गुरु और शिष्य | Best Motivational Story in Hindi

गुरु और शिष्य | Best Motivational Story in Hindi

गुरु और शिष्य  Best Motivational Story in Hindi

 

गुरु और शिष्य

बहुत पुराने समय की बात है एक गंगा तट पर एक ऋषि का आश्रम था। उनके बहुत से शिष्य थे, जिन्हे वह दुनिया भर का ज्ञान देते थे। कई बिद्याओ की जानकारी देते थे। उनके अनेक शिष्य में से चार शिष्य उनके  प्रिय थे। जब उन चारो की शिक्षा पूरी हो गई तो उन्होंने एक बार उन्हें बुलाकर उनसे उनकी ज्ञान के विषय में जानना चाहा की तुमने कितना ज्ञान प्राप्त कर लिया है।

 

ऋषि ने अपने शिष्य से कहा, “मैंने तुम लोगो को बहुत सी चीजे सिखाई है पर मैं जानना चाहता हूँ की तुम लोगो में से किसने किस विद्या को सबसे ज्यादा पसंद किया और किसके प्रयोग पर तुम्हे सबसे ज्यादा प्रसन्नता हुई है।”

 

 

इस पर उनका पहला शिष्य बोला, “गुरु जी मैंने आपके दुयारा दिए गए शिक्षाओ में सबसे अधिक मंत्र फूंककर आग बुझाने वाली विद्या पर जोर दिया है। वह मुझे अच्छी तरह याद है और मैं इसका कभी भी प्रयोग कर सकता हूँ। बाकि मुझे खास याद नहीं है।”

 

दूसरा शिष्य बोला, “गुरु जी मैंने पानी पर चलने की कला को सिखने और अभ्यास पर ज्यादा जोर दिया है। और अब मैं उस पर माहिर हो गया हूँ। आप कभी भी मेरी परीक्षा ले सकते है।”

 

 

उनका तीसरा शिष्य बोला, “गुरु जी, मैंने तेज आंधी को मंत्र के पल दुयारा शांत करने की कला अच्छी तरह सिख ली है ,मैं इस कला में किसी को भी हरा सकता हूँ।”

 

उनके चौथे शिष्य ने कहा, “गुरु जी, मेरी रूचि इन चीजों में नहीं रही, मैं बस मन को वस में रखने की कला ही ढंग से सिख पाया हूँ। मैंने उसी पर अतिरिक्त मेहनत की है। मुझे लगता है हम लोग मन को नियंत्रण में रखकर ही जीवन को सामन्य रूप से जी सकते है।”

 

 

चौथे शिष्य की बात सुनकर ऋषि बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने उससे कहा, “पुत्र, वास्तब में तुमने ही सभी शिक्षा की जड़ को पकड़ लिया है। किसी भी विद्या में दक्षता हासिल करने के लिए पहले मन की गति को वस में करना आवश्यक है। जिसने मन की गति पर अधिकार कर लिया, समझलो वह सभी तरह की मोक्ष और लोभ को जित लेगा जो उसके जीवन के लिए जरुरी है।

 

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