पंचतंत्र की कहानियां | 5 Best Hindi Panchatantra Stories 

पंचतंत्र की कहानियां | 5 Best Hindi Panchatantra Stories 

5 Best Hindi Panchatantra Stories 

आज मैं आपको बताने वाली हूँ 5 Best Hindi Panchatantra Stories के बारे में। पंचतंत्र की कहानियां संस्कृत और पाली में लिखी गई प्राचीन भारतीय कहानियां हैं। पंचतंत्र की कहानियां बुद्धि का खजाना है और हर एक बच्चे को इन्हें जरूर पढ़ना चाहिए क्यूंकि यह कहानियां बच्चों को एक अच्छी सीख देती है।

 

पंचतंत्र की कहानियां – Panchatantra Ki Kahaniya 

 

1. ईमानदार कुम्हार (Hindi Panchatantra Stories)

एक ईमानदार कुम्हार था। एक बार उसके साथ एक दुर्घटना हो गई और उससे लगी चोट से उसके माथे पर स्थायी रूप से एक निशान बन गया।

 

दिन बीतते गए और एक बार गाँव में अकाल पड़ गया। कुम्हार के पास भी कोई काम नहीं बचा। वह गाँव छोड़कर किसी अन्य जगह चला गया। वहाँ वह राजा की सेना में भर्ती हो गया। एक दिन राजा ने अपनी सेना की शक्ति परखने के लिए नकली युद्ध कराने का निश्चय किया। राजा की निगाह कुम्हार पर भी पड़ी। उसे देखकर राजा सोचने लगा, “यह तो निश्चय ही बहुत बहादुर योद्धा होगा।”

 

राजा ने कुम्हार से पूछा, “किस युद्ध में तुम्हें इतनी गहरी चोट लगी थी।” कुम्हार ने विनम्रता से जवाब दिया, “महाराज, मैं तो कुम्हार था। मैंने जीवन में कभी कोई युद्ध नहीं लड़ा।”

 

यह सुन राजा बहुत क्रोधित हुआ। उसने अपने सैनिको को आदेश दिया, ‘सैनिको यह झूट बोलता है। इसे दंड दिया जाए।” कुम्हार रोने लगा और बोला, “महाराज, मैं योद्धा नहीं हूँ, यह बात सच है, लेकिन मुझमें युद्ध लड़ने की हिम्मत और शक्ति है। फिर महाराज, मैंने आपसे झूट भले ही बोला हो, पर मैंने आपको सच्चाई बताने का खतरा भी उठाया है। ऐसे में मुझे दंड नहीं दिया जाना चाहिए।”

 

राजा उसकी सच्चाई से प्रसन्न हुआ और उसने कुम्हार को सोने के कई सिक्के पुरष्कार में दिए।

 

2. निडर तपस्वी (Hindi Panchatantra Stories)

एक नौजवान तपस्वी व्यापारियों के एक काफिले के साथ यात्रा कर रहा था। काफिला रात में कहीं पर रुक जाता और सारे लोग सो जाते। तपस्वी अकेला जागता रहता और उनके तंबू के आसपास घूमता रहता। अचानक उसने देखा कि कुछ लुटेरों ने काफिले को घेर लिया है।

 

तपस्वी ने आक्रमण की तैयारी कर ली। एक लंबा डंडा उठाकर उसने अकेले ही लुटेरों से लोहा लेना शुरू कर दिया। लाठी घुमाते हुए तपस्वी ने कहा, “कायरों! तुम एक इंसान को नहीं डरा सकते। अगर मैं अपने साथियों को भी बुला लूँ तो क्या होगा?”

 

लुटेरे उसकी शक्ति और साहस देखकर हैरान हुए और जल्द ही वहाँ से भाग निकले। अगले दिन, व्यापारियों को सारी बात पता चली। सभी ने तपस्वी को धन्यवाद दिया। वे पूछने लगे, “क्या तुम्हें लुटेरों से डर नहीं लगा?”

