रेगिस्तान में पानी | Ragistan Me Pani | Hindi Kahani

रेगिस्तान में पानी | Ragistan Me Pani | Hindi Kahani

Ragistan Me Pani Hindi Kahani 

 

रेगिस्तान में पानी

बहुत समय पुराणी बात है, बहुत ही विशाल एक रेगिस्तान था, उसे पार करना लगभग नामुमकिन था। केबल विशाल शक्तिशाली पक्षी ही उसे पार कर पाते थे। पैदल चलने वाले जानवरों में उठ ही एक ऐसा जानवर था जो उस रेगिस्तान को पार करने की हिम्मत रखता था।

 

रेगिस्तान की पूरब दिशा पर मंगलवन एक विशाल जंगल था और पश्चिम दिशा पर चंदन वन नाम का एक विशाल जंगल था। दोनों ही जंगल बहुत विशाल और हरे-भरे थे। लेकिन रेगिस्तान की बजह से वह आपस में कभी मिल नहीं पाते थे।

 

 

मंगल वन में एक बूढ़ा कौआ रहता था। वह बहुत समझदार। था उसका नाम चतुरसेन था। जंगल के सभी जानवर उसका बहुत सम्मान करते थे और उससे सलाह लेने उसके पास आया करते थे। कौआ भी ख़ुशी-ख़ुशी उन्हें अपना सुझाव दिया करता था। इसी तरह उसका जीवन बड़े आराम से कट रहा था।

 

एक दिन चतुरसेन पेड़ की शाखा पर बैठे आराम कर रहा था। तभी एक चील उड़ते हुए आई और पास की शाखा पर आकर बैठ गई। वह चील चंदन वन से आई थी। उसने कौए से पूछा, “क्या आप ही चतुरसेन है?” कौआ बोला, “हाँ, मैं ही चतुरसेन हूँ। बताओ क्या बात है?” चील बोला, “मैं चंदन वन से यहाँ आई हूँ।” कौआ चौंककर बोला, “इतनी दूर से, जरूर कोई खास बजह होगी।” चील ने कहा, “आपके दोस्त हिरन ने आपको बुलाया है। वह किसी मुसीबत में है और आपकी मदद चाहता है। मैं उसकी बहुत ही खास दोस्त हूँ इसलिए उसकी मदद के लिए आपके पास आना पड़ा।” कौआ बोला, “अच्छा तो यह बात है। तुम जाओ और हिरन को संदेश देना की वह परेशान न हो, मैं कल ही उससे मिलने आऊंगा। जल्दी ही उसकी समस्या का समाधान हो जाएगा।” चील ने कहा, “ठीक है। लेकिन क्या आप रेगिस्तान को पार कर पाएंगे?” अगर कोई परेशानी हो तो मैं आपके साथ ही चलूंगी।” कौआ बोला, “नहीं नहीं, उसकी कोई जरुरत नहीं। मैंने सैकड़ो बार रेगिस्तान को पार किया है और मेरे दोस्त हिरन से मिलने जा चूका हूँ। तुम मेरी फिक्र न करो। तुम जाकर बस मेरे दोस्त को यह संदेश दे देना।” चील ने कहा, “ठीक है।” यह कहकर चील वहां से चली गई।

 

 

अपनी जवानी के दिनों में चतुरसेन रेगिस्तान पार करके अपने दोस्त हिरन से मिलने जाया करता था। लेकिन अब चतुरसेन बूढ़ा हो गया था इसलिए पिछले कई साल से वह अपने दोस्त हिरन से मिलने नहीं जा सका था। लेकिन फिर भी वह अगले दिन सुबह सुबह तैयार होकर चंदन वन की और निकल पड़ा। कुछ देर तक तो वह आराम से उड़ता रहा लेकिन जैसे जैसे सूरज आसमान में ऊँचा उठता गया चतुरसेन का गर्मी से बुरा हाल हो गया। तेज गर्मी में उसके पंख झुलसने लगे और वह थकने लगा। प्यास से भी उसका बुरा हाल होने लगा। रेगिस्तान में न तो कोई पेड़ था, जहाँ वह कुछ देर आराम कर सके और पानी का तो वहां दूर-दूर तक कोई नामोनिशान नहीं था। चतुरसेन को लगा की वह गर्मी से झुलसकर और प्यास से बेहाल होकर निचे गिर जाएगा। तभी उसे निचे रेगिस्तान में ऊँटो का एक झुण्ड नजर आया। उन्हें देखकर छतिरसेन को कुछ उम्मीद की किरण नजर आई। वह निचे उतर गया और एक ऊंट की पीठ पर बैठकर बोला, “भाई, मैं मंगल वन से आया हूँ और मुझे चंदन वन जाना है। मगर गर्मी और प्यास से मेरा बुरा हाल है। क्या आप मेरी कुछ मदद कर सकते हैं?”

 

ऊंट बहुत दयालु था। वह बोला, “मित्र, आप चिंता न करो। हम उसी और जा रहे है। आप भी हमारे साथ चले। वहां थोड़ी छाया और पानी दोनों मिलेंगी। पानी पीकर और थोड़ा आराम करके आप चंदन वन की ओर जा सकते है।” यह सुनकर कौआ बहुत खुश हुआ। ऊंट के साथ बैठे-बैठे ही वह बहुत दूर तक उनके साथ गया। हरयाली और पानी देखकर उसका ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने भर पेट खाना खाया और पेड़ की छाया में थोड़ा आराम किया। अब उसे चंदन वन जाने के लिए अच्छी खासी ताकत मिल चुकी थी। कौए ने ऊँटो के झुण्ड को धन्यवाद किया और चंदन वन की और उड़ चला। मन ही मन वह बहुत खुश था की उसे ऊंट जैसे नए दोस्त तो मिले ही थे साथ ही साथ उसे रेगिस्तान में  किस जगह पानी है यह भी पता चल गया था जिससे उसका रेगिस्तान का सफर आसान हो गया।  उसने मन में यह निश्चय किया की वह और जानवरों को भी उस जगह के बारे में बताएगा और उनकी मदद करेगा। इस ख़ुशी को लेकर वह चंदन वन की ओर उड़ता चला गया।

 

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