The Real Story of Pyramid in Hindi

पिरामिड की असली कहानी | The Real Story of Pyramid in Hindi

The Real Story of The Pyramid in Hindi

पिरामिड की असली कहानी

दुनिया का इतिहास जितना विस्तृत और व्यापक है उससे कई ज्यादा रोमांचक और रहस्मय भी है। समय समय पर इन रहस्य पर पर्दा उठाने की कोशिश की जा रही है। लेकिन यह कोशिशे किस हद तक सफल हो पाई है, यह बात हमेशा से एक बड़ा सवाल  रही है। कई बार इतिहास के कुछ रहस्य किताबों और खोज की दुनिया से निकल कर हमारी दुनिया में आ खड़ी होती है। एक ऐसाही अनसुलझा रहस्य है मिस्र के पिरामिड। 

(अद्भुत ईमारत)

आधुनिक जगत को अपनी टेक्नोलॉजी, नई खोज और आसमान को चूमती कई इमारतों पर नाज है और होना भी चाहिए। पर इसका यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए की पुराने समय में किसी को इस बिद्या की जानकारी नहीं थी। बल्कि सच तो यह है की पुरातन काल में वैज्ञान और तकनीक की एक बिशिष्ट धारा थी। जिसमे न केबल बस्तुओ का आश्चर्यजनक ढंग से बदलाब होता था, बल्कि उसके साथ मानब शरीर और प्रेयबन जैसी कई कड़िया जुड़ी होती थी। यह ऐसा बैज्ञान था जिसकी दिशाधारा को अब तक न समझा सका।

(पिरामिड में शव के कब्र)

प्राचीन मिस्र में मनुष्य को जलाने की प्रथा नहीं थी। वहां मानब शब् को मसाला भरकर कब्र में सुरक्षित रखने का रिवाज था। वह हजारों बर्षो तक सुरक्षित रह सकते थे। वहां के इंसान मानते थे की जीबन मरने के बाद भी चलता रहता है। इंसान मरकर  भी जिन्दा रहता है। उनके शबो के साथ खाने पिने की चीजे, कपडे, गहने, बर्तन, हथियार और कभी कभी तो सेबक सबिकाओ को भी दफना दिया जाता था। मिस्र के पिरामिड वहां के तत्कालीन सम्राटों के लिए बनाये गए स्मारक स्थल है। जन्मे राजाओं के शबो को दफनाकर सुरक्षित रखा जाता था। प्राचीन मिस्रबासियों का मानना था की उनका राजा किसी देवता का बंसज है। इसलिए वह उसे उसी रूप में पूजना चाहते थे। मौत के बाद राजा दूसरी दुनिया में अन्य देवताओं से जा मिलता है। इस धारणा के चलते राजा का मकबरा बनाया जाता था। यह मकबरा त्रिभुजाकार होता था और यह पिरामिड चट्टान काट कर बनाये जाते थे। 

(ग्रेट पिरामिड खुफु)

यु तो मिस्र में 138 पिरामिड है, पर काहिरा का उपनगर गीजा में  सिर्फ गीजा का ग्रेट पिरामिड ही प्राचीन सात अजूबो की लिस्ट में है। मिस्र की अधिकतर पिरामिड एक ही तरीके से बनाये गए है। लेकिन इन सब के बीच गीजा की पिरामिड की संरचना थोड़ी अलग है। और अपने अंदर कई रहस्य समेटे हुए है। मिस्र का यह ग्रेट पिरामिड मिस्र के राजा खुफु की कब्र है, जिसका निर्माण आज से करीब 4500 साल पहले किया गया था। यह पिरामिड 450 फिट ऊँचा है। और इसका आधार 13 एकर में फैला है। यह 25 लाख चुना पत्थरो के खंड से बना है, जिनमे से हर एक का वजन 2-30 टन के बीच है। 

(पिरामिड का आकार)