 

तपस्वी मुस्कुराया और बोला, “लुटेरों से डर तो धनी लोगों को लगता है। मेरे पास तो एक पैसा नहीं है। फिर मुझे किस बात का डर लगता?”

 

3. सुनहरा हंस (Hindi Panchatantra Stories)

एक बार एक ब्राह्मण की मौत हो गई। उसकी निर्धन पत्नी अकेली बची। ब्राह्मण ने मरने के बाद सुनहरे हंस के रूप में दोबारा जन्म लिया और अपनी पत्नी के पास जाने का निश्चय किया। वह अपने पुराने गाँव गया, जहाँ उसने देखा कि उसकी पत्नी बहुत निर्धनता में जीवन बिता रही है। यह देख हंस को बहुत दुख हुआ और अपनी पत्नी से कहने लगा, “मैं तुम्हारा पति हूँ। मैं हर दिन तुम्हें एक स्वर्ण-पंख दूंगा।तुम उसे बेच दिया करो और उस धन से अपनी आवश्यकताएँ पूरी कर लिया करो।”

 

इसके बाद, वह हंस अपनी पत्नी को हर दिन एक स्वर्ण-पंख देने लगा। पत्नी जल्द ही बहुत धनी हो गई। एक दिन ब्राह्मण की पत्नी ने सोचा की क्यों न सारे स्वर्ण-पंख एक साथ निकाल लिए जाएँ। उसने हंस को पकड़ा और सारे पंख नोंच-नोंचकर निकलने लगी।

 

हंस ने जी-जान लगाकर अपने को किसी तरह छुड़ाया और हमेशा के लिए उड़ गया। लालची औरत अकेली रह गई और उसके पास अब आमदनी का कोई साधन नहीं रहा।

 

4. असली मूल्य (Hindi Panchatantra Stories)

एक राजा था, जिसका नौजवान ख़जांची बहुत बेईमान था। एक बार उसने व्यापारी के बहुत सारे घोड़े ले लिए और बदले में उसे सिर्फ एक कटोरी चावल दे दिए। व्यापारी बहुत क्रोधित हुआ।

 

अगले दिन, वह राजदरवार में गया और राजा से कहने लगा, “हे राजन! मैं एक कटोरी चावल का असली मूल्य जानना चाहता हूँ।” राजा ने ख़जांची से व्यापारी के प्रश्न का उत्तर देने को कहा।

 

ख़जांची व्यापारी को मनाने के इरादे से कहने लगा, “महाराज, एक कटोरी चावल का मूल्य तो पुरे बनारस राज्य के बराबर होगा।” राजा ख़जांची के उत्तर से चकित रह गया। उसे समझ में आ गया कि उसने इसे ख़जांची बनाकर गलती कर दी। उसने व्यापारी के घोड़ों के बदले में उनका असली मूल्य दिया और ख़जांची को देश से निकाल दिया गया।

 

5. विश्वास की शक्ति (Hindi Panchatantra Stories)

एक दिन बुद्ध का एक शिष्य पास के गाँव से मठ लौट जा रहा था। रास्ते में उसे नदी पार करनी थी। उस समय नदी किनारे कोई नाव नहीं थी। शिष्य हर हाल में अपने गुरु के सायंकालीन प्रवचन सुनना चाहता था, इसलिए वह चलकर ही नदी पार करने लगा।

 

बुद्ध के ध्यान में वह इतना लीन हो गया कि उसने पानी के स्तर पर भी ध्यान नहीं दिया। अचानक उसका ध्यान गया तो उसने पाया कि पानी उसके गर्दन तक आ गया है। वह डर के मारे चिल्लाने लगा, “हे भगवान! मैं तो बीच नदी में खड़ा हूँ!”

 

उसने फिर से अपनी आँखें बंद कर ली और बुद्ध के उपदेशों को याद करने लगा। इस तरह से वह चलते-चलते नदी के दूसरे तट पर पहुँच गया। उसके विश्वास ने उसे अपनी मंजिल तक पहुँचने में सहायता की।

 

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