भारत की आजादी की कहानी | The Story of India’s Independence in Hindi

 The Story of India’s Independence in Hindi

 

भारत की आजादी की कहानी

 आज हम बात करेंगे हमारे भारत की आजादी की कहानी के बारे में की किस तरह हमारा यह देश अंग्रजो की गुलामी से आजाद हुए थे।
तो दोस्तों चलिए जानते है भारत के आजादी की / Story of India’s Independence in Hindi के पूरी कहानी के बारे में।
सत्रहबी सदी के शुरू से ही अंग्रेज भारत पर आने लग गए थे। तब भारत पर मुघल का राज चलता था जो अठारहवीं सदी से कम होने लगा। यह अंग्रेज वैसे तो यहाँ बाणिज्य करने आए थे पर उनके इरादे कुछ और ही थे। बाणिज्य के नाम पर यहाँ के अपर सम्पत्तियों को हड़पना ही उनका प्रधान लक्ष था। वह लोग भारत पर अपना अधिकार बनाना चाहते थे। पलासी और बक्सर के जंग पर जित हासिल करने के बाद भारत पर उनका शासन प्रतिष्ठित हो गया। शुरू हो गया इस्ट इंडिया कंपनी का शासन।
यहाँ के लोगों का सर्वनाश करके वह फल फूल रहे थे। अत्याचार-अनाचार बढ़ता ही गया। अगर किसी जमीन का उत्तराधिकार नहीं होता तो वह जमीन इस्ट इंडिया कंपनी के नाम पर हो जाता था। कभी कबार छोटा मोटा विरोध होता था। पर वह तीन-चार लोगों में ही सीमित रहता था। सिपाहीओं के लिए वह एक नया कारतूस लाए थे जो गाय और सूयर के चर्बी से बनता था। और उसको दांत से काटकर बंदूक में भरना पड़ता था। इस कार्य से उनके धर्म को आघात करके इसराइल धर्म को फैलाना ही उनका लक्ष था।
इस तरह सिपाहियों के मूल विश्वास के उपेक्षा भारतवासी सह नहीं पा रहे थे। पर विरोध करने का किसी में साहस भी नहीं था। तब मंगल पांडे (1827-1857) नाम का एक सिपाही को उनके सामने लाया गया और उनके प्रतिशोध के आग को नेतृत्व दिया। शुरू हुआ 1857 का सिपाही विद्रोह जो पुरे देश में फेल गया। पर वह नाकामियाब रहे। और मंगल पांडे को फांसी दे दिया गया। उसके बाद सन 1885 में जन्म हुआ इंडियन नेशनल कांग्रेस पार्टी (Indian National Congress Party) का जिससे भारत के आजादी में नई उजाल आई।
उन दिनों बंगाल पर राष्ट्रबाद की भाबना तेजी से बढ़ रही थी। बंदेमातरम की धुन में शिक्षित बंगाली युवाओं ने अंग्रजो के खिलाफ आवाज उठाने लगी। बंगाल में ब्रिटिश विरोधी भाबनाओ को बढ़ते हुए देखकर लार्ड कर्ज़ों (Lord Curzon) ने बंगलीभाषी लोगों को बिभाजित करने का निर्णय लिया। बड़े चालाकी से उन्होंने बंगलीभाषी संप्रदाय को अलग कर दिया। शुरू हुआ बंगभंग आंदोलन। बंगाल से आने लगे खुदीराम बोस (1889-1908), प्रफुल्ल चाकी, विनय-बादल-दिनेश कैसे युवा विप्लवी जिन्होंने अंग्रजो के खिलाफ हतियार उठाकर हँसते हुए देश के लिए अपनी प्राण त्याग दिए। वह बंगाल का अग्नियुग कहलाने लगा। इसके फलस्वरूप अंग्रजो ने 1911 पर भारत की राजधानी कलकत्ता से हटाकर दिल्ली कर दिया। पर संग्राम नहीं रुका।
इस बीच 1914 में प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) आरम्भ हुआ। सन 1915 दक्षिण अफ्रीका से वापस आए मोहनदास करमचाँद गाँधी जिन्हे हम पुरे भारतवासी महात्मा गाँधी के नाम से जानते है उन्होंने भारत के आजादी को अपना लक्ष धारण कर लिया। सन 1919 में बढ़ता हुआ विरोध को काबू करने के लिए ब्रिटिश जर्ज सिडनी रौलट (Sydney Rawlatt) ने एक कानून पास किया जिसके चलते पुलिस बिना बोले किसी को भी गिरफ्तार कर सकता था। लिखने-पढ़ने का भी आजादी छीन लिया गया। फलस्वरूप पुरे भारत पर शुरू हुआ नया आंदोलन जिसका नाम था रौलट सत्याग्रह। रेगीनाल्ड एडवर्ड (Reginald Edward) ने पंजाब के हर एक बैठक पर प्रतिबंध लगा दिया। यहाँ तक की चार लोगों का एक साथ खड़ा होना भी अपराध था।