पिरामिड की झुकी त्रिकोण दीवारे जमीन से बावन इंच का कोण बनाती है। कमरे इस कुशलता से बने थे की अंदर जाने का कोई रास्ता नहीं था। पिरामिड को बनाने में करीब 23 साल लग गए। ग्रेट पिरामिड को इतनी परिसिद्धातो से बनाया गया है की बरतम तकनीक भी ऐसी इंजीनियरिंग को दोहरा नहीं सकती। मिस्र के इस महँ पिरामिड को लेकर अक्सर सवाल उठाये जाते रहे की बिना मशीनो के और बिना औजारों के मिस्रबासियों ने कैसे इतने बड़े पत्थरो को 450 फिट ऊंचाई पर पहुंचाया होगा। और कैसे इस बिशाल परियोजना को मात्र 23 सालो में पूरा किया होगा। त्रिकोण आकार में बनाए गए पिरामिड के संरचना का सबसे मुख्या हिस्सा उसका उपरिभाग होता है, जिसे सबसे बाद में बनाया जाता है। यह उपरिभाग जिसे कैपिस्टोन कहा जाता है इतना खास होता है जिसे सोने और बेस कीमती पत्थर से बनाया जाता है। लेकिन ऐसा क्या हुआ जो मिस्र के ग्रेट पिरामिड के ऊपर कैपिस्टोन है ही नहीं। क्या ग्रेट पिरामिड को हमेशा ही बिना कैपिस्टोन के रखा गया था? या फिर बहुमूल्य पत्थर होने की बजह से इसे लूट लिया गया? 

(पिरामिड के बहुमूल्य पत्थर)

इतिहासकार यह मानने से इंकार करते है की ग्रेट पिरामिड के कैपिस्टोन को चुराया गया था। अगर ऐसा है तो वाकई इतना महत्वपूर्ण पिरामिड होने के बाबजूद इसे सोने या फिर दूसरे बहुमूल्य पत्थर से फिरसे क्यों नहीं ढका गया। या फिर ग्रेट पिरामिड को अधूरा ही छोड़ दिया गया था। इन सभी सवालों के बाबजूद कई ऐसे सवाल है जिनका सही सही जवाब आज तक कोई नहीं दे पाया। हजारों सालो से प्राकृतिक थपेड़ो को सहने के बाद भी पिरामिड की संरचना में कोई अंतर नहीं आया है। पिरामिड को देखकर यह आश्चर्य होता है की किन महाबली पुरषों ने इन बिशाल चट्टानों को उठाया होगा। किन बिशेषगों ने इनकी अद्भुत जमीकी प्रक्रिया में पसीना बहाया होगा। सवाल तो बहुत है लेकिन इन सवालो का पूर्ण जवाब किसी के पास नहीं है। पिरामिड बनाना आसान नहीं था। मिस्र वासियों को इस कला में माहिर होने में काफी वक़्त लग गया। बिशाल योजना बनाकर नील नदी को पार कर बड़े बड़े पत्थर लाने पड़ते थे। पिरामिड बनाने में काफी मजदूरों की जरुरत होती थी। पत्थर काटने वाले कारीगर भी अपने कला में माहिर होते थे। बिशाल श्रमशक्ति के अलावा क्या प्राचीन मिस्र बासियों को गणित का ज्ञान रहा होगा? बिशेषज्ञो के अनुसार पिरामिड के बहरी पत्थरो को इतनी कुशलता से तराशा और फिट किया गया है की पिरामिड के चारों और किसी भी तरफ से इसके अंदर नहीं घुसा जा सकता। 

(रानी नेफरतिती का मकबरा)

मिस्र का एक और रहस्य रानी नेफेरटीटी से जुड़ा है, जिसकी ममी को कई सालों से इतिहासकार और पुरातत्यबिद खोजने में लगे है। यह लापता ममी मिस्र की उस खूबसूरत रानी की है जिसकी मूर्ति तो जर्मन पुरातत्यबिद ने 1912 में खोज ली थी। लेकिन उसकी ममी आज तक किसी को नहीं मिल पाई। रानी नेफेरटीटी की मौत 1340 में हुई थी। उसकी ख़ूबसूरती का जिक्र प्राचीन मिस्र से जुड़ी कथाओं में मिलता है। उसकी ख़ूबसूरती ने ही उसे सम्राटों की चहेती रानी बनाया था। लेकिन इसके बाबजूद भी नेफेरटीटी का मकबरा क्यों नहीं मिल पाया इस सवाल ने हमेशा से सोदकर्ताओं को उलझाकर रखा। 

