उदार दाता | Hindi Story Of Generous Donor

Hindi Story Of Generous Donor

 

उदार दाता

बहुत समय पहले की बात है, जतुत्तरा शहर पर संजय नामक राजा था। गर्भवती रानी का प्रमुख काल निकट ही था। उन्होंने राजा से शहर में घूमने जाने का अनुरोध किया। राजा की आज्ञा पर पुरे शहर को सजाया गया। रानी सजे हुए रथ पर बैठकर शहर में घूमने निकली। वैश्यों की गली से जन्म लेने के कारण पुत्र का नाम विशांत्र रखा गया। 
राजकुमार विशांत्र बचपन से ही अत्यंत धार्मिक प्रकृति के थे तथा बहुत कम उम्र से ही उन्होंने दान देना प्रारम्भ कर दिया था। उनके यौवनावस्था में प्रवेश करने पर उनका विवाह राजकुमारी माद्री से कर दिया गया। उनकी दो संतान हुई। पुत्र का नाम जाली तथा पुत्री का नाम कृष्नार्जिन रखा गया। 
उसी समय पड़ोसी राज्य कलिंग में भीषण सूखा पड़ा। वहाँ के लोगों ने अपने राजा से प्रार्थना करी, “महाराज, जतुत्तरा शहर में महाराज संजय का पुत्र विशांत्र रहता है। वह महान दाता है। उसके पास एक सफेद हाथी है। वह मंगलदायक हाथी जहाँ भी रहता है बारिश होती है। आप उसे यहाँ लाने का प्रयत्न करें।”
कलिंग के राजा ने अपने आठ ब्राह्मणों को हाथी लाने के लिए जतुत्तरा भेजा। ब्राह्मणों ने वहाँ पहुंचकर राजकुमार विशांत्र को अपने दानघर के पास मंगलदायक सफेद हाथी पर बैठकर आते देखा। उन्होंने राजकुमार से हाथी की याचना करी।
राजकुमार विशांत्र ने प्रसन्नतापूर्वक अपना सजा हुआ हाथी दान में दे दिया। उनके इस कृत्य से जतुत्तरा के लोग अप्रसन्न हो गए। उन्होंने अपने राजा से जाकर कहा, “महाराज, हमारा राज्य बर्बाद हो जाएगा। राजकुमार विशांत्र ने वह मंगलदायक हाथी जो हमारे लिए मंगलसूचक था उसे क्यों दे दिया? उनका यहाँ रहना उचित नहीं है।”
उग्र जनता के कारण विवश होकर राजकुमार विशांत्र ने कोई शिकायत नहीं की। उसने कहा, “मुझे दान देना अच्छा लगता है। यदि राज्य की सम्पूर्ण जनता मिलकर भी मुझे मार डाले या मेरे टुकड़े कर दे फिर भी मुझे दान देने से कोई भी नहीं रोक पाएंगे।”
राजकुमार ने अपने माता-पिता को जाकर प्रणाम  कर आशीर्वाद लिया और कहा, “कृपया मुझे देश छोड़ने की अनुमति दे। मंगलदायक हाथी को देने से मेरे कारण आपको दुःख हुआ है पर मुझे कलिंग के लोगों को दान देने का कोई दुःख नहीं है।”
राजा ने राजकुमार को जाने  की अनुमति दे दी और अपनी पुत्रबधु माद्री के बच्चों के साथ महल महल में रुकने के लिए कहा, “मैं अपने पति के बिना नहीं रह सकती। मैं बन में जाकर सारे कष्ट  सह लुंगी। मैं बच्चों को भी साथ ही ले जाऊँगी। जैसे हम लोग रहेंगे उसी प्रकार वह भी वहीं रहेंगे।”
राजकुमार विशांत्र अपनी पत्नी और दोनों बच्चों के साथ चार घोड़े वाले रथ पर सवार होकर वन में वंक पर्वत के लिए चल पड़े। पीछे से कुछ ब्राह्मणों को आते देख विशांत्र ने रथ रोका। ब्राह्मणों ने राजकुमार से उसका घोड़ा माँग लिया। विशांत्र ने अपने चारों घोड़े उन्हें दे दिया। अब राजकुमार विशांत्र  पैदल ही सपरिवार चलने लगे। 
रास्ते में वे चेटी में मातुल नामक शहर में रुके। वहाँ के लोगों ने बड़ी ही गर्मजोशी से उनका अभिनन्दन किया। उन्होंने वंक पर्वत जाने का रास्ता भी बताया। इन्द्रदेव ने वहाँ उनके रहने के लिए दो कुटी भी बनवा दी थी। वहाँ बने चौकोर तालाब के किनारे विशांत्र ने थोड़ी देर बिश्राम किया। फिर उन्होंने अपने राजसी वस्त्र उतारकर साधुओं का वस्त्र धारण किया। वंक पर्वत पर बनी कुटी में चारों रहने लगे। प्रतिदिन सुबह माद्री उठती थी और वन से फल तथा जड़ी बूटी लाती थी। फिर चारों साथ-साथ भोजन करते थे। इसी प्रकार सात महीने वंक पर्वत पर व्यतीत हो गए। 
