एक बौद्ध भिक्षु की कहानी | Story of a Buddhist Monk in Hindi

एक बौद्ध भिक्षु की कहानी | Story of a Buddhist Monk in Hindi

 Story of a Buddhist Monk in Hindi

 

एक बौद्ध भिक्षु की कहानी

यह कहानी एक राजा और एक बौद्ध भिक्षु की है। राजा तो बहुत से हुए लेकिन यह बौद्ध भिक्षु सबसे अलग थे। इनका नाम था बौद्ध धर्म।

 

इस कहानी की सुरुवात एक परेशान राजा से होती है। राजा ज्यादातर परेशान ही रहते है। वह राजा अपने मन को शांत करने का बहुत प्रयास करता है पर उसका मन शांत नहीं हो पाता। वह अपने राज्य के बड़े बड़े बिद्वानो को अपने महल में बुलाता है और उनसे उपाय पूछता है। लोग तरह तरह के उपाय राजा को बताते है पर कोई भी उपाय काम नहीं करता।

 

एक दिन, एक ब्यक्ति राजा के पास आता है और कहता है, “आपके मन को शांत करने का एक उपाय है।”  राजा उस ब्यक्ति की बात सुनकर बहुत खुश हो जाता है और उस ब्यक्ति से कहता है, “यदि तुमने ऐसा कर दिया तो मैं तुम्हे उतना धन दूंगा जितना तुम मुझसे मांगोगे।”  वह ब्यक्ति राजा से कहता है, “आपका मन मैं तो शांत नहीं कर सकता पर एक सन्यासी है जो आपका मन शांत कर सकता है। वह कोई आम सन्यासी नहीं, वह एक पहुंचा हुआ सन्यासी है। आप उससे एक बार अबश्य मिले। वह आपकी समस्या का समाधान अबश्य कर देगा।” राजा उस ब्यक्ति से कहते है, “कहाँ मिलेगा मुझे यह सन्यासी?”  वह ब्यक्ति राजा से कहता है, “यहाँ से कुछ दूर जंगल में उसकी एक छोटी सी कुटिया है।”

 

राजा अपने कुछ सैनिको के साथ उस सन्यासी के पास पहुँचता है और बौद्ध धर्म से कहता है, “मैंने सुना है आप बहुत पहुंचे हुए सन्यासी है।”  बौद्ध धर्म राजा को अनदेखा सा कर देते है। राजा सोचता है की सायद बौद्ध धर्म ने मुझे सुना नहीं। राजा फिर कहता है, “मैंने सुना है आप बहुत पहुंचे हुए सन्यासी है। क्या आप मेरे समस्या का समाधान कर सकते है।”

 

 

बौद्ध धर्म राजा का कोई भी प्रश्न का उत्तर नहीं देता। राजा मन ही मन सोचता है की बौद्ध धर्म उसे कोई उत्तर क्यों नहीं दे रहे है? राजा मुद्दे की बात पर आता है। राजा बौद्ध धर्म से पूछता है, “क्या आप मेरे मन को शांत कर सकते है?”  बौद्ध धर्म मुस्कुराते है और राजा से पूछता है, “तुम्हारा मन अशांत क्यों है?”  राजा कहता है, “वैसे तो मेरे पास कोई भी चीज़ की कमी नहीं है। धन मेरे पास इतना है जिसका मुझे खुद अंदाजा नहीं। सभी सुख सुबिधाए है। लोगो के मन में मेरे लिए आदर है। मैंने बहुत सारे दान-पुण्य भी किये है, पर बस एक चीज़ की कमी है मेरे अंदर। मेरा मन अशांत रहता है। यदि यह कभी कभी शांत हो भी जाता है तो यह फिरसे अशांत हो जाता है। क्या आप मेरे मन को शांत कर सकते है? मैं बड़ी आशा लेकर आपके पास आया हूँ। बाकि तो मैंने सब उपाय कर लिए है बस आप ही मेरी अंतिम आशा हो। ”

 

बौद्ध धर्म उस राजा से कहते है, “बिलकुल, मैं तुम्हारे मन को शांत कर सकता हूँ।”  राजा बहुत खुश होता है। राजा कहता है, “उसके लिए मुझे क्या करना होगा?”   बौद्ध धर्म मुस्कुराते है और कहते है, “कल सुबह तुम मेरे पास आना, पर धियान रहे की अकेले आना।” राजा कहता है, “ठीक है मैं कल सुबह आपके पास आ जाऊँगा।” बौद्ध धर्म कहते है, “पर एक बात और धियान रहे अपने अशांत मन को अपने साथ लाना।”  राजा सुनकर चौकता है और सोचता है यह कैसी बात कही बौद्ध धर्म ने? राजा कहता है, “अपने क्या कहा? कृपा करके एक बार और बताएँगे?   बौद्ध धर्म राजा से कहते है, “तुम कल सुबह जल्दी आना और अपने अशांत मन को साथ लेकर आना। कही ऐसा न हो की तुम उसे अपने महल में ही छोड़ आओ।”