(सम्राट तूतनखामेन का मकबरा)

वैसे तो मिस्र सभ्यता अपने आप में ही एक रहस्य है। लेकिन जितनी जिज्ञासा और दिलचस्बी सम्राट तूतनखामेन के मकबरे को लेकर देखि जा सकती है वह किसी और के लिए नहीं दिखती।जब सम्राट के मकबरे को तलाश किया गया था तो उसके ममी के पास से सोना, चांदी और बहुमूल्य रत्नों से जुड़े आभूषण पाए गए थे और उसका चेहरा सोने के मास्क से ढका हुआ था। रिसर्च से जाना जाता है की तूतनखामेन मात्रा 9 साल की उम्र में सम्राट बना था और 19 साल की उम्र में उनकी मौत हो गई। तूतनखामेन की मौत मैलेरिया बजह से हुई थी। तुतनखामुन का मकबरे के पास दो गुप्त दरवाजे पाए गए है, जिसमे से एक गोडाउन की ओर जाता है और  दूसरा रानी नेफेरटीटी का मकबरा है। 

(तूतनखामेन का श्राप)

कहा जाता है की तूतनखामेन के मकबरे की खुदाई करने वाली इतिहासकारों की टीम तूतनखामेन श्राप का शिकार हो गई। 1922 में तूतनखामेन की मकबरे में जाने वाले सबसे पहले थे पुरातत्यबिद हॉवर्ड कार्टर और लार्ड कर्णेवार। दुनिआ भर के मीडिया में उसी वक़्त से तूतनखामेन के श्राप की चर्चा होने लगी। और इसे मजबूती तब मिल गई जब 5 अप्रैल 1923 को काइरो में लार्ड कर्णेवार की मौत हो गई। 1923 को ही लार्ड कर्णेवार की सौतेले भाई की मौत हो गई। 1923 में ही मकबरे की खोज के लिए पैसा देने वाले उस आदमी की लाश नदी में मिली। कूल मिलाकर इस प्रोजेक्ट से जुड़ी 11 मौतो के पीछे तूतनखामेन के श्राप को जिमेदार बताया जाता है। हालाकि बहुत से लोग इसे सिर्फ अंधबिस्वास मानते है। लेकिन 1986 में फ़्रांसिसी रिसर्चर कैरोलिन स्टेन्डफ्लिप ने इसका एक बैज्ञानिक कारन देने की कोशिश की। कैरोलिना ने अपनी खोज में पाया की प्राचीन काल में जिस लेप से तूतनखामेन की कब्र को सील करने के लिए जिन चीजों का इस्तिमाल किया गया वह वक़्त के साथ सड़ चुके थे। उनमे बीमारी फैलाने वाले फंगस पैदा हो गए थे। और सायद यही कारन है की तूतनखामेन की मकबरे में प्रबेश करने वाले बहुत से लोगो की मौत जानलेबा बीमारी से हुई। लेकिन खुद हॉवर्ड कार्टर 60 साल से भी ज्यादा उम्र तक जीते रहे। 

जो भी हो पिरामिड का रहस्य शायद हमारे बीच एक रहस्य ही रहेगा। सालों से बैज्ञानिक इन पिरामिड का रहस्य जानने की कोशिश में लगे हुए है लेकिन अभी तक कोई सफलता नहीं मिली है। मिस्र का पिरामिड अपने आप में ही एक ऐसी पहली है जिसकी हर परख को खोल पाना किसी के लिए संभब नहीं है। 

 

तो दोस्तों आपको पिरामिड की यह रहस्मयी कहानी “पिरामिड की असली कहानी | The Real Story of Pyramid in Hindi” कैसी लगी निचे कमेंट करके जरूर बताए और अगर आप इसी तरह के कई रहस्मय कहानियों के बारे में जानना चाहते है तो फिर इस ब्लॉग को सब्सक्राइब करें। 

 

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