संयोगवश उस समय कलिंग के एक गांव में पूजाक नामक एक बृद्ध ब्राह्मण अपनी जवान पत्नी के साथ रहता था। एक दिन पत्नी ने पति से कहा, “अब मैं आपके साथ तभी रहूंगी जब आप मेरे लिए एक सेवक नियुक्त करेंगे।”
ब्राह्मण ने उत्तर दिया, “प्रिय! मैं एक दिन व्यक्ति हूँ। मैं तुम्हारे लिए एक सेवक कैसे नियुक्त कर सकता हूँ?”
उसकी पत्नी राजकुमार विशांत्र से जाकर सेवक की याचना करने की सलाह देते हुए बोली, “विशांत्र महान दाता है। वह निचित रूप से तुम्हें सेवक प्रदान करेगा।”
बृद्ध ब्राह्मण अपनी पत्नी के आग्रह को अस्वीकार न कर सका। वह जतुत्तरा पहुँचा। वहाँ उसे राजकुमार के निर्वासन तथा वंक पर्वत पर उसके रहने की बात पता चली। ब्राह्मण चलते चलते वंक पर्वत पहुँचा। दो पहर हो चुकी थी। पास के एक चट्टान पर उसने रात बिताई। 
उसी रात माद्री ने एक दुःस्वप्न देखा। उसने देखा की एक कला व्यक्ति केसरिया कपड़ो में है। दोनों कानों में लाल फूल हैं। अपने हाथों में भुजाएँ लिए हुए उस डरावने व्यक्ति ने कुटिया में प्रवेश कर माद्री को बालों से पकड़कर जमीन पर पटक दिया। माद्री रोने लगी। उसने माद्री की दोनों आंखे निकाल लीं, दोनों हाथ काट डाले और छाती फाड़कर लहू लुहान कर चला गया। 
सुबह उठकर माद्री ने अपनी स्वप्न की बात विशांत्र को बताई। विशांत्र ने उसे सांत्वना देते हुए कहा, “माद्री, चिंता मत करो। कभी-कभी मानसिक उद्विग्नता के कारण ऐसा होता है।” पति की बातों से अश्वस्थ होकर माद्री फल तथा जड़ी बूटी लाने वन चली गई। विशांत्र ने जब विशांत्र पूजाक को आते हुए देखकर पूछा, “हे ब्राह्मण! इस घने वन में आप क्यों पधारे हैं? 
पूजाक ने कहा, “हे श्रीमान! मैं आपके बच्चों को दान में मांगने आया हूँ।”
ब्राह्मण की याचना सुनकर विशांत्र थोड़ा भी भयभीत नहीं हुआ। उसे पता था की बृद्ध ब्राह्मण बच्चों से सेवक का काम लेना चाहते है। अपने दोनों बच्चों को देते हुए उसने कहा, “हे ब्राह्मण! दान और परोपकार के दिव्य गुण के रूप में यह परम ज्ञान मुझे सौ पुत्रों या सौ हजार पुत्रों से भी अधिक प्रिय है।” 
पूजाक बच्चों को साथ लेकर चला गया। शाम के समय प्रतिदिन की भाँति माद्री फल तथा जड़ी-बूटी लेकर वन से वापस आई। उसे रह-रहकर अपना स्वप्न याद आ रहा था। प्रतिदिन संध्या समय बच्चे ध्यान के चबूतरे पर उसकी प्रतीक्षा कर रहे होते थे पर आज उन्हें वहाँ नहीं देखकर उसे गड़बड़ लगी। कुटिया में भी गजब का सन्नाटा था। विशांत्र वहाँ अकेला बैठा था। उसने बच्चों के बिषय में पूछा और बोली, “हे राजकुमार! यदि अपने बच्चों के बिषय में नहीं बताया तो सुबह तक आप मुझे मृत पाएंगे।”
विशांत्र ने सुबह की घटना के बिषय में माद्री को कुछ नहीं बताया। माद्री सारी रात रोती रही और फिर अचेत हो गई। विशांत्र ने चेहरे पर पानी के छींटे डाले तब वह होश में आई। सचेत होने पर माद्री ने पूछा, “विशांत्र, मेरे प्रभु! कृपया मुझे बताएँ की मेरे बच्चे कहाँ हैं?” 
विशांत्र ने विस्तार से उसे बताया, “माद्री, तुम्हारे वन जाने के बाद एक दीन बृद्ध मेरे पास आया। उसके याचना करने पर मैंने अपनी दोनों संताने उसे दे दीं। मुझे देखो माद्री, इस प्रकार विलाप मत करो। यदि जीवित रहे तो हमें फिर से हमारे बच्चे मिल जाएंगे और हम सुखपूर्वक रहेंगे। माद्री, पुत्र अत्युत्तम उपहार है पर तुम्हे मेरे उपहार का भी अनुमोदन (पप्रशंसा) करना चाहिए।”