 

राजा सोचता है की यह ब्यक्ति कोई पागल तो नहीं। पर क्युकी अब राजा के पास कोई बिकल्प भी नहीं है इसलिए वह सोचता है की एक बार परियास कर ही लेना चाहिए।

 

अगले दिन, राजा अकेला सुबह सुबह  बौद्ध धर्म के पास पहुँचता है और कहता है, “मैं आ गया।”  बौद्ध धर्म उस राजा से कहते है, “तुम तो आ गए ठीक है, लेकिन तुम्हारा अशांत मन कहाँ है? लाओ उसे मुझे दे दो। मैं उसे अभी शांत करके तुम्हे देता हूँ।” राजा कहता है, “आप यह कैसी बात कर रहे है? आप इतने पहुंचे हुए सन्यासी होकर यह भी नहीं जानते की मन कोई ऐसी बस्तु नहीं जिसे मैं उठाकर आपको दे दूँ। मन तो मेरे भीतर है।”  बौद्ध धर्म उस राजा से कहते है, “ठीक है बैठ जाओ और अपनी आंखे बंध करके उस अशांत मन को अपने भीतर खोजो।”

 

 

राजा अपनी आंखे बंध करके उस अशांत मन को अपने भीतर खोजने का परियास करता है। बहुत देर आंख बंध करके बैठे रहने के बाद बौद्ध धर्म राजा के कंधे पर हाथ रखते है और कहते है, “आंख खोलो।” राजा अपनी आंखे खोलता है। बौद्ध धर्म उस राजा से पूछते है, “क्या तुम्हे तुम्हारा अशांत मन मिला?” राजा कहता है, “नहीं।”  बौद्ध धर्म राजा से कहते है, “कोई बात नहीं अब तुम कल परियास करना। आज के लिए इतनी खोज पर्याप्त थी।” राजा अपने महल चला जाता है।

 

अगले दिन सुबह, राजा फिर बौद्ध धर्म के पास आता है। और वैसा ही करता है जैसे कल बौद्ध धर्म ने बताया था। राजा बैठ जाता है और अपनी आंखे बंध कर लेता है। और अपने उस अशांत मन को अपने भीतर ढूंढने का परियास करता है। बहुत देर तक राजा बैठा रहा। बौद्ध धर्म फिरसे राजा के कंधे पर हाथ रखते है और कहते है, “क्या तुम्हे तुम्हारा अशांत मन मिला?” राजा बड़ी शांत आवाज में बौद्ध धर्म से कहता है, “नहीं।” बौद्ध धर्म राजा से कहते है, “कोई बात नहीं, आज के लिए इतना ही पर्याप्त है। अब तुम कल आना।”

 

अगले दिन सुबह, राजा फिर बौद्ध धर्म के पास आया। और वैसा ही करता है जैसे पुरे दो दिन से कर रहा था। राजा बैठता है और अपनी आंखे बंध करता है। और अपने उस अशांत मन को ढूंढने का परियास करता है। इस बार बौद्ध धर्म राजा के कंधे पर हाथ रख कर उसकी आंखे नहीं खुलवाते। राजा बस अपनी आँखों को बंध करके बैठा रहता है। काफी समय बीत जाता है। बौद्ध धर्म राजा के पास ही बैठे रहते है। पूरा दिन बीत जाता है, पूरी रात बीत जाती है पर राजा आंखे बंध करके अपने उस अशांत मन को ढूंढ रहा होता है।

 

अगले दिन सुबह, राजा की आंखे खुलती है। और जैसे ही राजा की आंखे खुलती है राजा अपने सिर को बौद्ध धर्म के चरणों में रख देता है और कहता है, “मुझे मेरा अशांत मन तो कही नहीं मिला पर वह शांति जरूर मिल गई, जिसकी तलाश में मैं अब तक भटक रहा था।

 

 

उस राजा की तरह आप भी अपनी मन की शांति को कही बाहर खोज रहे है। वह शांति कही बाहर नहीं, वह शांति आपके भीतर ही है। बस आपको जरुरत है उसे भीतर खोजने की।

 

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