13 अप्रैल अमृतसर के जालिवान वाले बाग पर लोग इखट्टे हुए थे। मुख्य सीख त्योहार वैशाखी मनाने। रेगीनाल्ड एडवर्ड ने उस भीड़ पर गोलियां चलाने की आदेश दे दी। वहाँ के सारे दुआर बंध करके 10 मिनट तक निर्मम हत्याकांड चला। लगभग 1500 मासूम जनता घायल हुए। और हजारों मारे गए। उनकी यह क्रूरता पुरे देश में फेल गई। रबीन्द्रनाथ ठाकुर (Rabindranath Tagore) ने प्रतिबाद में अपना ब्रिटिश नाईट उपाधि छोड़ने का फैसला किया। इस घटना ने हर एक भारतवासी को आजादी के लिए लड़ने को प्रेरित किया। भारतीय जातीय कांग्रेस (Indian Ethnic Congress) ने असहजोग आंदोलन का फैसला किया।
 सन 1922 में उत्तेजित जनता ने चौरी चौरा नामक पुलिस स्टेशन पर आग लगा दी। जिसके दौरान 23 भारतीय थानेदार और मारे गए। इसलिए अहिंसा के पुजारी गांधीजी ने असहजोग आंदोलन को स्तगित करने पर मजबूर हुए। पर तब तक भारत के प्रतिघात की बारी आ गई थी। सन 1925 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन असोसिएशन (Hindustan Republican Association) के प्रतिनिधियों ने काकोरी नाम के एक जगह पर ट्रैन रोककर अंग्रेजो से पैसा लूटने का षड़यंत्र किया  जिसे हम काकोरी ट्रैन कांस्पीरेसी (Kakori Tran Conspirac) के नाम से जानते है। संगठन के हतियार खरीदने के लिए पैसो की जरुरत होती थी। पर उन्होंने ट्रैन में एक भी भारतीय को नहीं लुटा।
सन 1927 में भारत की संविधान एक सुलजाभ के लिए ब्रिटिश सरकार ने जॉन साइमन (John Simon) के नेतृत्व में एक दल भेजा जिसपर कोई भी भारतीय नहीं था। उनको प्रतिरोध और काले झंडे से स्वागत किया गया था। लाहौर में असेही एक Go Back Simon के आंदोलन पर नेतृव दे रहे थे लाला लाजपत राय, जो बहुत युवाओं काप्रेरणा थे। पुलिस के लाठी चार्च पे उनका देहांत हो गया। उनका बदला लेने के लिए युवा भगत सिंह और राजगुरु निकल पड़े थे।
The Story of India's Independence in Hindi
उस समय भगत सिंह अंग्रेजो की बहुत बड़ी परेशानी का सबक बन चुके थे। उन्होंने बटुकेश्वर दत्त के साथ केंद्रीय विधानसभा पर बम गिराया था। उनके आत्मसमर्पण के बाद उन्हें फांसी पर चढ़ाया गया। सन 1929 पर कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज का फैसला किया। 31 दिसम्बर नेहरूजी ने लाहौर पर तिरंगा उड़ाया। 26 जनुअरी 1930 पर पहला स्वतंत्र दिवस मनाया गया। पर वह ब्रिटिश सरकार नहीं माने। उसके बाद कांग्रेस के कार्य समिति साबरमती पर एकत्रित हुए। और आइन अमान्य आंदोलन का आह्वान किया, जिसकी सुरुवात गांधी जी ने दांडी अभिजान से किए। असहायक आंदोलन के असमाप्त काम आइन अमान्य आंदोलन कर रहा था, जिसमें पूरा देश शामिल हो गया। एक हरताल पुरे देश को रोक देने लगा। सारे स्कूल, कॉलेज, ऑफिस बहिष्कार करने लगे, विदेशी चीजे सड़क पर जला देने लगी, टैक्स भरना भी बंध कर दिया।
