाया और कहा ,”ये है एक।” फिर उसे अंदर ले गया और दूसरे को बाहर ले आया और कहा, “ये है दूसरा।”

 

इस तरह सियार ने मगरमच्छ को उसके छह बच्चे दिखाई और फिर अंदर गया और पहले वाले बच्चे को ही फिर ले आया। फिर दूसरे दिन सियार मगरमच्छ के दूसरे बच्चे को खा गया। अगले दिन, जब मगरमच्छ अपने बच्चे को देखने आया तो सियार ने एक-एक करके मगरमच्छ के पाँचो बच्चे दिखाई और जब और दो बच्चे दिखाने की बारी आई तो उसी पाँचो में से दो बच्चों को ले आया।

 

इस तरह एक-एक करके सियार मगरमच्छ के सातों बच्चों को खा गया। अब मगरमच्छ को दिखाने के लिए एक भी बच्चा जिंदा नहीं था। इसलिए मगरमच्छ से बचने के लिए सियार वहाँ से भाग गया। जब मगरमच्छ सियार के गुफा के पास आया और सियार को आवाज दी। लेकिन गुफा से कोई आवाज नहीं आई। मगरमच्छ गुफा के अंदर गया। गुफा के अंदर अपने सातों बच्चों की हड्डियाँ देखकर मगरमच्छ समझ गया कि सियार उसके बच्चों को खा कर भाग गया।

 

गुफा से बाहर आकर मगरमच्छ ने देखा कि सियार नदी पार करता हुआ भाग रहा था। मगरमच्छ भी उसके पीछे गया। जब सियार नदी के दूसरे किनारे पर पहुँचने ही वाला था की तभी मगरमच्छ ने लपककर सियार का पिछला पैर पकड़ लिया। चालाक सियार बिलकुल नहीं डरा। वह जानता था कि मगरमच्छ को कैसे बेबकुफ़ बनाना है। सियार ने ऊँची आवाज में कहा, “अच्छा हुआ मगरमच्छ मुर्ख है, इसलिए मेरे पैर को छोड़कर लकड़ी को पकड़कर बैठा है।”

 

मुर्ख मगरमच्छ चालाक लोमड़ी का छल समझ नहीं पाया और उसे लगा कि उसने सचमे लकड़ी पकड़ी है। तो उसने सियार का पैर छोड़कर लकड़ी को पकड़ लिया और चालाक सियार मगरमच्छ की पकड़ से निकलकर जान बचाकर भाग गया।

 

इस कहानी से सीख, Moral of The Story:

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि बल और बुद्धि की बीच की टक्कर में जीत केवल बुद्धि की ही होती है।

 

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