अपने पति का तर्क सुनकर माद्री द्रवित हो गई। वह अश्वस्थ हो गई की उसके पति ने सही निर्णय लिया है। 
दूसरी ओर इन्द्रदेव ने देखा की विशांत्र के संतान-दान से धरती हील उठी है। उन्होंने विशांत्र की की उदारता की और परीक्षा लेने का मन बनाया। वह खुद ब्राह्मण के बेश में वंक पर्वत पर बने विशांत्र की कुटी में पहुँचे। अभिवादन कर विशांत्र से उन्होंने कहा, “श्रीमान! मैं बृद्ध हो गया हूँ। बड़ी आशा के साथ मैं आपसे कुछ याचना करने आया हूँ। जिस प्रकार नदी जल से लबालब सदा बहती रहती है उसका जल नहीं सूखता आप अपनी पत्नी माद्री को इस गरीब ब्राह्मण को दे दें।”
पल भर के लिए विशांत्र निस्तब्ध रह गया। मन ही मन सोचा, “कल एक बृद्ध ब्राह्मण मेरे दो बच्चों को ले गए, मैं माद्री के बिना इस वन में कैसे रहूँगा?” पर ऊपर से शांत बने रहकर उसने कहा, “हे ब्राह्मण! आपने जो चाहा मैं देता हूँ।” यह कहकर, जल से भरा पात्र लेकर, औपचारिक रूप से उसने माद्री को ब्राह्मण को दे दिया। दान देते ही धरती हिली। माद्री ने कोई शिकायत या बिरोध नहीं किया। यह एक महान दान था। माद्री एक मूक दर्शक बनी हुई थी तभी विशांत्र ने घोषणा करी, “मैं अपनी पत्नी माद्री और दोनों बच्चों के प्रति कोई द्वेषभाव नहीं रखता हूँ पर मैं ज्ञान को सर्वोपरि मानता हूँ। इसलिए मैं अपने प्रियजनों का परित्याग करता हूँ।”
विशांत्र की उदारता से द्रवित इन्द्रदेव ने घोषणा करी, “मैं तुम्हे तुम्हारी पत्नी माद्री लौटाता हूँ। संपूर्ण विश्व में मात्रा तुम दोनों एक दूसरे के लिए उपयुक्त हो।”
इधर पूजाक ने विशांत्र के बच्चों को रात में एक पेड़ से बाँध दिया और उन्हें जमीन पर लेटने के लिए बाध्य किया। वह खुद जंगली जानबरों से बचने के लिए पेड़ पर सोया। वन में वह भटक गया और कलिंग पहुँचने की जगह जतुत्तरा पहुँच गया। वहाँ के राजा संजय ने अपने पोते-पोती को पहचानकर पूजाक से पूछा, “यह बच्चे तुम्हे कहाँ मिले?” 
पूजाक ने उत्तर दिया, “वन में राजकुमार विशांत्र ने इन्हे मुझे दान में दिया है।” बच्चों ने राजा को बताया, “यह ब्राह्मण हमें गुलामों की भांति छड़ी से मारता है। यह ब्राह्मण नहीं एक दैत्य है।”
महाराज संजय ने उन्हें प्यार से सहलाया और अपनी बाहों में भरकर कहा, “तुम्हारे माता-पिता स्वस्थ तो हैं?” 
जाली ने उत्तर दिया, “वे ठीक हैं। मेरी माँ वन से जड़ी-बूटी और फल लेकर आती है और हम सब उसी पर आश्रित रहते है। तेज धुप और हवा से वे दोनों एक कमल की भांति मुरझा गए हैं। जमीन पर जानबर की खाल बिछाकर सोते है।”
अपने पुत्र और पुत्रबधु की दिनचर्या जानकर राजा बहुत दुःखी हो गए। वह तुरंत ही दोनों को वापस लाने के लिए वंक पर्वत की ओर चल दिए। राजा को आया देखकर विशांत्र  और माद्री ने पैर छुकर उनका आशीर्वाद लिया। उनके साथ अपने बच्चों को साथ आया देखकर माद्री अत्यंत प्रसन्न हुई। परिवार फिर से साथ हो गया था। सबके चेहरे प्रसन्नता से खिल उठे थे। विशांत्र और माद्री ने कुटी में जाकर तपस्वी की कपड़े उतारकर अपने वस्त्र धारण किए। सभी प्रसन्नतापूर्वक जतुत्तरा लौट गए। 
शिक्षा: दान-पुण्य घर से ही प्रारम्भ (शुरू) होता है। 
 
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