इसके बाद दूसरा गोल टेबल बैठक पर गांधीजी को बुलाया गया। पर लंडन से वापस आते ही उन्होंने आइन अमान्य आंदोलन को जारी रखने का फैसला किया। ब्रिटिश सरकार ने कॉग्रेस को अब्याहित घोषित किया और 4 जनुअरी 1932 को गांधीजी को बिना मुकदमे के गिरफ्तार कर लिया। वहाँ पर गांधीजी ने उपवास करने का फैसला किया जो उन्होंने पूनासंधि के बाद भंग किया। 1933 के मई पर गांधीजी जेल से बाहर आए और शुरू हुआ सत्याग्रह आंदोलन (1933) का। सन 1935 पर पास हुआ The government Act of India जिसके चलते भारत में इलेक्शन शुरू हो गए।
The Story of India's Independence in Hindi
 इसके बाद भारत पर आगमन हुआ नेताजी सुभाष चंद्र बोस (Netaji Subhash Chandra Bos) का। वह समझ गए थे की आजादी के लिए भारतीय को जंग पर लड़ना पड़ेगा। खून बहाना पड़ेगा। वह 1938 पर हरिपुरा कांग्रेस के सभापति बने, जो गांधीजी के इच्छा के विरुद्ध था। 1939 पर भी कांग्रेस के सभापति निर्वाचित होने के बाबजूद वह इस्तफ़ा दे दिए। और प्रसिद्ध फॉरवर्ड ब्लॉक (1939) का प्रतिष्ठा किया।
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द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-1945) शुरू होने पर अंग्रेजो के युद्धनीति के विरोध कांग्रेस नेता अपने पद से इस्तफ़ा दे दिया। उस समय सुभाष चंद्र बोस को अपने घर से गिरफ्तार कर लिया गया। पर वह बड़े चालाकी से बच निकले और जापान पहुँच गए। नाम बदलकर, अलग दिखकर वह कैसे भी बर्लिंग पहुँचे। वहाँ हिटलर ने उनको सहायता करने से मना कर दिया। पर वह जापान पहुँचे। वहाँ राजविहारी बसु के साथ मिलकर वह जंग में पकड़े गए ब्रिटिश की भारीतय सेनाओ को लेकर बनाया आजाद हिन्द फौज। जो बाद में ब्रिटिश सरकार के डर का कारन बन गया। सामने से नेतृत्व देने वाला नेताजी “दिल्ली चलो” का एलान किया। पर विश्वयुद्ध में जापान का परास्त होने के दौरान आजाद हिन्द फौज कमजोर पड़ गया। इनके रोमांचक कहानी ने सारे भारत को प्रेरित किया।
सन 1942 पर गांधीजी “भारत छोड़ आंदोलन” का शुरू किया। और 9 अगस्त को उन्हें फिरसे गिरफ्तार किया गया। लेकिन इस बार भारत नहीं रुका। आजादी का ख्वाब सबको लड़ने का बल दिया। अब उन्हें कोई भी नहीं रोक सकता था। आंदोलन, भाषण अब नियमित बन चूका था। गिरफ्तार होने का और मरने का डर मिट चूका था। स्वाधीनता अब बहुत पास आ रहा था। पर इस बीच महम्मद अली जिन्नाह (MD Ali Jinnah) ने 1946 पर एक नए देश का भाबना प्रस्ताबित किया। वह एक मुस्लिम देश चाहते थे जहाँ सिर्फ मुलिम रह सके। पर यह कोंग्रस के ज्यादातर नेताओ ने नकार दिया। पर जिन्नाह नहीं माने। शुरू हो गया दो सम्प्रदाय का दरार। दोनों संप्रदाय आपस में लड़ने लगे। दोनों एक दूसरे का सबसे बड़ा दुसमन बन गए। पपुरे भारत पर दंगे छा गए। स्वतंत्रा तो तेइ था पर कोई नया मुसीबत आ गया था।
14 अगस्त सबके सहमति से मुश्किल से मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान का जन्म हुआ। और 15 अगस्त मध्य रात को हमारे भारत ने स्वतंत्रा हासिल किया। पुरे देश में ख़ुशी का माहौल तो छा गया था पर विभाजन के दौरान बहुत से मासूमो का घर उजड़ गया। उनके परिजन मारे गए। आजादी के इतने साल बाद आज भी यह दुश्मनी ताजा है। लोगों के घाव ताजे है। अंग्रेज तो चले गए पर हमें आपस में लड़ा गए। ऐसी आजादी की मांग सायद खुदीराम, भगत सिंह, राजगुरु ने नहीं किए थे।
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